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महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां : अध्याय-२ क, लाक्षागृह की कहानी

( महाभारत हमारे लिए एक ऐसा ग्रंथ है जिसे पांचवां वेद कहा जाता है । इसमें मनुष्य जीवन की उन्नति को सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक प्रकार की शिक्षा दी गई है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर बहुत ही गहन चिंतन प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ हमें कुरु वंश के आंतरिक कलह की जानकारी देते हुए यह स्पष्ट करता है कि यदि परिवार और राष्ट्र आंतरिक कलह के शिकार हो जाते हैं तो उनका पतन हो जाता है। तब महाभयंकर विनाश मानवता को झेलना पड़ता है । अंतिम निष्कर्ष यह है कि परिवार से लेकर राष्ट्र तक में शांति व्यवस्था स्थापित रहनी चाहिए। जो समाज विरोधी तथा राष्ट्रविरोधी मानसिकता के लोग हैं उनका सही समय पर उपचार होता रहना चाहिए। किसी भी ‘भीष्म’ को ऐसी ‘भीष्म प्रतिज्ञा’ नहीं लेनी चाहिए जिसका लाभ किसी ‘दुर्योधन’ को मिले और अंत में किसी धर्मराज ‘युधिष्ठिर’ को वनवास में जाकर ‘महाभारत’ के माध्यम से अपना राज्य वापस लेना पड़े।
सही समय पर मौन रहना भी अपराध है । अनावश्यक तटस्थ रहने का भाव भी कई बार घातक सिद्ध होता है। इस प्रकार की आपराधिक मानसिकता का लाभ उन लोगों को मिलता है जो समाज और राष्ट्र में उपद्रव पैदा करना चाहते हैं। – लेखक)

‘महाभारत’ की कहानी कई प्रकार की समस्याओं का समाधान करती है। जो लोग यह कहते हैं कि सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं – उनकी इस बात की पुष्टि महाभारत के अध्ययन से होती है। जिसमें सत्य और धर्म के पक्षधर युधिष्ठिर की ही अंतिम जीत होती है। यद्यपि यह बात हर परिस्थिति और हर काल में पूर्णतया सत्य सिद्ध नहीं होती। कभी-कभी सत्य परेशान भी होता है और पराजित भी होता है। आज के पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान , अरब, यूरोप, एशिया और संपूर्ण भूमंडल के इतिहास से जिस प्रकार वैदिक इतिहास के सत्य को मिटाकर उसे परेशान किया गया, वहां पर नई-नई मान्यताओं और संप्रदायों के लोगों के झूठे इतिहास को प्रस्तुत किया गया, उससे पता चलता है कि सत्य परेशान भी होता है और पराजित भी होता है। खैर….
अब हम अपने उस विषय पर आते हैं जिसे इस कहानी के माध्यम से यहां हम प्रस्तुत करना चाहते हैं।
बात उस समय की है जब युधिष्ठिर का युवराज पद पर अभिषेक हो गया था और उसके पश्चात पांडवों के शौर्य और कीर्ति की सर्वत्र चर्चा होने लगी थी। राज्य के प्रजाजन कहीं सभाओं में इकट्ठे होते तो कहते कि पांडुपुत्र युधिष्ठिर राज्य प्राप्ति के सर्वथा योग्य है। लोगों में यह भी चर्चा होती थी कि पांडवों के बड़े भाई युधिष्ठिर यद्यपि अभी तरुण हैं परंतु इसके उपरांत भी वह शील स्वभाव में वृद्धों के समान हैं। वे सत्यवादी, दयालु और वेदवेत्ता हैं। ऐसे सत्यवादी ,दयालु और वेदवेत्ता राजा के राज्य में सदा शांति रहेगी, इसलिए उनका ही राज्याभिषेक होना चाहिए। नगर निवासी भरी सभा में उनके सद्गुणों की प्रशंसा करते तो धीरे-धीरे उनकी यह प्रशंसा धृतराष्ट्र के पास तक पहुंच गई।
