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टमाटर ने महंगा होकर जो संदेश दिया है कि सरकार उससे कोई शिक्षा लेगी?

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

टमाटर के भावों में तेजी के साथ ही एक बात साफ हो गई है कि सरकार का कहीं ना कहीं बाजार निगरानी तंत्र कमजोर है। पूरे देश में टमाटर के भावों को लेकर हाहाकार मचा तब जाकर नेफैड और एनसीसीएफ की नींद खुली, नहीं तो बाजार आकलन के अनुसार पहले ही इन्हें सतर्क हो जाना चाहिए था।

लगभग हर साल अन्नदाता को रुलाने वाले टमाटर ने इस बार आम नागरिकों खासकर गृहणियों को बुरी तरह से झकझोर कर रख दिया है। अब तक अनुभव यही रहा है कि प्याज आम उपभोक्ताओं को रुलाता रहा है तो सरकार बनने-बनाने में भी प्याज की अहम भूमिका रही है। संभवतः यह पहला मौका होगा जब टमाटर ने भाव दिखाये हैं और यहां तक कि देश के अधिकांश हिस्सों में टमाटर के भाव डेढ़ सौ से दो सौ रुपए तक को छूने व कई स्थानों पर तो इससे अधिक आसमान छूने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हालात यहां तक देखने को मिले हैं कि मण्डियों से टमाटर की चोरियों के समाचार मिले तो टमाटर की सुरक्षा के लिए बाउंसर्स की सेवाएं भी लेने के समाचार मीडिया की सुर्खियां बने हैं। हालांकि अब टमाटर के भावों में उतार का दौर शुरू हो गया है तो केन्द्र सरकार भी एनसीसीएफ और नेफैड के माध्यम से आगे आई है। हालांकि संभवतः अदरक के भाव भी चार सौ के आसपास जाने का यह पहला रिकॉर्ड होगा पर टमाटर ने सीधे-सीधे आम आदमी को प्रभावित किया है।

पिछले दिनों ब्रिटेन में एकाएक भाव बढ़ने वाली वस्तुओं को कुछ समय तक नहीं खरीदने की सलाह सरकार द्वारा जारी की गई पर मजे की बात यह है कि हमारे देश में हालिया एक सर्वे के अनुसार टमाटर द्वारा लाल-नीली आंखें दिखाने के बावजूद केवल 15 प्रतिशत लोगों ने टमाटर को कुछ समय के लिए रसोई से बाहर रखने यानी की नहीं खरीदने का निर्णय किया, वहीं 82 फीसदी लोगों ने भले ही महंगा रहा हो पर टमाटर की खरीद से परहेज नहीं किया।

दरअसल अब तक का अनुभव यह रहा है कि सीजन में एक समय ऐसा आता है जब टमाटर के मण्डियों में भाव लागत तो छोड़ो मण्डी में लाने ले जाने की लागत भी पड़ता नहीं खाती और हाईवे के किनारों पर टमाटर के ढेर के ढेर बिखरे हुए देखे जाते रहे हैं। हालांकि करीब करीब इस समय टमाटर के भाव बढ़ते हैं पर इतने अधिक भावों में तेजी पहले लगभग नहीं ही देखी गई है। वैसे तो टमाटर की खेती समूचे देश में होती है पर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, गुजरात, पश्चिम बंगाल आदि प्रमुख टमाटर उत्पादक प्रदेश हैं। दुनिया में टमाटर के उत्पादन में चीन शीर्ष पर है और एक मोटे अनुमान के अनुसार चीन में टमाटर का 5 करोड़ 64 लाख टन से अधिक सालाना उत्पादन होता है। चीन के बाद भारत टमाटर का सबसे अधिक यानी की दूसरे नंबर का प्रमुख उत्पादक प्रदेश है। मोटे अनुमान के अनुसार देश में करीब 4 लाख टन टमाटर का सालाना उत्पादन होता है। यदि कुछ दिनों को छोड़ दिया जाए तो टमाटर के भावों को लेकर इतनी मारामारी नहीं रहती है। पर इस साल तो टमाटर ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

टमाटर दक्षिण अमेरिका के एण्डीज और मैक्सिको से स्पेनिस कॉलोनीज होते हुए दुनिया के देशों में पहुंचा है। बदलते समय में कम से कम हमारे देश में छाछ, केरी, अमचूर, काचरी आदि परंपरागत खटाई की जगह सभी सब्जियों में टमाटर ने बना ली है। टमाटर के बिना सब्जी के स्वाद की कल्पना लगभग नहीं के बराबर रह गई है तो दूसरी और टमाटर केचअप, प्यूरी और शॉश का अपना बड़ा बाजार विकसित हो चुका है। दरअसल औषधीय गुण के कारण भी टमाटर की मांग बढ़ी है। टमाटर में विटामिन सी, बी, के के साथ ही कोलिन आदि प्रचुर मात्रा में है। इसलिए स्वास्थ्य की दृष्टि से भी टमाटर की अपनी अहमियत है। प्याज-टमाटर ऐसे हैं जो आलू आदि दूसरी सब्जियों के साथ तो काम आते ही हैं, केवल और केवल टमाटर और प्याज ही ऐसे हैं जो गरीब से गरीब की थाली में लगावन का काम करता है तो अमीर से अमीर की रसोई भी इनके बिना अधूरी है। ऐसे में टमाटर के भाव आसमान छूने से सीधे सीधे आम आदमी का प्रभावित होना स्वाभाविक है।

