भाजपा का अन्तर्कलह अपने उफान पर है। पार्टी के दिग्गजों का अहंकार पार्टी में धीरे-धीरे एक फोड़ा बनता जा रहा है। नरेन्दमोदी और संजय जोशी की टकरार में यह फोड़ा पकता हुआ नजर आया। आडवाणी जैसे राजनीति के चतुर खिलाड़ी ने समझ लिया कि फोड़ा पक रहा है और इसकी मवाद में चीरा लगते ही गन्दगी की पिचकारी दूर-दूर तक जायगी, इसलिए पके हुए फोडे पर हाथ रखकर मोदी और उनके अन्य साथियों को सीख देने लगे कि भाजपा से लोग वैसे ही निराश है, तुम क्यों पार्टी की मिर्टी पीटते हो ? आडवाणी की सीख पार्टी को उल्टी पड़ी । इसी को विनाश काले विपरीत बुद्घि: कहा जाता है। अत: नरेन्द्र के खिलाफ जोशी पोस्टर युद्घ पर उतर आये, नरेन्द्र मोदी और भी अधिक रौद्ररूप में आ गये। पटाक्षेप हुआ कि संजय जोशी पार्टी छोड़ गये। भाजपा की अन्दरूनी जंग में पैनापन आ गया है। गम्भीर नेता और पार्टी के लोग भाजपा की फजीहत से दुखी हैं। यदि वो इस खेल में मैदान में आते हैं तो गलत होगा और यदि दूर से देखते हैं तो भी गलत होगा। बीच बचाव की कोई मान नही रहा। सम्भवत: भाजपा पिछले कई वर्ष से जिस ऊहापोह और दोगलेपन का शिकार थी सम्भवत: अब ऊहापोह या दोगलेपन के मुखौटे को उतार फेकने का या उसे और भी अच्छे ढंग से ओढऩे के दोराहे पर भाजपा खड़ी है। यदि भाजपा अपनी ऊहापोह और दोगलेपन की केंचुली छोड़ती है, तो मोदी की जीत होती है और यदि उन्हे और भी गहराई से मजबूती के साथ पकड़ती है तो भाजपा के कांग्रेसी करण की प्रक्रिया का मार्ग खुलता है। इस समय मोदी की भाषा लगता है कि अहंकारी हो गयी है। संघ और कुछ भाजपायी उन्हे सम्भवत: शान्त और संयत रहकर चलने की सीख दे रहे थे, लेकिन उनके अहंकार ने उन्हे 2014 के आम चुनाव के दृष्टिगत पार्टी में सफाई अभियान की शिक्षा दे डाली। पार्टियों में सफाई अभियानों के नाम पर संघर्षो की कथा पुरानी है। देश की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधीजब बनीं तो कांग्रेस भी दोफाड़ हो गई थी। कांग्रेस में उस समय संकट था – नेहरू के बाद कौन का। नेहरू जी गये तो लालबहादुर शास्त्री को या इन्दिरा इन्दिरा गांधी को कुछ ऐसे महत्वाकांक्षी कंाग्रेसियों ने अपना नेता नही माना जो स्वयं को नेहरू के बाद कौन का जबाब मानते थे । जब भिन्न भिन्न मत्वाकांक्षाएं साथ-साथ चलने लगती हैं तो काल उनके सामने भीत बनकर खड़ा हो जाता है। कहता है कि पहले ये तय करो कि तुममें से मुझ पर सवारी करने की स्थिति में कौन है? तब उन महत्वाकांक्षाओं में टकराव होता है। और हम देखते हैं कि उनमें से कोई एक ही समय के घोड़े पर सवार होकर चल निकलता है।
शेष या तो धराशायी हो जाते हैं या फिर विजेता के साथ अपना समन्वय बैठा लेते हैं। इन्दिरा गांधी ने अपने समय की सारी प्रतिभाओं को पीछे छोड़ा उन्हे तोड़ा और अपनी मनचाही दिशा में मोड़ा तो उसका परिणाम आया कि कांग्रेस इन्दिरामय हो हो गई। हमारा उद्देश्य इन्दिरा गांधी की प्रशस्ति करना नहीं है, मात्र वस्तुस्थिति पर प्रकाश डालना है। अब नरेन्द्र मोदी उसी अबस्था में खड़े हैं। वह भाजपा को मोदीमय करने के लिए कटिबद्घ नजर आते हैं। वह अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करें, यह उनका अधिकार हैं। परन्तु इन्दिरा गांधी की जीवनी से कुछ सीख लें। इन्दिरा एक बार कांग्रेसी दिग्गजों को पीछे छोडऩे में सफल तो हो गईं थीं पर इसके बाद वह जिद्दी हो गयी थीं। उन्हे