Categories
डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

देश का विभाजन और सावरकर : अध्याय 15 ख , सावरकर जी और ‘कोढ़ की बीमारी’

नेहरू जी और गांधी जी जैसे राष्ट्र निर्माता उस समय अनुनय विनय के साथ जूनागढ़ और हैदराबाद को एक अलग रियासत ( राष्ट्र ) मानते हुए अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे थे। जबकि सावरकर जी जैसे लोग इस बात को लेकर आंदोलित और व्यथित थे कि भारतीय राष्ट्र की भूमि के भीतर ही कुछ लोग अलग-अलग राष्ट्रीयता की बात कर रहे थे। जो लोग उस समय भारतीय राष्ट्र को तोड़ने की बात कर रहे थे उसे सावरकर जी कोढ की बीमारी मानते थे, जबकि नेहरू और गांधी जी उस कोढ को सामूहिक दुराचरण की परिणति मानते थे। उनकी सोच थी कि इस कोढ़ को पैदा करने में वे हिंदू भी बराबर के जिम्मेदार हैं, जो उस समय देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए कृत संकल्प थे और पिछली कई शताब्दियों से देश विरोधी लोगों का सामना अपने बलिदान दे देकर करते आ रहे थे। उनकी दृष्टि में देशभक्त और देश विरोधी दोनों बराबर थे, जबकि सावरकर जी देशभक्त और देश विरोधी दोनों में अंतर करके देखने के समर्थक थे।

आर्य समाज और हिंदू महासभा की देशभक्ति

मुस्लिम सांप्रदायिकता के साथ पूरी तरह एकाकार हो गए नवाब हैदराबाद और जूनागढ़ के नवाब के प्रति सावरकर जी का कठोर दृष्टिकोण था। वे जानते थे कि उनकी सोच पूर्णतया सांप्रदायिक है और इनके राज्य में हिंदू जनता के साथ जो कुछ भी होता रहा है वह पूर्णतया अन्याय पर आधारित रहा है। निजाम हैदराबाद के विरुद्ध हुए आंदोलन में कांग्रेस दूर से ही हाथ सेंक रही थी। जबकि आर्य समाज और हिंदू महासभा ने मिलकर वहां पर हैदराबाद के विरुद्ध आंदोलन कर हिंदुओं के अधिकार दिलवाने का प्रशंसनीय कार्य किया था। आर्य समाज और हिंदू महासभा दोनों ने मिलकर उस समय राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए काम किया। वे चुन चुनकर उन देश विरोधी लोगों की निशानदेही कर रहे थे जिनके मन मस्तिष्क भारत को उजाड़ने की योजनाओं में लगे हुए थे। सावरकर जी आर्य समाज के राष्ट्रपरक कार्यों से अत्यधिक प्रभावित थे। यही कारण था कि आर्य समाज के स्वामी श्रद्धानंद जैसे महान तेजस्वी नायकों के प्रति वह सदा ही विनम्र रहे। इतना ही नहीं जब गांधी जी ने स्वामी श्रद्धानंद जी के हत्यारे को ‘भाई’ कहा था तो उस समय सावरकर जी अत्यधिक आग बबूला हो गए थे।

