गतांक से आगे : अन्त: प्रेरणा को सुनना- हम शाम को संकल्प लेते हैं और सुबह विकल्प ढूंढ़ते हैं? इसे कौन कराता है। इसे हमारा मन कराता है, क्योंकि संकल्प-विकल्प की चादर बुनना और उधेड़ना इसी का काम है, व्यापार है। इसे ऋग्वेद (10.164.1) में ‘मनसस्पते दु:स्वप्न: आदि का देव कहा है। हम दु:स्वप्न से हारकर पवित्र मन की कामना करते हैं। मन के ज्ञानवान और चेतन युक्त बने रहने की प्रार्थना करते हैं और मन से सदैव नर्म बने रहने की याचना करते हैं।
इसी भावना के वशीभूत होकर हम कहते हैं ‘तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु अर्थात वह दु:स्वप्न आदि दिखाने वाला मेरा मन शिव संकल्प वाला हो। मन की पवित्रता, मन का ज्ञानवान और चेतनायुक्त होना तथा मन का सदैव कर्मशील बने रहना ही उसका शिव संकल्पी हो जाना है। पवित्र मन ही कहता है कि ”सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:। पवित्र मन ही लोक कल्याण का चिन्तन करता है, हमें विवेक देता है कि यदि हम संसार में आये हैं तो इस संसार में रहकर हम थोड़ा बहुत लोकोंपकार भी करें। मन की पवित्रता से विज्ञान और चेतन का ज्ञान हमें होता है। यही अवस्था मन की चेतनावस्था है। इस ज्ञान के आलोक में रहकर सदैव कर्मशील बने रहना, नये-नये अनुसन्धान करना और नया-नया सृजन करना ही, मन की कर्मठता है, कर्मशीलता है। एक संस्कारित जीवन के निर्माण के लिए ऐसे पवित्र मन की आवाज को हमें अन्त: प्रेरणा मानकर सुनना चाहिए, मानो चेतन मन से परमचेतन सत्ता हमारा आहवान कर रही है कि उधर मत जा। इधर आ रास्ता इधर है, में यहां हूं। तू मेरे पास आ और मेरे जैसा हो जा। ऐसे विचार यदि कभी आपके मन में आयें तो उन्हें पकड़ो और उन्हें जीवन का पथप्रदर्शक बनाकर उनके अनुगामी बन जाओ। आपके अपने विचारों का यह संसार राष्ट्र का जीवन बदल देगा। कायाकल्प कर देगा।
नेकी कर दरिया में डाल : सामान्य बोलचाल की भाषा में लोग कहते हैं- नेकी कर दरिया में डाल। यह बहुत बड़ा आदर्श है। बहुत बड़ी बात है ये। प्रथम तो हमसे नेकी नहीं हो पाती और यदि हो जाती है तो उसे हम दरिया में नहीं डाल पाते। दूसरों के प्रति किये गये भले कार्यों को हम छाती से चिपकाये घूमते रहते हैं, जिससे हमारा सीना गर्व से फूला रहता है। यह गर्व गुमान की बातें अहंकार और घमण्ड की बातें हमें दूसरों के प्रति सहज और सरल नहीं रहने देतीं। इससे सम्बन्धों में तनाव और दुराव की स्थिति उत्पन्न होती है। जिससे दु:खमयी संसार बनता है। इसलिए ऐसी स्थित परिस्थिति से बचने के लिए कहा गया कि नेकी कर दरिया में डाल। भला काम करो और उसे भूल जाओ। इसी में लाभ है। वेद ने इसे ही यज्ञीय भावना कहा है, वेद का आदेश है कि ‘यज्ञो यज्ञेन कल्पताम अर्थात यज्ञ यज्ञ की भावना से ही पूर्ण होता है। प्रत्येक शुभ कार्य, परोपकार का कार्य एक यज्ञ है। यज्ञ की भावना ही ये है कि शुभ कार्य करो और उसे भूल जाओ। सभी भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा है। यह बात इसलिए भी सत्य है कि आज दूसरी भाषाओं में जो अच्छी और सच्ची बातें हमें मिलती हैं, वो सभी संस्कृत और वैदिक वांग्मय में पूर्व से ही उपलब्ध हैं। नेकी कर दरिया में डाल चाहे जिस भाषा का मुहावरा हो, परन्तु इसका मूल तो वेद का ‘यज्ञो यज्ञेन कल्पताम वाला आदर्श ही है। मूल रूप से विचार वहां से चला और दूसरी भाषाओं में जाकर उनकी भी सूकित बन गया। आज यह जन साधारण के लिए बहुत आम मुहावरा हो गया है। नेकी के कुछ काम संसार में ऐसे हैं कि जिनका बदला नहीं चुकाया जा सकता। व्यक्ति जीवन भर उस उपकार का बदला चुकाने का प्रयास भी करे तो भी वह नहीं चुका सकता। हम यह भी देखते हैं कि हम छोटी-2 बातों के ताने उल्हाने तो देते रहते हैं पर बड़े त्याग (जिसे कर्तव्य समझकर कर जाते हैं) का कभी उल्लेख नहीं करते। उदाहरण के रूप में मां का ऋण है। मां नौ मास बच्चे को गर्भ में रखती है पर कभी भी उस गर्भावस्था का ताना नहीं देती, उसका किराया नहीं मांगती, बेटे की बहुत सी मूर्खताओं और अज्ञानताओं को चुपचाप सहन करती है और उसे सदा बच्चा मानकर क्षमा करती रहती है। हम मां से यह शिक्षा ले सकते हैं कि यज्ञ यज्ञ की भावना से किस प्रकार सफल होता है? हम पिता से भी शिक्षा ले सकते हैं। अपनी सारी सम्पति को जोड़-जोड़ कर सहज रूप से उसका उत्तराधिकारी हमें  पिता बना देता है। कभी मोह ताना या उलाहना नहीं देता।

‘उगता भारत-एक चिंतन
प्रो. विजेन्द्र सिंह आर्य
मुख्य संरक्षक उ.भा.

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