बीमारी के बहाने और सरकारी अधिकारी व कर्मचारी

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डॉ. दीप नारायण पाण्डेय

कुछ हजार साल पहले की बात है। उत्तर भारत के घने जंगलों में आयुर्वेद की क्लास चल रही थी। इस सत्र में कुछ द्रव्यों की थेराप्यूटिक एफीकेसी पर विशेष चर्चा हो रही थी। हमेशा की तरह अग्निवेश ने अपने दिग्गज गुरु भगवान पुनर्वसु आत्रेय के सामने एक रोचक प्रश्न रखा:
”गुरु श्रेष्ठ! क्या कुछ ऐसे लोग भी हैं जो हमेशा ही बीमार रहे आते हैं?”
”बिल्कुल, अग्निवेश! ऐसे लोग जो सदैव बीमार बने रहते हैं उनमें लंबी-चौड़ी पूजा करने वाले, सरकारी कर्मचारी व अफसर, वेश्या और व्यापारी हैं।” भगवान आत्रेय का उत्तर था।
”ऐसा क्यों होता है, गुरु श्रेष्ठ, और इनकी चिकित्सा कैसे की जाए?” अग्निवेश अपनी स्वाभाविक उत्सुकता प्रगट करने से नहीं रोक पाए।

महर्षि वैज्ञानिक आत्रेय ने इस प्रश्न का लंबा-चौड़ा उत्तर दिया है।
”सदैव बीमार रहने का कारण यह है कि पूजा-पाठ व वेदाध्ययन में लगे हुऐ व्यक्ति व्रत और उससे जुड़ी तमाम दैनिक क्रियाओं के कारण शरीर के हितार्थ चेष्टा नहीं करता है। सरकारी अफ सर व कर्मचारी हमेशा ऐसे कार्यों में व्यस्त रहते हैं जिससे सरकार को खुश कर सकें, और अफसरों के अनुरोध पर उनका ध्यान रखने के कारण बाकी नौकर-चाकर बहुत चिन्तित और डरते रहने के कारण अपने शरीर पर ध्यान नहीं दे पाते। अपने ग्राहकों को प्रसन्न करने हेतु वेश्या अपने शरीर को साफ रखने, सौंदर्य प्रसाधन लगाने और आभूषणों का उपयोग करने में व्यस्त रहती है। इसलिए स्वास्थ्य के रखरखाव के लिए आवश्यक आहार-विहार का पालन करने में विफल रहती है। व्यापारी भी सदा बैठे-बैठे काम करने और बेचने-खरीदने के लालच में लगे रहने के कारण अपने शरीर के रखरखाव के लिए उपयोगी जीवन-शैली का पालन करने में विफल रहते हैं। क्योंकि ये सब (पूजा-पाठी, सरकारी अफ़सर व कर्मचारी, वेश्या और व्यापारी) सदैव आये हुऐ अधारणीय वेगों को रोकते रहते हैं और समय पर भोजन नहीं करते हैं। इसलिए सदैव बीमार ही रहते हैं। असल में कोई भी व्यक्ति जो असमय में मलादि का विसर्जन तथा बिगड़ी हुई जीवन-शैली का सेवन करने वाले होते हैं, वे भी सदैव रोगी होते हैं।”
उक्त सम्पूर्ण संवाद का मूल स्रोत यह है (च.सि.11.27-30)

अथाग्निवेश: सततातुरान् नरान् हितं च पप्रच्छ गुरुस्तदाह च।
सदाऽऽतुरा: श्रोत्रियराजसेवकास्तथैव वेश्या सह पण्यजीविभि:।।
द्विजो हि वेदाध्ययनव्रताह्निकक्रियादिभिर्देहहितं न चेष्टते।
नृपोपसेवी नृपचित्तरक्षणात् परानुरोधाद्बहुचिन्तनाद्भयात्।।
नृचित्तवर्तिन्युपचारतत्परा मृजाभि(वि)भूषानिरता पणाङ्गना।
सदासनादत्यनुबन्धविक्रयक्रयादिलोभादपि पण्यजीविन:।।
सदैव ते ह्यागतवेगनिग्रहं समाचरन्ते न च कालभोजनम्।
अकालनिर्हारविहारसेविनो भवन्ति येऽन्येऽपि सदाऽऽतुराश्च त।।

आइये इस सूत्र का थोड़ा विश्लेषण इस प्रकार करते हैं कि हम अपने जीवन के लिए कुछ सन्देश प्राप्त कर सकें। इसके लिए बीमारी के कुछ कॉमन फैक्टर्स की चर्चा उपयोगी होगी, ताकि उनसे बचाव कर सदातुर या सदा-बीमार होने से बचते हुऐ स्वस्थ रह सकें।

सबसे पहला सन्देश तो यह निहित है शरीर पर ध्यान न देना सदा-बीमार रहने का पहला कारण है। इस समस्या का समाधान स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने में निहित है। सभी अन्य भावों को छोड़कर शरीर की रक्षा करनी चाहिए। शरीर के अभाव होने पर सभी भावों का अभाव हो जाता है (च.नि.6.7)

