गायत्री मण्डल के मुख्य संरक्षक श्री दिलीप गुप्ता ने पीताम्बरा आश्रम का अवलोकन किया, यज्ञ अनुष्ठानों की दैनिक परम्परा को सराहा,

निर्माण कार्यों एवं प्रबन्धों का जायजा लिया, बेहतर कार्यों के लिए तकनीकि मार्गदर्शन दिया

बांसवाड़ा, 14 दिसम्बर/गायत्री मण्डल की ओर से वनेश्वर महादेव मन्दिर के समीप संचालित पीताम्बरा आश्रम में संचालित आध्यात्मिक साधना एवं प्राच्यविद्या प्रशिक्षण केन्द्र परिसर एवं भवन निर्माण की गतिविधियां जोरों पर हैं और इस दिशा में निर्माण गतिविधियां निरन्तर जारी हैं।

गुरुवार को गायत्री मण्डल के मुख्य संरक्षक, नगर परिषद के पूर्व आयुक्त श्री दिलीप गुप्ता ने आश्रम में चल रहे निर्माण कार्यों का अवलोकन किया और बेहतर गुणवत्ता के साथ बहुआयामी गतिविधियों से संबंधित निर्माण को लेकर व्यापक दिशा-निर्देश दिए।

इस अवसर पर मण्डल के वरिष्ठ उपाध्यक्ष ब्रह्मर्षि पं. दिव्यभारत पण्ड्या सहित कार्यकारिणी के सदस्यों, मण्डल के सदस्यों पं. अंकित त्रिवेदी, वैद्य महेन्द्र त्रिवेदी, सह सचिव श्री सुभाष भट्ट, कार्यक्रम संयोजक पं. मनोज नरहरि भट्ट, पं. जय रणा सहित विभिन्न धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

जाने-माने वास्तु विशेषज्ञ श्री चन्द्रशेखर जोशी ने मौके पर विभिन्न निर्माण कार्यों से संबंधित वास्तु सम्मत गतिविधियों का निरीक्षण कर महत्त्वपूर्ण सुझाव प्रदान किए।

गायत्री मण्डल के सचिव पं. विनोद शुक्ला ने 4 नवम्बर से लेकर अब तक संचालित गतिविधियों एवं निर्माण कार्यों के बारे में विस्तार से अवगत कराया।

मण्डल के मुख्य संरक्षक श्री दिलीप गुप्ता ने पीताम्बरा आश्रम परिसर में हनुमत्पीठ परिसर पर शेड निर्माण, चहारदीवारी निर्माण, परिसरों की साफ-सफाई, साधना कक्षों एवं बरामदों में बैठक व्यवस्था, नए सिरे से मुख्य द्वार निर्माण, पेयजल एवं बिजली व्यवस्था, हैण्डपम्प मरम्मत आदि विभिन्न कार्यों का अवलोकन किया और महत्त्वपूर्ण तकनीकि सुझाव देते हुए उम्दा एवं स्तरीय निर्माण कार्यों पर जोर दिया।

उन्होंने भूमि एवं भवन के मानचित्रों का अवलोकन करते हुए व्यापक स्तर पर निर्माण गतिविधियों के संचालन की रूपरेखा पर मण्डल के पदाधिकारियों से विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श किया और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।

उन्होंने आश्रम में प्रतिदिन नियमित रूप से संचालित दैनिक अनुष्ठानों एवं यज्ञ की परम्परा पर प्रसन्नता जाहिर की और कहा कि इसे निरन्तर जारी रखे जाने के साथ ही साधकों एवं साधिकाओं की अधिकाधिक स्वैच्छिक भागीदारी सुनिश्चित की जाकर धार्मिक-आध्यात्मिक जागरुकता संचार तथा विभिन्न साधनाओं के प्रशिक्षण पर भी समानान्तर ध्यान केन्द्रित किया जाए।

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