नवाब हैदराबाद और नवाब जूनागढ़

नवाब हैदराबाद के उस आचरण की यदि समीक्षा की जाए तो पता चलता है कि वह देश के भीतर ही एक नया पाकिस्तान बनाने की योजना पर कार्य कर रहा था। वह जिन्नाह के साथ समानांतर रूप से एक नया जिन्नाह खड़ा हो गया था। देश विभाजन के संदर्भ में हमें जिन्नाह के साथ-साथ इन दोनों नवाबों के आचरण की भी समीक्षा करनी चाहिए। जिससे यह पता चलेगा कि देश में उस समय द्विराष्ट्रवाद की बात न होकर कई राष्ट्रों की बात हो रही थी।
हम द्विराष्ट्रवाद की बात करते – करते जूनागढ़ और हैदराबाद द्वारा बनाए जा रहे दो अन्य राष्ट्रों की मांग को भूल जाते हैं। इसके साथ-साथ कश्मीर के शेख अब्दुल्ला ने किस प्रकार अपनी चालाकी से तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व का मूर्ख बनाकर और राजा हरि सिंह को बदनाम करवाकर जम्मू कश्मीर जैसी महत्वपूर्ण रियासत को एक ‘मुस्लिम राज्य’ के रूप में अपने लिए हथिया लिया और भारत के भीतर ही एक शांत ‘मुस्लिम राष्ट्र’ बनाने में सफल हो गया, हम इसको भी उपेक्षित कर देते हैं।
जम्मू कश्मीर के इसी शांत ‘मुस्लिम राष्ट्र’ में जहां कभी शेख अब्दुल्ला ने ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो’ का राग अलापा था, वहीं अनुकूल समय आने पर 1989 में जाकर ‘हिंदुओ ! कश्मीर छोड़ो’ का महाराग अलापा गया। इन सब घटनाओं को एक साथ जोड़ कर देखने की आवश्यकता है।
‘कैसे बना था पाकिस्तान’ के लेखक डॉ मोहन लाल गुप्ता हमें बताते हैं कि ‘निजाम को अपने राज्य के विशाल भू-भाग, विपुल धन-सम्पत्ति ब्रिटिश शासकों से पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सम्बन्धों तथा विशाल सेना पर बड़ा भरोसा था इसलिये वह हैदराबाद राज्य को भारत अथवा पाकिस्तान में मिलाने के स्थान पर स्वतन्त्र देश बनाना चाहता था। निजाम को विश्वास था कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी तथा ब्रिटिश क्राउन से समय-समय पर जो संधियां की गई थीं, उनके बल पर वह हैदराबाद को स्वतंत्र बनाये रखने में सफल होगा। जब 15 मार्च 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारतीयों के आत्मनिर्णय के अधिकार को स्वीकार करने की घोषणा की, तभी से निजाम ने अपने राज्य को स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दिलवाने के प्रयास आरम्भ कर दिये। निजाम, लॉर्ड माउण्टबेटन को अपना मित्र मानता था तथा उसे विश्वास था कि माउण्टबेटन हैदराबाद को भारत एवं पाकिस्तान से अलग डोमिनियन नेशन के रूप में मान्यता दिलवाने में निजाम की सहायता करेगा। हैदाराबाद को इस तरह का आचरण करते देख सरदार पटेल को कहना पड़ा कि ‘हैदराबाद भारत के पेट में नासूर की तरह है।’
निजाम हैदराबाद पिछले लंबे काल से अपने पूर्वजों के और अंग्रेजों के संबंधों की दुहाई देते हुए अंग्रेजों को इस बात के लिए प्रसन्न करना चाहता था कि वह उसे एक अलग देश बनाने की अनुमति प्रदान करें और उसमें उसकी सहायता भी करें। अपने इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए निजाम हैदराबाद ने तब 9 जून 1947 को वायसराय माउण्टबेटन को एक पत्र लिखा था । उस पत्र को भी डॉ मोहन लाल गुप्ता ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में स्थान दिया है।

निजाम हैदराबाद का वायसराय को पत्र

इस पत्र में वह लिखता है- 'पिछले कुछ दिनों में मैंने स्वाधीनता बिल का सातवां क्लॉज जैसा कि अखबारों में आया है, देखा। मुझे अफसोस है कि पिछले महिनों में जैसा अक्सर होता रहा, कि इस मामले में राजनैतिक नेताओं से अच्छी तरह बातचीत की गई और रजवाड़ों के प्रतिनिधियों से बातचीत तो दूर, उन्हें यह दिखाया भी नहीं गया। यह देखकर मुझे दुःख हुआ कि यह बिल न सिर्फ एकतरफा ढंग से ब्रिटिश सरकार के साथ की गई संधियों और समझौतों को रद्द करता है बल्कि यह आभास भी देता है कि अगर हैदराबाद पाकिस्तान या हिन्दुस्तान का हिस्सा नहीं बन सका तो ब्रिटिश कॉमनवैल्थ में भी नहीं रह सकेगा। जिन संधियों के आधार पर बरसों पहले ब्रिटिश सरकार ने विदेशी हमले और आंतरिक विद्रोह के खिलाफ मेरे खानदान और इस राज्य को बचाने का वादा किया था, उसकी हमेशा दाद दी जाती रही और हिमायत होती रही। इनमें सर स्टैफर्ड क्रिप्स का 1941 का वादा प्रमुख है। 
मैंने समझा था कि ब्रिटिश फौज और वादे पर मैं अच्छी तरह भरोसा कर सकता हूँ। मैं अपनी फौज नहीं बढ़ाने पर राजी हो गया, अपने कारखानों में हथियार नहीं तैयार करने के लिये राजी हो गया। और उधर हमारी सहमति तो दूर, हमसे या हमारी सरकार से सलाह किये बगैर बिल पास हो गया। आपको पता है कि जब आप इंग्लैण्ड में थे, मैंने मांग की थी कि जब अँग्रेज हिन्दुस्तान छोड़कर जायें तो हमें भी उपनिवेश का दर्जा मिले। मैंने हमेशा महसूस किया है कि एक शताब्दी से ज्यादा की वफादार दोस्ती, जिसमें हमने अँग्रेजों को अपना सारा विश्वास दिया, का इतना तो नतीजा होगा ही कि बिना किसी सवाल के हमें कॉमनवेल्थ में रहने दिया जाये। लेकिन अब लगता है कि वह भी इन्कार किया जा रहा है। मैं अब भी उम्मीद करता हूँ कि किसी तरह का मतभेद मेरे और ब्रिटिश सरकार के सीधे रिश्ते के बीच नहीं आयेगा। हाल में ही मुझे बताया गया कि आपने यह भार अपने ऊपर ले लिया है कि पार्लियामेंट में ऐसी घोषणा होगी ताकि ऐसे सम्बन्ध सम्भव हों।'