सर्वमन्यत् परित्यज्य शरीरमनुपालयेत्।
तदभावे हि भावानां सर्वाभाव: शरीरिणाम्।।

स्वास्थ्य नहीं रहा तो व्यक्ति किसी काम का नहीं रहता। स्वास्थ्य-रक्षण की प्राथमिकता का सिद्धांत इतना महत्वपूर्ण है कि जनवरी 2020 तक विश्व भर में इस विषय पर 40 लाख से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। यदि निरंतर स्वास्थ्य-रक्षण आपकी प्राथमिकता में नहीं है तो आप निरंतर बीमार रहेंगे।

सदा-आतुरत्व सूत्र में दूसरी बात यह साफ़ होती है कि निरंतर बीमार होने से बचने के लिए जीवनशैली को निरंतर हितकारी और सुखकारी रखना होगा। जीवनशैली स्वास्थ्य के लिए इतनी अहम है कि जनवरी 2020 तक इस विषय में एक लाख से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। त्रिदोष-भड़काऊ जीवनशैली का सिद्धांत स्पष्ट करता है कि बिगड़ी हुई जीवनशैली वात, पित्त, और कफ को प्रकुपित करते हुऐ अंतत: बीमार कर देती है। आज वे पुरुष या महिलायें विरले ही मिलते हैं जिनकी दिनचर्या, रात्रिचर्या या ऋतुचर्या, वास्तव में प्रज्ञापराध या असात्म्येन्द्रियार्थ संयोग से मुक्त हो।स्वाभाविक है कि ऐसी स्थिति में वात, पित्त और कफ तो दिन-रात भड़कते रहते हैं। हमारा काल आहार-विहार के सत्यानाश का काल हो रहा है। ऐसे समय में जब रोग होने के बाद भी रोगोत्पत्ति के मूल कारणों से मुक्ति पा सकने की दिशा में नहीं बढ़ पा रहे हों, तब निरंतर सर्वदोषप्रकोपक स्थिति सामने ही है। इसलिए सुखायु, हितायु और दीर्घायु के इच्छुक व्यक्ति को, निरंतर अपने को स्वास्थ्य के दुश्मनों से घिरा हुआ मानते हुऐ, आत्म-नियंत्रित और जितेन्द्रिय रहकर बड़ी सावधानी के साथ सतत हितकर आहार-विहार के साथ जीवन जीना चाहिए (च.सू.17.119)

नित्यं सन्निहितामित्रं समीक्ष्यात्मानमात्मवान्।
नित्यं युक्त: परिचरेदिच्छन्नायुरनित्वरम्।।
इस विषय पर एक सूत्र सदैव ध्यान रखने योग्य है (च.सू.5.103)
नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी यथा।
स्वशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवेत्।।

जिस प्रकार नगर-प्रमुख अपने नगर और एक ड्राईवर अपनी गाड़ी का ध्यानपूर्वक प्रबंधन करता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति को अपने शरीर की देखभाल में हमेशा सतर्क रहना चाहिए। केवल स्वस्थ जीवनशैली पर 5,000 शोधपत्र छपने के बाद भी आयुर्वेद के सुझाव यथावत सुदृढ़ हैं। अत: जीवनशैली कभी मत बिगडऩे दीजिये।

तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि अधारणीय वेगों का रोकना स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। मूत्र, मल, वीर्य, अपान वायु (पादना), उल्टी, छींक, डकार, जम्हाई, भूख, अश्रु, निद्रा और श्रम के बाद नि:श्वास ऐसे वेग हैं जिन्हें शरीर में कभी नहीं दबाना चाहिए (च.सू. 7.3-4)

न वेगान् धारयेद्धीमाञ्जातान् मूत्रपुरीषयो:।
न रेतसो न वातस्य न छद्र्या: क्षवथोर्न च।।
नोद्गारस्य न जृम्भाया न वेगान् क्षुत्पिपासयो:।
न बाष्पस्य न निद्राया नि:श्वासस्य श्रमेण च।।

तात्पर्य यह है कि ये वेग बीमारी का कारण बनते हैं, अत: इनके आते ही शरीर से निकालते रहना ही श्रेयस्कर है। आज समस्या यह है कि लोग इन्हें परिस्थितिवश निरंतर दबाते रहते हैं और निरंतर बीमार रहे आते हैं।