उनकी कीर्ति से धृतराष्ट्र चिंतित रहने लगा। धृतराष्ट्र पुत्र दुर्योधन तो अब पांडवों के प्रति और भी अधिक जलन रखने लगा था। वह नहीं चाहता था कि युधिष्ठिर और उसके भाई जीवित रहें। उसकी इच्छा थी कि जैसे भी हो पांडवों का विनाश हो जाए और वह स्वयं भरत वंश का सम्राट बनने का गौरव प्राप्त करे। अपनी इसी प्रकार की सोच को क्रियान्वित करते हुए दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र को इस बात के लिए सहमत किया कि युधिष्ठिर और उसके भाइयों को वारणाव्रत भेजा जाए। वहां पर दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि के साथ मिलकर युधिष्ठिर और उसके अन्य भाइयों का विनाश करने की योजना बनाई । वहां पर एक लाक्षागृह का निर्माण किया गया। इस लाक्षागृह में एक सही समय पर आग लगा देनी थी। जिसमें पांचों पांडवों का जलकर मर जाना निश्चित था।
जब मानसिकता पापपूर्ण हो जाती है तो वह अनेक प्रकार के पाप कराती है। ऐसी मानसिकता के वशीभूत होकर व्यक्ति विनाश की योजनाओं में लग जाता है। उसे निहित स्वार्थ के समक्ष समाज और राष्ट्र के हित से कोई लेना-देना नहीं रहता। संसार चक्र में एक बाधा के रूप में उसका मस्तिष्क काम करता रहता है। दुर्योधन की बुद्धि भ्रष्ट हो चुकी थी और वह अपने निजी स्वार्थ के सामने समाज और राष्ट्र के हित को भूल चुका था। रही सही कसर को उसका मामा शकुनि पूरी कर देता था। शकुनि पांडवों से दुर्योधन की जलन को और भी अधिक बढाने का काम करता था। जब भी अनुकूल अवसर आता तभी शकुनि अपने भांजे दुर्योधन को पांडवों के विरुद्ध भड़काकर अपना काम पूरा करता था। यही कारण था कि लाक्षागृह जैसी विनाशकारी योजना में शकुनि ने अपनी कपटपूर्ण नीति का जाल बिछाने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी।
युधिष्ठिर की प्रशंसा से बुरी तरह आहत होने वाले दुर्योधन का दिन का चैन और रातों की नींद गायब हो चुकी थी। वह जिस योजना पर काम कर रहा था अब उसकी वह योजना अर्थात अपने पिता धृतराष्ट्र के पश्चात भरत वंश का शासक बनने की सोच पर ग्रहण लगने लगा था। अपने मामा के उकसावे में आकर अब वह राज्य प्राप्ति के लिए और भी अधिक व्यग्र हो चुका था।
एक दिन ऐसी ही मानसिकता से ग्रस्त दुर्योधन आखिर अपने पिता धृतराष्ट्र के पास पहुंच ही गया । तब उसने अपने पिता को अकेला देखकर अपने मन की बात कहनी आरंभ की। उसने अपने पिता से स्पष्ट कह दिया कि “पिताजी ! जिस प्रकार नगर निवासी परस्पर चर्चा करते हुए युधिष्ठिर को राजा बनाने की बात करते हैं वह मुझसे सहन नहीं होती । ये नगर निवासी युधिष्ठिर का इस प्रकार गुणगान करके आपका और पितामह भीष्म का अनादर कर रहे हैं। यदि युधिष्ठिर को आप राजा बनाते हैं तो पितामह भीष्म जी तो इस बात को स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि उन्हें स्वयं कभी राजा नहीं बनना। परंतु मैं इसे कदापि स्वीकार नहीं करूंगा। यदि आपके अधिकार का अतिक्रमण कर पांडु उस समय अपने पिता का राज्य प्राप्त करने में सफल हो गया था तो मैं अब ऐसा नहीं होने दूंगा। मैं चाहूंगा कि पांडु के द्वारा किए गए उस अनैतिक और अधर्मयुक्त कार्य का इस समय प्रतिशोध लिया जाए। मैं नहीं चाहता कि आज इस राज्य को पांडु पुत्र युधिष्ठिर प्राप्त करने में सफल हो और उसके पश्चात उसकी पुत्र परंपरा इस राज्य को भोगने के लिए स्वाभाविक रूप से उत्तराधिकारी मान ली जाए। यदि ऐसा होता है तो उस समय हम अर्थात आपके पुत्र पौत्रादिक लोगों की अवहेलना और अनादर के पात्र बन जाएंगे।”
