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राजनीति

जनता में नेताओं के प्रति सम्मान नहीं

कुलदीप नायर

एक लोकतांत्रिक प्रणाली में राजनीतिक दल बिरले ही कभी एक पक्ष में होते हैं। उनके अपने-अपने एजेंडे हैं और अपनी ही चिंतन विधा है, और सबसे ऊपर यह कि वे एक ही मायामय लक्ष्य के लिए- जो है संसद में बहुमत की प्राप्ति, उसके लिए ही प्रतिद्वन्द्विता में रत हैं। उस स्थान को पाने के लिए वे निश्चय ही एक दूसरे को धकियाते हैं। किंतु सवाल यह है कि क्या उन्हें इस प्रयास में प्रणाली को ही क्षति पहुंचा देनी चाहिए। क्या प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़ने की इस होड़ में उन्हें कोई मर्यादा नहीं रखनी चाहिए?

मेरे विश्वास में अब यह सवाल पहले की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक हो गया है, क्योंकि लोगों को उस सबमें तनिक भरोसा भी नहीं कि राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में कोई सार है। राजनीतिक दल आदर गंवा चुके हैं और उनके नेताओं के बारे में निराशा और कटुता सी ही है। दरअसल शब्द राजनीतिज्ञ एक प्रकार से तिरस्कार का ही द्योतक सा होकर रह गया है। सामान्यतः यह माना जाता है कि संसद का कोई विकल्प नहीं है। किंतु साथ ही यह तर्क भी दिया जाता है कि वहां कुछ भी नहीं हो पाता। दूसरी ओर राजनीतिक दलों की न कोई नीति ही है और न ही कोई कार्यक्रम। उनकी एक मात्र लक्ष्य सत्ता पाना ही है। यह भी एक अद्भुत सा विरोधाभास है कि दल लोगों के जितना निकट आने का प्रयास करते हैं वे उनके प्रति जो वितृष्णा है उसके चलते लोगों से उतना ही दूर होते जाते हैं।

हताश लालकृष्ण आडवाणी एक रथ यात्रा के सारथी हैं। वह यात्रा गांधीवादी जय प्रकाश नारायण की जन्मभूमि से प्रारंभ हुई है, जो अपनी सेक्युलर शनाख्त के कारण जाने जाते थे। इस बार आडवाणी की यात्रा का उद्देश्य भारतीयों द्वारा विदेशों में सहेजे गए धन की वापसी है। परंतु वे वही आधार बना रहे हैं जो अन्ना हजारे ने सरकार से मांग करके बनायी है कि भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए संसद के शीतकालीन अधिवेशन में एक लोकपाल विधेयक पारित किया जाए और विदेशों में जो काला धन इकट्ठा किया गया है, उसे जब्त किया जाए। आडवाणी की यात्रा एक निरर्थक कसरत है। यह यात्रा भी ध्रूवीकरण सा ही करती लगती है और इससे मुस्लिमों में कट्टरवादिता ही मजबूत हो सकता है। दरअसल सच्चर आयोग की रिपोर्ट के बाद समुदाय में एक मंथन हो रहा है। मुस्लिमों के समक्ष सवाल यह है कि उन्हे क्या करना चाहिए? वे सेकुलर भारत की राजनीति में अपनी प्रभावी ढंग से सुनवाई के पक्षधर हैं। आडवाणी की यात्रा उन्हें फिर से अपनी शनाख्त चमकाने को प्रेरित कर सकती है। अब जबकि सहनशीलता और समायोजन की अपेक्षाकृत शांत अवधि है, क्या आडवाणी अथवा यह कह लीजिए कि भारतीय जनता पार्टी को पानी गंदा करना चाहिए। आडवाणी जो कुछ कर रहे हैं वह पार्टी में शीर्ष पर भाजपा की अंतरंग राजनीति से संबंधित हो सकता है। किंतु राष्ट्र को सेंटर स्टेज हथियाने की उनकी महत्वाकांक्षा से कोई सरोकार नहीं और न ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्रित्व के लिए प्रत्याशी के तौर पर उभारे जाने को लेकर। लोग तो चिंतित राज्य व्यवस्था (पोलिटी) को इन दोनों से पहुंच सकने वाली क्षति को लेकर हैं। पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने यात्रा के इस नाटक में कभी जहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी, उस स्थान पर मंदिर के निर्माण की मांग समाविष्ट कर दी है, इसका क्या कारण है यह तो भाजपा ही बेहतर जाने दूसरी ओर उद्योग के कैप्टन मोदी की राजनीति से संबद्ध हो गए हैं।