अब सवाल दो टके का यह हो जाता है कि ऐसी सरकारों की क्या बाध्यताएं होती हैं कि एकाएक भाव बढ़ने पर आम नागरिकों को भगवान के भरोसे छोड़कर किनारे हो जाती है। हालांकि लाख उत्पादन बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हों पर अभी भी देश में फसलोत्तर आधारभूत संरचनाओं की कमी बरकरार है। यही कारण है कि किसानों को मजबूरन अपने उत्पाद को सड़क के हवाले करना पड़ता है। हर हालात में फायदा होता है तो केवल और केवल बिचौलियों को होता है। पहले कृत्रिम अभाव पैदा किया जाता है और फिर कोल्ड स्टोरेज से थोड़ी मात्रा में बाजार में लाया जाता है ताकि ज्यों ज्यों भाव बढ़ते जाएं त्यों त्यों इनका मुनाफा बढ़ता जाए और आम आदमी पिसता चला जाए। आखिर ऐसा क्यों होता है? यह इसलिए भी जरूरी हो जाता है कि सरकार की बाजार पर निगरानी रखने वाली टीम आखिर क्या करती रहती है। सरकार के पास बुवाई से लेकर उत्पादन तक के आंकड़े रहते ही हैं, इसके साथ ही कोल्ड स्टोरेज में जमा की भी जानकारी रहती है। फिर ऐसे कौन से कारण होते हैं कि एक समय खुदरा में दस से बीस रुपए किलो बिकने वाला टमाटर दो सौ के आंकड़े को छू जाता है। यह टमाटर ही नहीं आलू, प्याज, लहसुन आदि सभी पर लागू होता है। अब तो सरकार द्वारा बागवानी फसलों के लिए रेल भी चला दी गयी है। इससे बागवानी फसलों को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाना आसान हुआ है। पर अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना है। कोल्ड स्टोरेज की चेन बनानी होगी तो वातानुकूलित कंटेनरों की व्यवस्था भी सरकार को करनी होगी।

टमाटर के भावों में तेजी के साथ ही एक बात साफ हो गई है कि सरकार का कहीं ना कहीं बाजार निगरानी तंत्र कमजोर है। पूरे देश में टमाटर के भावों को लेकर हाहाकार मचा तब जाकर नेफैड और एनसीसीएफ की नींद खुली, नहीं तो बाजार आकलन के अनुसार पहले ही इन्हें सतर्क हो जाना चाहिए था। बाजार हस्तक्षेप पहली आवश्यकता है। उत्पादक किसान और उपभोक्ता आम आदमी दोनों के ही हितों की रक्षा करना जरूरी हो जाता है। दूसरे ऐसी परिस्थितियों में सरकार की उपस्थिति मात्र से ही हालात में सुधार होने लगते हैं। साफ है सरकार के 80 रुपए किलो टमाटर उपलब्ध कराने के दूसरे दिन से ही कौन-सा कमाल हो गया कि टमाटर के मण्डियों में भाव नीचे आ गए। इसलिए समय रहते बाजार हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। अन्यथा कालाबाजारी और जमाखोरी को बढ़ावा मिलता है और उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही पिसते हैं। सरकार की बदनामी का कारण बनता है वह अलग। इसलिए एक प्रोएक्टिव टीम होनी चाहिए जो बाजार के हालातों पर नजर रखे और अप्रत्याशित होने से पहले ही बाजार के हालातों को नियंत्रण में ले सके ताकि आम नागरिक जमाखोरों के चंगुल में ना आ सकें। दरअसल मार्केट इंटरवेंशन के लिए सरकार समय पर सक्रिय हो जाए तो मुनाफाखोरों और जमाखोरों को आसानी से सबक सिखाया जा सकता है वहीं आम नागरिकों को भी समय पर राहत मिल सकती है। इसके लिए मार्केट इंटरवेंशन की सख्त नीति के साथ ही बाजार की मांग के अनुसार समय पर फैसले लेने होंगे ताकि बाजार पर मुनाफाखोरों और जमाखोरों का नियंत्रण नहीं हो सके।

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