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आखिर कानून किसके लिये है?

समाज का बंधन ढीला किया गया, मांगें बढ़ी कि समाज हमारे लिए घातक है-इसकी आवश्यकताएं ही नहीं हैं। इसलिए समाज के अधिकारों में कटौती की जाए। समाज के अधिकारों को क्षीण किया जाता रहा। उस क्षीणअवस्था में समाज में आज हम देख रहे हैं कि-   

कमाता पिता के प्रति संतान का नजरिया उपेक्षा का हो गया है।

कपति पत्नी के संबंधों में तनाव है, टूटन है, बिखराव है।

कभाई बहन के रिश्ते कलंकित हो रहे हैं।

कमित्र मित्र का शत्रु हो गया है।

शिष्टïाचार और लोकाचार समाज की मर्यादा को बांधते थे, लेकिन आज इन दोनों का घोर अपमान किया जा रहा है। खबर आयी है कि एक महिला ने अपने ही 11 माह के बच्चे को दूसरी मंजिल से फेंक दिया और उसकी मृत्यु हो गयी। घर की कलह ने एक शिशु की जान ले ली। यहां बच्चे की मौत से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है कि एक मां, डायन कैसे बन गयी? नई पीढ़ी में सहनशक्ति का घोर अभाव क्यों है? यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है।

उत्तर है कि स्कूल में मर्यादा का बंधन और अनुशासन की सीमाओं को आज की पीढी अपने लिये अनुचित मानती है। वह हर हाल में मर्यादा और अनुशासन को तोडक़र रहने में ही जिंदगी का असली आनंद समझती है।

आप सडक़ों के किनारे रहने वालों को देखिये। दोनों ओर से सडक़ों का अतिक्रमण होता है। मिट्टïी भराव करके अपने अपने घर और दुकान के आगे ऊंचा करना जैसे हर दुकानदार या मकान मालिक का एकाधिकार हो गया है। नालियों में पन्नियां डालना और उन्हें बंद कर देना हमारा अधिकार है। हम उसका भरपूर प्रयोग करते हैं। बडे मगरमच्छों का छोटों को खा जाना अधिकार है, तो किसी का लूट मचाना अधिकार है। फिर भी मानवाधिकारवादी कह रहे हैं कि समाज में कड़ा कानून नहीं होना चाहिए। जबकि मानव स्वभाव बताता है कि घर और विद्यालय का कड़ा अनुशासन ही हमें सुयोग्य नागरिक बनाता है। जो चीज हमारे स्वभाव में शामिल है उसे ही नकारा जा रहा है और कहा जा रहा है कि सभ्य समाज में कानून की सख्ती उचित नहीं है। क्या सभ्य समाज का अर्थ लूट मचाने वालों की बड़ी खूनी और दागदार कोठियां या उनके दागदार चेहरे हैं जिन्होंने कितने ही मासूमों के कत्ल कर डाले हैं। उनके लिए जो सबसे बड़े गुनाहगार हैं ये कहना है कि वो सभ्य है और सभ्य समाज में कानून की सख्ती उचित नहीं अराजकता को निमंत्रित करना है।

अपराध और अपराधियों के नियंत्रण के लिए तथा समाज में शांति व्यवस्था कायम रखने और मर्यादा व अनुशासन बनाये रखने के लिए कानून की आवश्यकता होती है। हमने समाज को अधिकार दिये हैं कि सभ्य मानव का निर्माण हो, हमने अध्यापकों को अधिकार दिये हैं कि वह सुयोग्य मानव का निर्माण करे और आज उसे ही छीन रहे हैं, असभ्य मानव का निर्माण करने के लिए? 

जब मानव सहज रूप से ही अपने कर्तव्यों का पालन करने लगे तो उस अवस्था को धर्म का शासन कहते हैं? धर्म से शासित व्यक्ति एवं अनुशासन में रहने का अभ्यासी होता है। इस अवस्था को आज की राजनीति नकारती है वह कहती है कि धर्म तो हमारे बीच में आना ही नहीं चाहिए? धर्म नहीं तो शर्म भी नहीं है। हमारी सोच बन गयी है कि कानून मेरे लिये नहीं है। ये तो किसी और के लिए है। अत: मैं कानून का पालन क्यों करूं? सवाल पैदा होता है कि फिर कानून है किसके लिये?

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