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विद्यार्थियों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति और सरकार की नीतियां

ललित गर्ग

जहन में एक ही सवाल बार-बार उठता है कि आखिर बच्चों पर प्रेशर बनाता कौन है? कोचिंग इंस्टीट्यूट की तरफ से पढ़ाई का दबाव रहता है या फैमिली प्रेशर से या फिर मनचाहे परीक्षा परिणाम नहीं मिलने पर छात्र इस कदर दबाव में आ जाते हैं कि सुसाइड जैसे कदम उठा लेते हैं।
नया भारत-सशक्त भारत बनाने की बात हो रही है, नई शिक्षा नीति-2020 को प्रभावी तरीके से लागू किया जा रहा, शिक्षा के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करते हुए उस पर सर्वाधिक ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन इन सब प्रयत्नों के बावजूद चिंता की बात यह है कि पूरे देश में खुदकुशी करने वाले छात्रों की संख्या बढ़ रही है। साल 2020 में 12500 से अधिक, तो 2021 में 13,000 छात्रों ने आत्महत्या की। ये आंकड़े नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के हैं। कोटा में इसी रविवार को दो और छात्रों ने खुदकुशी कर ली। इसके साथ इस साल कोटा में आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या 23 हो गई है, जो बहुत ही गंभीर मसला है। राजस्थान की इस शिक्षा नगरी में दो महीनों में 9 छात्रों ने सुसाइड कर चुके हैं। यहां लगातार छात्र आत्महत्या कर रहे हैं, इसके पीछे सरकार, प्रशासन या कोचिंग इंस्टिट्यूट की लापरवाही है या कुछ और? सुसाइड हब बन रहे कोटा के इस स्याह पक्ष को लेकर अब इस आपदा का हल तो ढूंढ़ना होगा। ऐसा नहीं है कि महामारी बनती इस समस्या के कारण हमें नहीं पता।

आजादी के अमृतकाल को सार्थक करने में शिक्षा की सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकारा जा रहा है, कहा भी जा रहा है कि शिक्षा ही एक ऐसा हथियार भी है जिससे इंसान न केवल खुद को, बल्कि समाज, राष्ट्र एवं दुनिया को भी बदल सकता है। फिर शिक्षा के आसपास ऐसी कौन-सी विसंगतियां एवं विडम्बना है कि छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। सब जानते हैं कि शिक्षा के व्यवसाय बनने से उसमें अनेक कुचेष्टाएं प्रवेश कर रही हैं, छात्रों से अच्छे परीक्षा परिणाम देने का दबाव बनाया जा रहा है, अधिक प्रतिस्पर्धा एवं होड ने छात्रों पर प्रेशर बनाया है, इसके साथ ही किस तरह से पैरंट्स अपने सपने बच्चों पर थोपते हैं। उन्हें आईआईटी, एनआईटी या मेडिकल में ही बच्चों का सुनहरा भविष्य दिखता है, जिसे साकार करने के लिए कई अभिभावक कर्ज भी लेते हैं। मां-बाप के सपनों से दबा स्टूडेंट जब कोचिंग संस्थानों में पहुंचता है तो उस पर तैयारी और टेस्ट का प्रेशर डाला जाता है और यह कह कर भी डराया जाता है कि जेइइ या एनइइटी दुनिया की सबसे मुश्किल परीक्षाएं हैं।

किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था की कामयाबी इसमें है कि शुरुआती से लेकर उच्च स्तर तक की शिक्षा हासिल करने के मामले में गलाकाट प्रतिस्पर्धा एवं जटिलता की बजाय सहजता हो। अगर किसी वजह से पढ़ाई करने या उसमें सफलता हासिल करने में किसी विद्यार्थी के सामने अड़चनें आ रही हों तो उसे दूर करने के उपाय किये जाएं। लेकिन बीते कई दशकों से यह सवाल लगातार बना हुआ है कि एक बड़ी तादाद में विद्यार्थी स्कूल-कॉलेजों में बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं और अपने अभिभावकों से नजरें ना मिला पाने के डर से आत्महत्या कर लेने हैं। इस मसले पर सरकार से लेकर शिक्षा पर काम करने वाले संगठनों की अध्ययन रपटों में अनेक बार इस चिंता को रेखांकित किया गया है, लेकिन अब तक इसका कोई सार्थक हल सामने नहीं आ सका है। प्रशासन से लेकर कोचिंग इंस्टीट्यूट के संचालक तक किसी के पास इसका जवाब नहीं है कि आखिरकार यहां सुसाइड के मामलों में लगातार इजाफा क्यों हो रहे हैं। छात्रों के द्वारा अगर लगातार ऐसे कदम उठाए जा रहे हैं तो साइकोलॉजिकल काउंसलिंग क्यों नहीं कराई जा रही है। इस संबंध कोचिंग संस्थान और प्रशासन की तरफ से कोई पहल क्यों नहीं की जा रही है?