चौथी महत्वपूर्ण बात यह निकलकर आती है कि दैनिक जीवन में यथाकाल भूख लगाने पर भोजन न करना या गलत समय में भोजन करने की आदत भी व्यक्ति को निरंतर बीमार किये रहती है। महर्षि कश्यप कहते हैं कि आरोग्य भोजन के अधीन होता है (काश्यपसंहिता, खि. 5.9): आरोग्यं भोजनाधीनम्। पुनर्वसु आत्रेय अपने शिष्यों को सर्वश्रेष्ठ द्रव्यों, भावों और क्रियाओं को समझाते हुऐ भोजन के सन्दर्भ में एक रोचक सूत्र बताते हैं (च.सू.25.40): कालभोजनमारोग्यकराणां श्रेष्ठम्। तात्पर्य यह है कि नियत समय पर भोजन आरोग्य देने वालों में श्रेष्ठ है। कई सहस्राब्दियों बाद अब आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इस समझ की ओर बढ़ रही है कि एक निर्धारित भोजन-काल में खाना-पीना लेना—न कि एड लिबिटम या जब मन आये तब—स्वस्थ रहने के लिए सबसे उत्तम रणनीति है। इसे टाइम-रिस्ट्रिक्टेड फीडिंग के नाम से जाना जाता है। अत: सदैव भूख लगाने पर उपयुक्त समय पर भोजन लीजिए, दिन भर बार बार मत खाते रहिए। दिन में अधिक से अधिक दो बार भोजन लीजिए। सदा-बीमार रहने की स्थिति से बचे रहेंगे।
पांचवीं बात यह निकलकर आती है कि सदा बैठे-बैठे काम करने से भी निरंतर बीमार रहे आने की आशंका बढ़ जाती है। इस समस्या का समाधान व्यायाम में निहित है। ऐसे कई सुख हैं जो अंतत: दु:ख देते हैं। उदाहरण के लिए (च.चि.6.4)

आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसा: पयांसि।
नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतु: कफकृच्च सर्वम्।।

लगातार बैठे रहने का सुख लेना, खूब सोने का सुख लेना आदि ऐसे कारक हैं जो बीमारी में उलझा देते हैं। उदाहरण के लिए तरमाल खाने, शारीरिक व मानसिक व्यायाम न करने और ख़ूब सोने से दिल के रोग होते हैं (च.सू. 17.34)

अत्यादानं गुरुस्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम्।
निद्रासुखं चाभ्यधिकं कफहृद्रोगकारणम्।।

कार्यों की चिंता न की जाए, खूब बेहिसाब-किताब खाया-पिया जाए और खूब सोया जाए तो आदमी सुअर की तरह मोटा हो जाता है (च.सू. 21.34)

अचिन्तनाच्च कार्याणां ध्रुवं संतर्पणेन च।
स्वप्नप्रसङ्गाच्च नरो वराह इव पुष्यति।।

इस समस्या का समाधान केवल नियमित व्यायाम में निहित है। व्यायाम से हल्कापन, कार्य करने की क्षमता, मजबूती, दु:ख सहने की क्षमता, शरीर में दोषों की साम्यता, और अग्नि में बढ़ोतरी होती है (च.सू. 7.32)

लाघवं कर्मसामथ्र्यं स्थैर्यं दु:खसहिष्णुता।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजाएते।।

सुश्रुत का कथन है कि (सु.चि. 24.39-40)

शरीरोपचय: कान्तिर्गात्राणां सुविभक्तता।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मृजा।।
श्रमक्लमपिपासोष्णशीतादीनां सहिष्णुता।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजाएते।।

अर्थात, व्यायाम करने से शरीर की पुष्टि, कान्ति, सौष्ठवपूर्ण अंग, बढिय़ा भूख, आलस्य समाप्त होना, स्थिरता, हल्कापन, तथा शरीर की शुद्धि होती है। श्रम, क्लम, प्यास, गर्मी, सर्दी सहने की क्षमता बढ़ती है और व्यायाम से परम आरोग्य उत्पन्न होता है।

और अंतिम सन्देश यह है कि निरंतर चिंतित रहने वाले या निरंतर डरते रहने वाले भी सदा-बीमार हो जाते हैं अत: इनसे बचें। लोभ, शोक, भय, क्रोध, घमण्ड, निर्लज्जता, ईष्र्या, अत्यधिक जुड़ाव, दूसरे की सम्पत्ति प्राप्त करने की लालसा से एकदम दूर रहना चाहिए या इन वेगों को रोकना चाहिए (च.सू. 7.27)

लोभशोकभयक्रोधमानवेगान् विधारयेत्।
नैर्लज्ज्येष्र्यातिरागाणामभिध्यायाश्च बुद्धिमान्।।

तात्पर्य यह है कि ये वेग, बीमारी का कारण बनते हैं, अत: इनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है।
शारीरिक हित और स्वास्थ्य को प्राथमिकता नहीं देना, कार्यस्थल की व्यस्स्तता के कारण चिंतित और भयाक्रांत रहने से उत्पन्न मानसिक तनाव, सदासन या सदा बैठे रहने की आदत, चेष्टाद्वेष या व्यायाम से घृणा करना, अव्यायाम या व्यायाम नहीं करना, अधारणीय वेगों को रोकना, कालभोजन नहीं करन व दिनभर जब मन आये तब बार बार खाते रहना, और आहार-विहार सेवन में असमयता या अनियमितता सदा-बीमार कर देते हैं। आहार व जीवनशैली की त्रुटियों से उत्पन्न होने वाले रोग बिना त्रुटियों को सुधारे दुनिया की किसी चिकित्सा पद्धति से ठीक नहीं होते। मृत्यु तय है पर मृत्यु की तिथि नहीं। इसलिए युक्तिपूर्वक शरीर की निरंतर रक्षा कीजिये।

(लेखक इंडियन फारेस्ट सर्विस के पूर्व अधिकारी हैं।)

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