निजाम हैदराबाद और अंग्रेजों की थी गुप्त संधि ?

नवाब हैदराबाद के इस पत्र से पता चलता है कि वह स्वयं ही नहीं बल्कि उसके पूर्वज भी अंग्रेजों के साथ मिलकर अपना एक अलग देश लेने बनाने की तैयारी कर रहे थे। नवाब हैदराबाद के इस राज्य में हिंदुओं के साथ जो कुछ भी हो रहा था वह सब भी नवाब और अंग्रेजों की गुपचुप की गई संधियों के आधार पर ही हो रहा था । उसकी तैयारी थी कि हिंदूविहीन राज्य बनाकर वह अपने सपनों का एक नया पाकिस्तान भारत के भीतर ही तैयार करे। इसलिए सरदार पटेल ने उसके सपनों के पाकिस्तान को भारत के पेट के भीतर नासूर की संज्ञा दी थी।
अब जो लोग यह कहते हैं कि सावरकर जी के कारण देश विभाजन हुआ या हिंदू सांप्रदायिकता के परिणामस्वरूप पाकिस्तान बना तो नवाब हैदराबाद को कौन सी सांप्रदायिकता नया पाकिस्तान बनाने के लिए प्रेरित कर रही थी? इस पर भी विचार किया जाना अपेक्षित है। यदि इस विषय पर निष्पक्षता के साथ चिंतन किया जाए तो स्पष्ट होता है कि नवाब हैदराबाद को केवल और केवल मुस्लिम सांप्रदायिकता ही एक नया पाकिस्तान भारत के भीतर बनाने की प्रेरणा दे रही थी। इसी सांप्रदायिक सोच के कारण निजाम हैदराबाद ने जब 1947 में हैदराबाद में विधानसभा बनाई तो उसमें 48 पद मुसलमानों के लिए और 38 पद हिंदुओं के लिए रखे गए। उसके द्वारा ऐसी व्यवस्था करने का एकमात्र कारण यही था कि यदि भविष्य में कोई कानून बनाया जाए तो उस कानून के माध्यम से मुस्लिम जनता के अधिकारों का किसी भी प्रकार से अतिक्रमण ना होने पाए। उसके राज्य में है 85% हिंदू थे । इसके उपरांत भी बस मुस्लिम शासन होने के आधार पर उन पर अनेक प्रकार के अमानवीय अत्याचार किए जा रहे थे। इस प्रकार के अत्याचार हैदराबाद के नवाब के पूर्ववर्ती शासक भी करते आए थे।
गांधीजी और नेहरु जी की नजरों में इस प्रकार के अत्याचार अत्याचार ही नहीं थे । जबकि सावरकर जी इस प्रकार के अत्याचारों का भंडाफोड़ करने में विश्वास रखते थे। वह किसी भी स्थिति में इस प्रकार के अत्याचारों को सहन करने को तैयार नहीं होते थे। यही कारण है कि कांग्रेसियों ने अपने नेताओं से इतर राय रखने के कारण सावरकर जी को हिंदू सांप्रदायिकता का जनक कहा।

