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भारतीय संस्कृति

कश्मीर में खिली उम्मीद की कली

लगता है कि कश्मीर घाटी में सामान्य जनजीवन पटरी पर लौट रहा है। जम्मू कश्मीर में आतंकी गतिविधियों में बीते कुछ महीनों के दौरान खासी कमी आई है। वर्ष 2010 में अलगाववादियों के बहकावे में आकर पत्थरबाजी पर उतारू होने के बाद लहुलुहान हुई घाटी में यह बदलाव सबको महसूस हो रहा है। इस बार गर्मियों के मौसम में पर्यटकों की संख्या में हुआ इजाफा इस का मुंहबोलता प्रमाण है। ताजा खबर यह है कि बरसों से पर्यटकों से वंचित श्रीनगर का पुराना शहर, जिसे कि शहरे-खास भी कहा जाता है, भी अब सैलानियों के स्वागत कर रहा है। भारतीय सेना और केंद्र सरकार इस नई बयार पर सुकून महसूस कर रहे हैं तो अलगाव के अलाव पर रोटी सेंकने वालों के पांवों तले से जमीन खिसक रही है।
यूं भी कहा जा सकता है कि धरातल पर आए इस बदलाव को विभिन्न पक्षों के लोग अपने अपने नजरिए से देख और नाप-तोल रहे हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। मसलन, मुख्यमंत्री उमर अब्दुला माहौल में आए बदलाव को आधार बनाकर राज्य के कुछ हिस्सों से सुरक्षा बल विशेष शक्तियां अधिनियम यानि अफस्पा हटाने की रट लगाए हुए हैं। उन्हें शायद यह भी लगता होगा कि उनका सुशासन हालात में सुधार के लिए उत्तरदायी है। जम्मू कश्मीर में 11 महीने तक यहां वहां-भटकने के बाद पूर्वनिर्धारित तर्ज पर देशघाती रिपोर्ट लिखने वाले वार्ताकार समूह का नजरिया कुछ और ही है। अलगाववादियों और भारतद्रोहियों की शब्दावली में भारत के लिए घाटे का घाटी-राग अलाप कर जम्मू कश्मीर के सवाल को उलझाने की आरोपी यह तिकड़ी भी आत्मविमोह से ग्रस्त है। इन्हें लगता है कि राज्य के हालात में सुधार की जमीन तो इनकी यात्राओं और वार्ताओं ने ही तैयार की है। दिलीप पडग़ांवकर और उनकी जुंडली ने जिस निर्लज्जता के साथ अपनी रपट में राज्य के शांति की ओर बढ़ते कदमों के लिए अपनी पीठ थपथपाई है,उस पर सिर्फ हंसा ही जा सकता है।
जम्मू कश्मीर के घटनाचक्र पर पैनी निगाह रखने वालों की राय इस तिकड़ी से मेल नहीं खाती। इसमें संदेह नहीं कि घाटी में हिंसक घटनाओं की संख्या उत्तरोत्तर घटी है।
आंकड़े और घाटी का माहौल दोनों इसकी गवाही देते हैं। मगर इस सुकूनदायी नजारे के एक से अधिक कारण हो सकते हैं। इनमें सबसे अहम कारण है सरहद पार से आयात होने वाले आंतक पर लगा अंकुश। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि सौ साल तक भी कश्मीर के लिए हिंदुस्थान से जंग लडऩे की बात करने वाले हमारे नापाक पड़ौसी को एकाएक सदबुद्धि आ गई है।

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