जमाना अपनी मुटठी में नजर आता था। उन्हें संकटों से खेलना नहीं आया उन्होंने आपातकाल लगाया तो डरकर लगाया, हडबड़ी में लगाया कोई सयाना उनके घर में उन्हे सलाह देने के लिए नहीं था। उनके इस डर का प्रचार प्रसार जनता में ऐसे हुआ कि जैसे वह कितनी ताकतवर हैं। वह ताकतवर नहीं थी बल्कि भीतर के डर ने उन्हे ताकत का गलत प्रयोग करना सिखाया और वह जिददी और घमंड़ी बन बैठीं। यही स्थिति मोदी की हो सकती है, यदि उन्होने सारे बड़े भजपाईयों व पार्टी के दिशानायक संघ से एक साथ छुटकारा पाने का प्रयास किया वे भाजपा के लिए इन्दिरा गांधी भी हो सकते हैं। अच्छा हो कि वह अपने अहंकार को मारकर चलें और विवेक और धैर्य का परिचय दें। प्राकृतिक शक्ति यदि उनसे कोई बड़ा कार्य कराना चाहती है तो वह उनसे उसे कराएगी ही , पर उस बड़े कार्य को एक अलग और अनोखी पहचान तो उनका अपना विवेक और धैर्य ही देगा । प्रकृति हर व्यक्ति को बड़ा बनने और बड़ा कार्य करने की प्रेरणा और अवसर दोनों देती है । समझदारी प्रेरणा और अवसर को समझने में दिखानी चाहिए । इसलिए मोदी बड़े नेताओ के गुस्से को शांत करें । सफाई अभियान का अर्थ निर्ममता का प्रदर्शन नहीं होता है और न ही अहंकार में बृद्धि करना होता है। जनता की भावनाओं का सम्मान संगठन के बड़े नेताओं का सम्मान करते हुए भी अपने आप को बढाना आदमी की अपनी कला होती है, जो व्यक्ति के व्यक्तित्व में चार चांद लगाती है। यदि मोदी इस कला से शून्य हैं तो वह अपना संगठन का भला नही कर पायेंगे। गलती पर संजय जोशी भी रहें हैं। उन्होने पोस्टर युद्घ छेडकर अच्छा नही किया। महाभारत के युद्घ के पश्चात श्री कृष्ण पांचों पाण्डवों को साथ लेकर महाराज धृतराष्ट्र के पास गये। धृतराष्ट्र ने अन्य पाण्डवों को तो आशीर्वाद सच्चे मन से दिया लेकिन अपने बेटे दुर्योंधन की मृत्यु के दुख में व्याकुल धृतराष्ट्र भीम को आशीर्वाद देना नही चाहते थे। इसलिए उन्होने भीम को अपनी बाहों में लिया और उसे तोड़ डाला। यहां श्रीकृष्ण की समझदारी थी कि उन्होंने असली भीम को पीछे रोक लिया था और एक लोहे के भीम को धृतराष्ट्र के सामने कर दिया था। श्रीकृष्ण अंहकारी नहीं थे, परन्तु विवेकी पुरूष थे । उन्होंने समझ लिया था कि आज हम हस्तिनापुर के महाराज से मिलने नहीं जा रहे हैं, अपितु दिवंगत दुर्योंधन के पिता से मिलने जा रहे हैं। जहां भावनायें कत्र्तव्य से आगे खड़ी होंगी, और कुछ भी संभव है । इसलिये उन्होने समझदारी का प्रदर्शन किया । फलस्वरूप एक अनर्थ होने से बच गया । यही बात नरेंद्र मोदी को समझनी होगी । वह घायल लोगों के दिलों का दर्द हल्का करें और उनका पूरा सम्मान करते हुये पार्टी को विखण्डन से बचाएं । जिस नेता का पार्टी के उत्थान में जितना सहयोग रहा है वह उसे स्वीकार करें और किसी गलतफहमी के या गलत लोगों के शिकार न बनें ।
भाजपा के बड़े नेता स्थिति को संभालें ,और समझें कि ऐसा क्यों हो गया है ? संजय जोशी अच्छे हो सकते हैं ,हम उनके विषय में कुछ नहीं लिख रहे लेकिन संजय जोशी तो मात्र एक बहाना हैं।
भाजपा अन्तर्मंन्थन करे कि क्या जोशी इतने बड़े थे कि जिससे भाजपा हिल उठी या भाजपा की भूलें इतनी भारी हो गयी थीं कि जिनसे पार्टी नई नई सूनामियों का शिकार हो रही है । इस अन्तर्मंथन के सही जवाब में ही पार्टी का भला छिपा है।

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