जहां तक सत्तारुढ़ कांग्रेस का संबंध है, उसकी ख्याति और विश्वसनीयता दोनों में ही अचानक गिरावट आई है। ऐसा लगता है कि वह कुछ भी उल्लेखनीय कर सकने की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी जो इन सारे वर्षों में बैक सीट ड्राइविंग करती रही हैं, वह भी ‘गियर‘ से बाहर हैं। स्वास्थ्य भी ऐसा होने की एक वजह हो सकती है। किंतु मेरे विचार में उनकी सबसे बड़ी चिंता अपने पुत्र को राहुल गांधी को लेकर ही है। ‘जिन्हें वह अभिषेकित करना चाहती हैं। वह देश में कोई खास हलचल ला सकने में असफल रहे हैं। वह ऐसी छवि पाते नहीं लग रहे कि जो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उत्तराधिकारी सिद्ध हो सके। राहुल पर इतना अधिक निवेशित करने के बाद कांग्रेस के पास कोई अन्य नहीं कि जिसे वह पेश कर सके।

फिर भी जब सेकुलर विश्वसनीयता के आकलन की बात आती है तो कांग्रेस पार्टी अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में प्रतीत होती है। मध्यम वर्ग कह सकता है कि यह छोटी बुराई है, किंतु यही दलील राज्य अथवा संसदीय चुनाव में कांग्रेस को लाभ पहुंचा सकती है। निर्धनता उन्मूलन और ग्रामीण परिदृश्य में सुधार से संबंधित अनेक योजनाओं से भी पार्टी के लिए कुछ वोट बटोरे जा सकते हैं। यह अनुभूत करते हुए कांग्रेस कुछ और कल्याणकारी योजनाएं लागू कर सकती है। वह भ्रष्टाचार के दमन के लिए भी कुछ कदम उठा सकती है। जब तक लोकपाल संस्थान मूर्त रूप नहीं पा लेता तब तक सीबीआई को सर्वोच्च न्यायालय के निरीक्षण के तहत रखना चाहिए। किंतु फिर यह भी तो है कि शीर्ष पर काफी लोग हैं जो एक दूसरे घोटाले से संबद्ध हैं। किसी न किसी दिन कमलनाथ के कृत्य भी सार्वजनिक हो सकते हैं। आशा की किरण अभी भी अन्ना हजारे हैं। किन्तु उनकी टीम ने राजनीतिक ‘क्रीज‘ पर खेलना शुरू कर ही दिया है। उनका अभियान भ्रष्टाचार के विरुद्ध लोगों के रोष मात्र का ही प्रतिनिधित्व नहीं करता, अपितु वह कुशासन के भी खिलाफ है। उनके वास्तविक लक्ष्य की राह में कुछ भी नहीं आना चाहिए। फिर भी यह सवाल है जिसका उत्तर देना होगा कि प्रणाली को कैसे सुधारा जाए। सत्य है कि यह भ्रष्टाचार से खौल सी रही है, किंतु अन्य कौन से उपाय हैं जो हमारी दृष्टि में हो? सामूहिक चिंतन आवश्यक है और वह राजनीतिक दलों को भी शामिल करता है। क्या उनका एजेंडे तब तक टाले जा सकते हैं कि जब तक विकल्प पर आम राय नहीं बन जाए। जब तक राजनीतिक में नैतिकता नहीं लौटती तब तक यह संभव नहीं है।

 

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