जहन में एक ही सवाल बार-बार उठता है कि आखिर बच्चों पर प्रेशर बनाता कौन है? कोचिंग इंस्टीट्यूट की तरफ से पढ़ाई का दबाव रहता है या फैमिली प्रेशर से या फिर मनचाहे परीक्षा परिणाम नहीं मिलने पर छात्र इस कदर दबाव में आ जाते हैं कि सुसाइड जैसे कदम उठा लेते हैं। कुछ छात्र तो अपने सपनों को पूरा करने के लिए इतने प्रेशर में आ जाते हैं कि रिजल्ट आने से पहले ही आत्महत्या जैसा कठोर, त्रासद एवं खौफनाक कदम उठा लेते हैं। पुणे स्थित कंसल्टेंसी फर्म इनफिनियम ग्लोबल रिसर्च का अनुमान है कि इस साल के आखिर तक कोचिंग इंडस्ट्री का कारोबार 58,000 करोड़ रुपये से भी ज्यादा होगा। यानी कोचिंग संस्थान समृद्ध एवं शक्तिशाली है कि वे चाहें तो बच्चों की मेंटल हेल्थ सुधारने के लिए पहल कर सकते हैं। वे ऐसे छात्रों की मॉनिटरिंग भी कर सकते हैं, जिनका टेस्ट स्कोर कम हो और जो अक्सर क्लास से गायब रहते हों। ऐसा भी नहीं है कि कोटा के कोचिंग संस्थानों की ओर से इस तरह की पहल नहीं हुई है, लेकिन स्पष्ट है कि ये नाकाफी साबित हो रहे हैं।

विडम्बना तो यह है कि आत्महत्या की बढ़ती घटनाएं केवल कोचिंग संस्थानों में ही नहीं हो रही है बल्कि आइआइटी, एनआइटी और आइआइएसईआर, आइआइएम व केन्द्रीय विश्वविद्यालय और इनके जैसे स्तर के उच्च शिक्षण संस्थानों के छात्र भी आत्महत्या कर रहे हैं। बड़ा प्रश्न है कि उच्च नागरिक बनाने की बजाय ये संस्थान छात्रों को आत्महंता बना रहे हैं तो उनके ऊपर एक काला बदनुमा दाग होने के साथ बड़ा सवाल भी खड़ा है कि ऐसे संस्थानों में क्या पढ़ाई का स्तर व माहौल उचित नहीं है? सरकार और देश के शिक्षाविदों को इस तथ्य को लेकर भी चिंता करनी ही होगी कि बीते पांच साल में इन उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेने वाले 92 विद्यार्थियों ने पढ़ाई के बीच में ही आत्महत्या क्यों कर ली? ऐसे ही आईआईटी बुम्बई के फर्स्ट ईयर के छात्र दर्शन सोलंकी ने पिछले दिनों खुदकुशी कर ली। इसके बाद वहां के छात्रों से अधिकारिक तौर पर कहा गया है कि छात्र एक दूसरे से जी (एडवांस) रैंक या गेट स्कोर के बारे में पूछताछ न करें। न ही ऐसा कोई सवाल करें जिससे छात्र की जाति, अमीरी-गरीबी और उससे जुड़े पहलू उजागर होते हो। इस तरह की गाइडलाइन की जरूरत केवल आईआईटी मुम्बई को ही नहीं, सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को एवं कोटा के कोचिंग संस्थानों को भी हैं। हालांकि बच्चों को मनोवैज्ञानिक दबाव से बाहर निकालने के लिए कोटा प्रशासन ने तकरीबन साल भर पहले एक गाइडलाइन जारी की थी, जिसे एक भी कोचिंग संस्थान ने पूरी तरह फॉलो नहीं किया है, प्रश्न है कि प्रशासन ने उनके खिलाफ क्या कदम उठाये? सवाल तो यह भी है कि क्या ऐसे सांकेेतिक कदमों से आत्महत्या की बढ़ती संख्या जैसी गंभीर समस्याओं को हल किया जा सकता है।

आत्महत्या की बढ़ती छात्र मानसिकता पर नियंत्रण के लिये सबसे पहले पैरंट्स को अपने बच्चों की काबिलियत पहचाननी होगी और उसी के अनुरूप आगे बढ़ने में उसकी मदद करनी होगी। कोटा में आज जो हो रहा है, उसे रोकने के लिए पैरंट्स, कोचिंग संस्थान और सरकारी मशीनरी सबको मिलकर काम करना होगा। यह जगजाहिर है कि एक ओर स्कूल-कालेज में शिक्षा पद्धति में तय मानक बहुत सारे विद्यार्थियों के लिए सहजता से ग्राह्य नहीं होते, वहीं पढ़ाई में निरंतरता नहीं रहने के पीछे पठन-पाठन के स्वरूप से लेकर प्रतिस्पर्धा, गरीबी, पारिवारिक, सामाजिक और अन्य कई कारकों से जुड़ा हुआ है और इसके समाधान के लिए सभी बिंदुओं को एक सूत्र में रखकर ही देखने की जरूरत होगी।

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