गरीबी और अकाल – एक सुलगता प्रश्न

अमर्त्य सेन! गरीबी के विषय में बहुत-सी बातें तो स्पष्ट ही होती हैं । इसके नग्नतम स्वरूप को जानने एवं इसके उदगम स्रोत को पहचानने के लिए न तो किसी सुविकसित कसौटी की आवश्यकता है, न किसी चातुर्यपूर्ण मापन कला की और न ही गहरी छानबीन की। किंग लियर की तर्ज पर बेचारे फटेहाल दरिद्रों जिनके सिर पर छाया व पेट में टुकड़ा नहीं पड़ा हो और जिनका शरीर असमर्थता के भारी बोझ का बहन करते-करते झुक चला हो, उनके विषय में दुरूह एवं फटेहाली या दुर्दशा की अवस्था में कुछ भी छिपा हुआ नहीं होता सभी कुछ पर्णत: सुस्पष्ट रहता है। किन्तु गरीबी से जुड़ी हर बात इतनी सरल भी नहीं होती। जैसे ही हम गरीबी के अत्यन्त निकृष्ट या नग्नतम स्वरूप से जरा-सा परे हटते हैं, गरीबों की पहचान एवं गरीबी का निदान दोनों ही जटिल हो जाते हैं। यहां अनेक विधियों का प्रयोग हो सकता है (जैसे जैवशास्त्रीय अपर्याप्तता या सापेक्ष अभाव आदि का) प्रत्येक विधि से जुड़ी कुछ तकनीकी समस्याएं भी होती ही हैं। फिर, गरीबी के व्यापक चित्रण के लिए तो गरीबों की पहचान से आगे भी बहुत कुछ जानना होगा । जिन्हें गरीब माना गया है उन्हीं के लक्षणों के सामूहिक स्वरूप को व्यक्त करनेमें भी लक्षणों के ‘सामूहन की समस्या सुलझानी पड़ सकती है । और अन्त में, गरीबी के कारणों का निदान तो और भी कठिन कार्य सिद्ध होता है। यद्यपि गरीबी के तात्कालिक कारण तो स्वयंसिद्ध से होते हैं, वे किसी विश्लेषण के मोहताज नहीं होते, और अंतिम कारण इतने अस्पष्ट एवं विचित्र हो सकते हैं कि उनका निदान सदैव सन्देहास्पद ही रहता है । फिर भी इन दोनों ध्रुवों के बीच बहुत से पड़ाव होते हैं। जिनकी खोजबीन से हमें उपयोगी जानकारी प्राप्त हो सकती है। पिछले कुछ समय से भूख एवं भुखमरी की चर्चा के सन्दर्भ में तो इस समस्या का महत्व और भी बढ़ गया।

प्रस्तुत निबन्ध इन्हीं प्रश्नों से जुड़ा है। इस शोध में सारा ध्यान भुखमरी के सामान्य स्वरूप एवं अकाल की स्थिति में इसके और भयावह स्वरूप पर ही केन्द्रित है । प्रथम अध्याय में ही ‘अधिकारिता व्यवस्था से जुड़ी आधारभूत विश्लेषण पद्धति का सामान्य स्वरूप प्रस्तुत किया गया है। गरीबी की अवधारणाओं पर चर्चा से पूर्व ही इस विषय को उठाने का हमारा उद्देश्य यही है कि हम इसे अपने निबन्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग मानते है। तत्पश्चात विश्व के विभिन्न भागों से अकाल की परिसिथतियों के अध्ययन आते हैं : बंगाल का व्यापक अकाल, 1943 (अध्याय-6) इथोपिया के अकाल, 1973-75 (अध्याय-7) 1970 के दशक के आरम्भ में अफ्रीका के साहेल देशों के अकाल (अध्याय-8) और बंगलादेश का अकाल, 1974 (अध्याय-9)! अध्याय-10 में हम अधिकारिता व्यवस्थाओं से सम्बद्ध अभाव एवं वंचना के सामान्य मुद्दों को उठाते हुए ‘अधिकारिता विश्लेषण विधि को ठोस या वस्तुपरक स्वरूप में निबद्ध कर रहें हैं।

इस अध्ययन में चार तकनीकी परिशिष्ट भी समिमलित हैं। परिशिष्ट-1 में विनिमय अधिकारिताओं का विधिवत स्वरूप निखारा गया है, वह सारी अधिकारिता व्यवस्था का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण आयाम भी है। परिशिष्ट-2 में कुछ प्रतिमानों के उद्धरण द्वारा अकाल की अवस्थाके निर्माण विकास में विनिमय अधिकारिताओं की विफलता के योगदान को उजागर किया गया है। परिशिष्ट-3 में गरीबी के आकलन की चर्चा हुर्इ है। इस सम्बन्ध में प्रयुक्त एवं सुझाए गए अनेक मापकों का यहां विश्लेषण एवं मूल्याकंन किया गया है । अंतिम परिशिष्ट-4 में बंगाल के व्यापक अकाल 1943 में जनहानि के स्वरूप का मूल्यांकन किया गया है।

अन्त में एक बात और। परिशिष्टों-1,2,3, में कुछ गणितीय अवधारणाओं एवं चिन्हों का प्रयोग अवश्य हुआ है, किन्तु निबन्ध के मुख्य पाठ को पूर्णत: अनौपचारिक स्वरूप में ही प्रस्तुत किया गया है। जिन्हें भी विश्लेषण विधि की आन्तरिक एवं विशद संरचना को समझना है, उन्हें परिशिष्टों का सहारा लेना ही पड़ेगा । किन्तु परिशिष्टों में प्रवेश किऐ बिना भी इस प्रबन्ध की चिंतनधारा को समझने में कोर्इ कठिनार्इ नहीं आयेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। इस पुस्तक की विषयवस्तु के महत्त्व को देखते हुए मेरा प्रयास है कि यह अधिक-से-अधिक पाठकों को सुलभ एवं बोधगम्य हो सके । सम्भवत: यह मेरा आत्माभिमान ही है कि मुझे लगता है कि इस निबन्ध में उठाए गए अनेक मुद्दे व्यावहारिक नीतियों के निर्धारण में भी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।

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