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फक्कड़ अलगोजा वादक याकूब खाँ होंठों से फिजाओं तक बरसता है प्रणय का सुरीला संगीत, निराला है सूफियाना अन्दाज

दीपक आचार्य
9413306077

        मरु भूमि का पारम्परिक लोकवाद्य अलगोजा जब कलाकार के होंठों का स्पर्श पाता है तब फ़िजाँ में ऐसी सुरीली तान घुलने लगती है कि सुनने वाला मदमस्त हो प्रकृति और प्रणय के मधुर रसों का आस्वादन करने लगता है।

        मरुधरा कलाकारों की खान रही है जहाँ एक से बढ़कर एक कलाकार हैं, जिन्होंने देश-दुनिया में अपना नाम कमाया है। उम्दा कलाकारों की एक सुदीर्घ श्रृंखला ऐसी भी है जो अपने फन में माहिर होने के बावजूद ‘स्वान्तः सुखाय’ जीवन जीने का आनंद ले रही है। इन्हें दुनियावी झंझटों की बजाय अपनी ही मस्ती में जीने की आदत हैं। जब ये कलाकार रियाज में रमे रहते हैं तब सारी दुनिया भूलकर अपने आप में इतना खो जाते हैं कि अंदर की मस्ती में गोता लगाते हुए संसार भुला बैठते हैं।

        ऐसे ही फक्कड़ और मंजे हुए लोक कलाकार हैं जैसलमेर जिले की लूणार ग्राम पंचायत के अन्तर्गत ओकरड़ा के 65 वर्षीय कलाकार याकूब खाँ।

        अदले खां के घर जन्मे याकूब खां को कला-संस्कृति का देहाती परिवेश विरासत में मिला। ठेठ ग्रामीण परिवेश में रहने वाले याकूब का औपचारिक शिक्षा से कभी कोई नाता नहीं रहा मगर जीवन व्यवहार की शिक्षा में वे जरूर पारंगत हैं।

        बचपन से ही अलगोजा वाद्य का शौक उन्हें रहा है और उसी समय से निरंतर अभ्यास ने आज उन्हें इस मुकाम पर पहुँचा दिया है कि वे अलगोजा वादन के सिद्धहस्त कलाकार के रूप में मशहूर हैं।

        अलगोजा एक प्रकार का बाँसुरी की तरह लम्बा वाद्ययंत्र है जो जोड़ी में ही बजाया जाता है। इसमें एक नर व दूसरा मादी (नारी) होता है और दोनों के ही स्वर अलग-अलग निकलते हैं।

        बचपन से शौक

        अलगोजा पुराने जमाने से चला आ रहा वाद्य है जिसे चरवाहे अपनी थकान मिटाने के लिए बजाते रहे हैं। याकूब खां ने अलगोजा बजाने का विधिवत प्रशिक्षण तब लिया जब उनकी उम्र 25 वर्ष की थी। लोक प्रसिद्ध कलाकार बाँधा निवासी धन्ने खां से उन्होंने अलगोजावादन की दीक्षा ली। मौलवी परिवार से संबंधित याकूब खाँ ने अलगोजा वादन को अपना पेशा नहीं बनाया वरन इसे शौक के रूप में ही पल्लवित किया।

        यही वजह है कि सदा मुस्कान बिखेरने वाले याकूब जब अलगोजावादन की मस्ती में डूब जाते हैं तब घण्टे गुजर जाने का पता ही नहीं लगता। कभी सरोवर की पाल तो कभी खेतों में या दोस्तों के साथ महफिल में, वे और उनका अलगोजा जब मिल जाते हैं तो कमाल हो उठता है।

        दूर-दूर तक है पहचान

        अलगोजा के फक्कड़ कलाकार याकूब खां के फन का कमाल दूर-दूर तक इन्हें लोकप्रियता दिलाये हुए है। चाहे विश्वविख्यात मरु महोत्सव हो या फिर राजस्थान, गुजरात और दिल्ली के भव्य और मशहूर सांस्कृतिक आयोजन। याकूब खां का हुनर हर कहीं मुखरित होता रहा है।

        स्वाभिमानी और सूफियाई अंदाज से भरे याकूब कभी अपनी ओर से किसी से आग्रह नहीं करते, कहीं आत्मीयता के साथ न्यौता मिला और मन माना, तभी वे शरीक होते हैं।

        अपने अलगोजा वादन में राजस्थानी, हिन्दी श्रृंगार गीतों को वे ख़ास तरजीह देते हैं। राजस्थानी गीत ’’रूपिड़ा’’ उनकी विशेष पसन्द है जिसे अलगोजा के स्वरों पर वे तरन्नुम के साथ सुनाते हैं। उनके अलगोजा वादन में सिद्धि कलाम, मारवी, मल्हारी, मूमल, भैरवी, सिद्धि राणा, सूफी कलाम, सिंधी, राजस्थानी पणिहारी, डोरा गीत, मूमल गीत आदि का ख़ास प्रभाव दृष्टिगत होता है।

        सहज सरल व्यक्तित्व के धनी

        याकूब आम ग्रामीणों की तरह आजीविका के लिए खेती-बाड़ी पर निर्भर हैं। बरसात होने पर ग्वार, मूंग, बाजरी होती है अन्यथा मजूरी पर निर्भर रहना पड़ता है। यदा-कदा होने वाले साँस्कृतिक कार्यक्रमों में अलगोजा वादन पर प्रेम से जो कुछ मिल जाता है, स्वीकार कर लेते हैं।

        याकूब बताते हैं कि अलगुर्जा (अलगोजा ) मूलतः सिंध ( अब पाकिस्तान ) का वाद्ययंत्र है जो 300 वर्ष पूर्व राजस्थान की लोक संस्कृति में समाया और तभी से बजता चला आ रहा है। अब अलगोजा यहाँ भी बनने लगे हैं। इस समय अलगोजा वादन करने वाले कोई दो दर्जन से अधिक कलाकार हैं।

        प्रणय की तान सुनाता है याकूब का अलगोजा

        वे बताते हैं कि अलगोजा नर-मादा होते हैं जिन्हें ’’लैला-मजनूं’’ भी कहते हैं। जब इनकी जोड़ी मिलती है तभी प्रणय की युगल स्वर लहरियाँ  प्रेम का संगीत सुनाती हैं। इसी आकार में ससूई-पुनू भी है जिनकी जोड़ी से पूँगी का सुर निकलता है व इससे आकर्षित होकर नाग-नागिन तक करीब आ जाते हैं। यों तो याकूब का घर जैसलमेर से 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ओकरड़ा में है मगर अक्सर वह शहर आते-जाते रहते हैं।

        अलगोजा वादन के ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश में याकूब निरन्तर प्रयासरत हैं। उन्होंने अपने कुछ शिष्य भी तैयार किए हैं जो उनसे अलगोजा वादन के गुर सीख रहे हैं।

        श्री याकूब खान् के हुनर से परिचित होने का मौका अपने दोनों ही बार के जैसलमेर कार्यकाल के दौरान् मिला। ऐसे फक्कड़ कलाकार हमेशा अपनी रुहानी मस्ती में ही जीते हुए खुद भी आत्म आनन्द का अनुभव करते हैं और जगत को भी आनंदित करते रहते हैं।

                                                                    --000--
  • डॉ. दीपक आचार्य

35, महालक्ष्मी चौक,

बांसवाड़ा-327001

(राजस्थान)

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