दुर्योधन ने अपने पिता को स्पष्ट कर दिया कि जो व्यक्ति सही समय पर निर्णय नहीं ले पाता है वह स्वयं तो बाद में पछताता ही है, उसकी पीढ़ियों को भी उसके निर्णय से कष्ट भोगना पड़ता है। इस प्रकार की भावनात्मक बातें करके दुर्योधन ने अपनी कुटिलता से अपने पिता धृतराष्ट्र को गुमराह करना चाहा। धृतराष्ट्र भीष्म पितामह, विदुर और द्रोणाचार्य जैसे विद्वान और वेदवेत्ताओं के समक्ष न्यायशील बनने का प्रयास करता था। वह इस प्रकार का प्रदर्शन करता था कि वह धर्मशील है और वही कार्य करेगा जो धर्मयुक्त और भरत वंश की परंपरा के अनुकूल होगा। परंतु जब उसके पुत्र दुर्योधन के द्वारा उसे अकेले में इस प्रकार समझाया जाता था तो उसका चित्त डांवाडोल हो जाता था । इसका कारण यह था कि वह मूल रूप में स्वयं भी पांडु के राज्याभिषेक के समय हुए अपने अनादर को अभी भूला नहीं था। वह अपने जन्म से अंधे होने को अपने लिए अभिशाप मानता था और यह सोचता था कि यदि वह जन्मांध नहीं होता तो वह स्वयं ही इस राज्य का स्वामी होता और इसके पश्चात मेरे पुत्र पौत्रादिक इस राज्य को देर तक भोगते रहते।
आज जब दुर्योधन ने अपने पिता की इस मौलिक सोच पर हाथ रखकर बोलना चाहा तो अकेले में पिता पुत्र के बीच हुए इस संवाद से धृतराष्ट्र भी पूर्णतया सहमत हो गया। दुर्योधन ने अपने पिता के समक्ष चाहे यह प्रस्ताव भी रख दिया कि उन्हें अब कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे पांडवों का विनाश हो जाए और यह राज्य सिंहासन दुर्योधन के लिए सुरक्षित हो जाए, पर उस समय धृतराष्ट्र ने अपने भाई पांडु का यह कहकर स्मरण किया कि वह मेरे प्रति सदा विशेष रूप से धर्मशील बना रहा और मेरे प्रति सदा ही धर्मानुकूल व्यवहार भी करता रहा । उसका पुत्र युधिष्ठिर भी वैसा ही धर्मपरायण है ,जैसे स्वयं पांडु थे। इस प्रकार के धर्मशील आचरण वाले युधिष्ठिर को राज्य परंपरा के स्वाभाविक उत्तराधिकारी के पद से हटाया जाना बहुत सरल नहीं है । वैसे भी सारा राजदरबार, नगर निवासी और सभी प्रजाजन उसके गुणों से अभिभूत हैं। मैं यह भी जानता हूं कि भीष्म, द्रोण और विदुर जैसे विद्वान लोग कभी भी मुझे इस बात की अनुमति नहीं देंगे कि पांडुपुत्रों को अन्यत्र किसी स्थान पर भेज दिया जाए। क्योंकि इन सभी धर्मपरायण मनस्वी लोगों के लिए हम सभी कुरुवंशी समान हैं। वे नहीं चाहेंगे कि युधिष्ठिर जैसे धर्मपरायण युवराज के साथ किसी प्रकार का विषम व्यवहार किया जाए।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह कहानी मेरी अभी हाल ही में प्रकाशित हुई पुस्तक “महाभारत की शिक्षाप्रद कहानियां” से ली गई है . मेरी यह पुस्तक ‘जाह्नवी प्रकाशन’ ए 71 विवेक विहार फेस टू दिल्ली 110095 से प्रकाशित हुई है. जिसका मूल्य ₹400 है।)

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