त्रैतवाद : ईश्वर, जीव, प्रकृति का अनादित्व मान लें तो क्या होगा❓

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द्वा सुपर्णा सुयजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्व जाते !
तयोरन्य: पिप्पलं स् वाद्वत्तनश्नन्नन्यो sभिचाकशीति !!
समानेवृक्षे पुरुषो निमग्नोsनीशया शोचति मुह्यमान: !
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमश्य महिमानमीति वीतशोक:!!
यदा पश्य: पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्!
तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजन: परमं साम्यमुपैति !!
— मुण्डकोपनिषद – तृतीय मुण्डक प्रथम खण्ड १/३

भावार्थ : – इस जगत् रूपी वृक्ष पर एक ही आयु के दो मित्र पक्षी बैठे हैं (एक जीवात्मा और दूसरा परमात्मा)! जीवात्मा इस वृक्ष के फल चखता है ! परमात्मा इन्हे नहीं चखता ! वह केवल देखता है ! वृक्ष व फल जीव के लिए हैं !परमात्मा का इसमें कोई व्यक्तिगत हित या स्वार्थ नहीं है! परमात्मा तो केवल नियामक है! वह भी अपने लिए नहीं जीवात्मा के लिए है ! परमात्मा स्वरुप से ही आनंदरूप है! उसे तो आनंद की आवश्यकता नहीं है ! जीवात्मा आनंद का अभिलाषी है ! इसलिए परमात्मा जीव के कल्याण के लिए उसे आनंद प्रदान करता है!

जीवात्मा जगत रूपी वृक्ष पर बैठे हुए परमात्मा को नहीं देख सकता और वृक्ष की उपयोगिता को भी नहीं समझता! मोह के कारण वह शोक में फंसा रहता है परंतु जब आंख खोल कर अपने मित्र परमात्मा को देखता है तो उसका अज्ञान छिन्न-भिन्न हो जाता है तब वह दु:ख मुक्त होता है! जैसे एक बच्चा बिस्तर पर पड़ा स्वयं को अकेला अनुभव करके चिल्ला उठना है परंतु जब उसे पता चलता है कि उसकी माता उसके पास ही है तो वह शांत हो जाता है! इसी प्रकार जीवात्मा भी जब तक स्वयं को अकेला अनुभव करता है और यह समझता है कि कोई भी उसका रक्षक नहीं है तो वह संसार के दु:खों को चखता है! ये दु:ख अज्ञान के कारण हैं !उसका रक्षक सर्वेश्वर साथ ही है परंतु क्योंकि उसे उसकी समीपता का ज्ञान नहीं, इसलिए भय व शोक से ग्रस्त है! जब जीवात्मा को अपने पास ही उस सत्ता का पता चलता है जो प्रकाशस्वरूप है, जो जगत का संचालन करती है, जो ज्ञान स्वरूप है और आनन्दघन है तब यह ज्ञान जीवात्मा को पाप और पुण्य से छुटकारा पाने में सहायक होता है और यह जीवात्मा आध्यात्मिक संतुलन को(समता को) प्राप्त होता है!

यह दर्शन (यह दार्शनिक दृष्टिकोण) वेदों में और उपनिषदों में व्याप्त है परंतु एक लंबे समय से विस्मृत हो चुका था ! विभिन्न व्याख्याकारों के हाथों इसकी पर्याप्त विकृति हो गई ! सौभाग्य से इस दार्शनिक विचारधारा को महर्षि दयानंद के रूप में एक महान उद्घोषक और व्याख्याता मिल गया जिसने धुंध को दूर करके सारे दृश्य को- इस दृष्टिकोण को प्रचंड प्रकाश में ला उपस्थित कर दिया !

यदि प्रत्येक व्यक्ति की मानसिक सोच ऐसी हो जाए तो परिणाम निम्न प्रकार से होगा —

१-फिर कोई भी व्यक्ति इस सृष्टि को दु:खों का घर (दु:खसागर) नहीं समझेगा !
२-फिर कोई भी व्यक्ति अपने दु:खों के लिए ईश्वर को दोषी या उत्तरदायी नहीं मानेगा !
३-फिर कोई व्यक्ति नाम मात्र का भक्त नहीं होगा!
४- फिर कोई भी व्यक्ति निठल्ला- प्रमादी नहीं रह सकेगा!
५- प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थ को अपने विनाश का कारण जानेगा!
६- कोई मनुष्य विज्ञान व दर्शन को नास्तिकपन या पापयुक्त नहीं समझेगा !
७-मनुष्य अन्य जीवों को भी अपने जैसा ही मानेगा !
८-वह किसी की हिंसा नहीं करेगा!
९- फिर मनुष्य संसार को एक जुआ घर नहीं समझेगा और भाग्य पर आश्रित नहीं रहेगा !
१०-वह अपने को व दूसरों को दीर्घजीवी बनाने का प्रयास करेगा!
११- वह नि:शंक होकर सृष्टि नियमों का पालन करेगा!
१२- उसका परमात्मा की सत्ता में अटल-अडिग विश्वास होगा !
१३-वह स्वयं को परमात्मा के हाथ में एक खिलौना नहीं मानेगा!
१४- वह आत्मनिर्भर बनेगा !
१५-फिर यदि मनुष्य को दु:ख प्राप्त होगा तो वह दु:ख का महत्व या प्रयोजन समझेगा और दु:ख में ही नहीं डूब जाएगा !

— पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय
गंगा- ज्ञान-सागर भाग 3, पृष्ठ १५३-१५४
प्रस्तुतकर्ता – रामयतन

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