वायसराय का निजाम हैदराबाद को उत्तर

उपरोक्त पुस्तक के लेखक आगे लिखते हैं कि ‘वासयराय माउण्टबेटन ने नवाब को सूचित किया कि हैदराबाद को उपनिवेश का दर्जा नहीं दिया जा सकता क्योंकि इसके चारों ओर उस देश का हिस्सा होगा जो इस स्थिति में दुश्मन बन जायेगा। ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में हैदराबाद के लिये एक ही रास्ता है कि वह हिन्दुस्तान में सम्मिलित हो जाये किंतु हैदराबाद के अधिकारियों एवं कोनार्ड कोरफील्ड के कहने पर चल रहे भारत सरकार के राजनैतिक विभाग के अधिकारियों ने नवाब को सलाह दी कि वह वायसराय की सलाह को न माने। 7 अगस्त 1947 को कांग्रेस ने सरदार पटेल के निर्देश पर हैदराबाद रियासत में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ किया। निजाम ने इस आंदोलन को सख्ती से कुचलने के लिये रियासती पुलिस के साथ-साथ कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित किया। इस कारण यह आंदोलन हिंसक हो गया। इसी समय तेलंगाना में कम्युनिस्टों के नेतृत्व में एक शक्तिशाली किसान संघर्ष भी हुआ।
वायसराय के दबाव से नवम्बर 1947 में निजाम ने भारत के साथ ‘स्टॅडस्टिल एग्रीमेंट’ पर दस्तखत कर दिये जिसके अनुसार भारत और हैदराबाद के बीच पोस्ट ऑफिस, टेलिग्राफ, रेल, सड़क यातायात एवं व्यापार आदि सुचारू रूप से जारी रहें परन्तु निजाम, भारत संघ में सम्मिलित होने की बात को टालता रहा। इसी के साथ-साथ वह अपने राज्य में कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम रजाकारों को भी प्रोत्साहित करता रहा। निजाम ने रजाकारों को विश्वास दिलाया कि जब हम विद्रोह करेंगे तो हमारे अँग्रेज दोस्त हमारी सहायता करेंगे। निजाम की शह पाकर मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन इतिदाद-उल-मुसलमीन और उसके अर्द्ध सैनिक रजाकारों ने हैदराबाद रियासत के बहुसंख्यक हिन्दुओं को डराना-धमकाना तथा लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया ।’

निजाम हैदराबाद का ‘नकली दान’

इसी निजाम हैदराबाद को देशभक्त दिखाने के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों ने बाद में यह कहकर सम्मानित करने का प्रयास किया कि उन्होंने अपनी देशभक्ति का परिचय देते हुए देश के लिए 5000 किलो सोना दान किया था। इस नकली भामाशाह की सच्चाई ‘जी न्यूज़’ ने लोगों को बताई।
जिससे स्पष्ट हुआ कि नवाब हैदराबाद मीर उस्मान अली खान अंग्रेजों के वक्त अपनी अमीरी के लिए जाने जाते थे। कहा जाता है कि उन्होंने भारत सरकार को 5 हजार किलो सोना दान में दिया था। इससे पता चलता है कि वो कितने अमीर थे ? दरअसल, 1965 में भारत-पाक के बीच युद्ध हुआ और भारत की इसमें जीत हुई, लेकिन इस युद्ध की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था डगमगा गई थी। डगमगाती अर्थव्यवस्था को सही करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने राहत कोष के लिए अपील की। इसी बीच वो हैदराबाद के निजाम से भी मिले।
मीर उस्मान अली खान ने बेगमपेट हवाई अड्डे पर तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का स्वागत किया। दोनों के बीच काफी चर्चा हुई और इसके बाद उस्मान अली ने पांच हजार किलो सोना राहत कोष के नाम पर दिया। हालांकि सरकार के पास निजाम द्वारा दान किए गए सोने की कोई जानकारी नहीं है। इससे जुड़ी आर0टी0आई0 में ये जानकारी प्राप्त हुई है कि उस्मान अली खान ने सोना दान नहीं बल्कि नेशनल डिफेंस गोल्ड स्कीम में अपना 425 किलो सोना निवेश किया था, जिसका उन्हें 6.5 फीसदी की दर से ब्याज भी मिलना था।’
इन बनावटी ‘भामाशाहों’ के इस प्रकार के घोटालों पर यदि आप चुप रहते हैं तब तो आप देश के प्रबुद्ध और प्रगतिशील नागरिक माने जाओगे और यदि आप उनके बारे में कांग्रेसी इतिहास लेखकों के द्वारा बनाए गए भ्रामक या मिथ्या आभामंडल का भंडाफोड़ करते हैं तो समझ लीजिए कि आप भी हिन्दू सांप्रदायिकता की मानसिकता से ग्रस्त माने जाओगे।
बस, इसी मानसिकता के फलस्वरूप सावरकर जी को भी हिंदू सांप्रदायिकता की सोच का नेता कहा गया है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betlike giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betlike giriş
betparibu giriş
betparibu giriş
betebet giriş
norabahis giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş