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महत्वपूर्ण लेख

सभी प्राणियों को प्राणरक्षा का मौलिक अधिकार मिलना चाहिए

राकेश कुमार आर्य
मनुष्य के जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा करना सरकार का दायित्व है। अपने जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा पाना व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हमारे संविधान ने भी संसार के अन्य सभ्य देशों के संविधानों के आधार पर अपने प्रत्येक नागरिक को यह मौलिक अधिकार प्रदान किया है। इसीलिए राज्य के प्रत्येक नागरिक को अपनी प्राणरक्षा के लिए सुरक्षार्थ उसकी मांग पर अंगरक्षक तुरंत मिल जाते हैं। इसी प्रकार स्वास्थ्य संबंधी मानवीय समस्याओं का समाधान भी सरकार करती है। यही कारण है कि सरकारी अस्पतालों में जीवन रक्षक औषधियां नि:शुल्क दी जाती हैं।
यह कितना दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य है कि मनुष्य जीवन और स्वास्थ्य के प्रति सरकार से संरक्षित होकर भी स्वयं को सुरक्षित अनुभव नही कर रहा है। उसके जीवन के अस्तित्व पर तो संकट है ही स्वास्थ्य के प्रति भी पूर्णत: निश्चिंत नही है। एक से बढ़कर एक प्राणलेवा बीमारी संसार में बढ़ रही हैं और मानव के स्वास्थ्य के लिए संघर्ष कर रहे चिकित्सक और वैज्ञानिक असमंजस में हैं कि वह मानव की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर जीत प्राप्त करने का दम नही भर पा रहे हैं। जीवन के अस्तित्व और स्वास्थ्य संबंधी विकारों की समस्याओं का भंवर जाल नित्य नई नई जटिलताओं से गहराता जा रहा है। हम विचार करें कि ऐसा क्यों हो रहा है? मनुष्य ईश्वर की सृष्टि में सर्वाधिक समझदार प्राणी है। यह ईश्वर की सृष्टि का संरक्षक है। ईश्वर ने प्रत्येक प्राणी की संरचना बड़ी ही समझदारी से की है। उसकी सृष्टि में एक संतुलन है। गौ आदि दुधारू पशु जहां हमारे स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है वही हमारे राष्ट्र की आर्थिक व्यूह रचना को भी इतना सुदृढ़ और प्रभावी बनाते हैं कि उसे कोई भेद नही सकता। कृषि संबंधी कार्य तो इन पशुओं से होते ही हैं साथ ही कितने ही लोगों को रोजगार भी उपलब्ध होता है। गाय और बैल के श्वांस तक से ऐसे तत्वों का उत्सर्जन होता है कि जो मानव जीवन के लिए रक्षक होते हैं। अश्वादि पशु हमारे लिए वाहन का कार्य करते हैं। बिना किसी पर्यावरण प्रदूषण के ये पशु हमारे लिये कितने उपयोगी थे और साथ ही जीवन रक्षक भी, यह इनके विषय में हम भली प्रकार जानते हैं। आज का वाहन कितना पर्यावरण प्रदूषण फैला रहा है और उससे मानव जीवन और स्वास्थ्य पर कितना घातक और विपरीत प्रभाव पड़ रहा है ये भी हम भली प्रकार जानते हैं। अश्व, ऊंट और हाथी जो कि प्राचीन काल से मनुष्य की सवारी रहे हैं, इतने समझदार होते हैं कि यदि उनके सवार को रास्ते में आगे किसी प्रकार का संकट होना संभावित है तो वह उस रास्ते से बचने का प्रयास करने लगते हैं। आज के वाहनों में यह सुविधा उपलब्ध नही है। जब मनुष्य और सृष्टि के अन्य प्राणधारी मिलकर इस प्रकार कार्य करते थे तो उस समय की अवस्था को ही मनुष्य की वास्तविक प्राकृतिक अवस्था माना जाता था। इस प्राकृतिक अवस्था से मनुष्य जैसे ही ऊपर उठने लगा तो वह अहंकारी होता चला गया। उसने स्वयं को श्रेष्ठ मानने के चक्कर में उन अन्य प्राणियों के जीवन को ही नष्ट करने लग गया जो ईश्वर ने उसके लिए बनाये थे, अर्थात उसकी सुरक्षार्थ जिन्हें बनाया गया था। यह अहंकारी मनुष्य नास्तिक बन गया। नास्तिक बनकर इसने प्राणधारियों की लगभग 75000 प्रजातियों को तो स्वयं खाकर या मारकर नष्ट कर दिया है। जिससे पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है। आज वैज्ञानिक भी मान रहे हैं कि मांसाहार और निरीह पशुओं की वधशालायें ही प्राकृतिक आपदा और मानव निर्मित आपदाओं के मूल कारण हैं। घृणित काम प्रदूषित वातावरण, घृणित गंध, घृणित सांस, पीड़ा और पशुओं की चीत्कार से बोझिल वातावरण मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहे हैं। इससे मनुष्य भयाक्रांत रहता है। उसके मन पर इन पशुओं की करूण पुकार और चीत्कार उसको अशांत रखती है। जिससे मनुष्य कई प्रकार की मनोविकृतियों का शिकार हो जाता है। कहा जाता है कि जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन। अन्न और मन का बड़ा गहरा संबंध है। मन अन्न से ही बनता है। खाते समय मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसे ही विचारों से उसका मन रंग जाता है। यदि मन पर हिंसक विचार उस समय हावी हैं तो निश्चित ही आप हिंसक विचारों वाले बन जाएंगे। अब यह तो निश्चित ही है कि मांसाहार करते समय मानव के हृदय से दया और करूणा दोनों ही समाप्त हो जाती हैं। जिसका प्रभाव ये होता है कि मनुष्य दया और करूणा से हीन हो जाता है। जबकि सात्विक अन्न को ग्रहण करने वाला मनुष्य सात्विक विचार धारा का होता है। उसके चित्त में शांति मिलती है। इसलिए हमारे यहां देहात में लोग आज भी ईश्वर का नाम लेकर भोजन ग्रहण करते हैं, ताकि सात्विक भाव बने। वेद में तो भोजन का प्रारंभ करने से पूर्व मंत्रोच्चारण करने तक का विधान है। मन को शांत और निर्विकार रखने के लिए पहले लोग ईश्वर भजन किया करते थे। ईश्वर भजन से जो मन को शांति मिलती थी उसी शांति की अवस्था में ही लोग भोजन किया करते थे। उससे मन स्थायी रूप से शांत होकर अन्न ग्रहण करता था। भोजन के विषय में यह भी सर्वमान्य सत्य है कि इसे बैठकर ही ग्रहण करना चाहिए। आजकल हम विवाह आदि पार्टियों में संगीत के ऊंचे स्वरों के मध्य शोर शराबे में खड़े खड़े भोजन लेते हैं वह भी अन्य लोगों से बात करते हुए, ऐसा करते हैं-जिससे हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। हमें कितने ही रोग लग रहे हैं, कितने ही मनोविकार पैदा हो रहे हैं। हमारी सरकारों को चाहिए कि केवल कोई मौलिक अधिकार दे देना ही पर्याप्त नही है, उस मौलिक अधिकार की रक्षार्थ उचित उपाय करना भी सरकार का दायित्व है। इसलिए अच्छा यही होगा कि मनुष्य के जीवन की रक्षार्थ सभी पशुओं के लिए खोली गयी वध शालाएं तुरंत बंद की जाएं। अन्यथा भारी विनाश के लिए मानव समाज तैयार रहे। अपने जीवन की रक्षा का अधिकार पशुओं को भी दिया जाए। जब हम किसी को मौलिक अधिकार देंगे तभी हमारे मौलिक अधिकार की सुरक्षा होनी संभव है। यदि हम किसी को प्राण दे नही सकते तो किसी के प्राण ले भी नही सकते। अपने शासन का सूत्रवाक्य सरकारों को यही बनाना चाहिए। हर प्राणी का जीवन अमूल्य है। प्राकृतिक संतुलन को बनाये रखने के लिए हर प्राणी की जीवन रक्षा करना मनुष्य का कार्य है। इसी प्रकार खान पान के प्रति भी मनुष्य को जाग्रत करना होगा। इसलिए हमारे जीवन की सुरक्षार्थ और स्थायी मानसिक शांति के लिए यह आवश्यक है कि हमारे संविधान में ही सभी प्राणियों के जीवन की रक्षा का मौलिक अधिकार समाहित किया जाए। हिंसक बने पशुओं के लिए यह अधिकार उसी प्रकार समाप्त किया जा सकता है जिस प्रकार आतंकवादी (दुष्ट और आततायी) लोगों के लिए यह अधिकार नही होता।

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