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भारतीय संस्कृति

गंगा ,जमुना ,सरस्वती-संगम की वास्तविकता क्या है?*

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Dr D K Garg

प्रचलित मान्यताएंः गंगा,यमुना को लेकर अनेकों पौराणिक कथाएं मिलती है जैसे यमुना को सूर्य की बहिन,गंगा को शिव की पुत्री और ब्रह्मा की पत्नी,और ब्रह्मा के कमंडल में रहने वाली गंगा आदि।

वैसे तो भारत में हजारों नदिया है लेकिन इन तीन नदियों यानि की गंगा ,यमुना और सरस्वती की विशेष मान्यता है और तीनो को एक साथ मिलने के स्वरूप को त्रिवेणी का नाम दिया है। मान्यता है इस त्रिवेणी में स्नान से साधक पाप मुक्त हो जाते है,ये तीनो नदिया पवित्र है ,पूज्य है ।
ऐसा क्यों?ये समझना जरूरी है।
विश्लेषण : क्या ये तीनों नाम भौतिक रूप से दिखाई देने वाली तीन नदियों के लिए प्रयोग होते है? या कोई अन्य आध्यात्मिक भावार्थ है?क्योंकि यदि इन नदियों में नहाने से पाप मुक्त हो जाते तो फिर पाप और बड़ जाने का कोई डर नही होना चाहिए ,और इससे तो ईश्वर की न्याय व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगना स्वावाभिक है।
और फिर पूरे विश्व के वैज्ञानिक ये घोषणा कर दे,जेल में रहने वाले दुष्कर्मी भी गंगा , यमुना में नहा ले।
और सरस्वती नदी का तो अभी तक कोई अता पता नहीं है ,सरस्वती नदी का कोई अस्तित्व नहीं मिला है ,जबकि भारत सरकार ने १९८३ से अनेको आयोग बनाये की भौतिक रूप से सरस्वती नदी का कोई अस्तित्व मिल जाये लेकिन नहीं मिला और खेद का विषय है की वास्तविक भावार्थ खोजने का कोई प्रयास नहीं हुआ ।

यदि इन सभी पौराणिक कथाओं का विश्लेषण करने लगेंगे तो असली विषय पीछे रह जायेगा।
ये जरूर है की इन कथाओं के पीछे आध्यात्मिक और वैज्ञानिक आधार पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है ।
ये भी स्पष्ट है की भौतिक रूप से दिखने वाली गंगा यमुना के संगम में नहाने का आनंद तो ले सकते है लेकिन मोक्ष्य और पाप धुलने जैसे बाते अंधविश्वास ही है।
पहले हम सरस्वती नदी का आध्यात्मिक रूप देखते है। सबसे प्राचीन और प्रमाणिक धर्म ग्रन्थ वेद में सरस्वती ईश्वर को कहा गया है और ये शब्द वेदों में बार बार आया है। ऋग्वेद में सरस्वती के 49 बार , सामवेद में सरस्वती के 3 और अथर्ववेद में सरस्वती के 21 संदर्भ मिलते है।
(सृ गतौ) इस धातु से ‘सरस्’ उस से मतुप् और ङीप् प्रत्यय होने से ‘सरस्वती’ शब्द सिद्ध होता है। ‘सरो विविधं ज्ञानं विद्यते यस्यां चितौ सा सरस्वती’ जिस को विविध विज्ञान अर्थात् शब्द, अर्थ, सम्बन्ध प्रयोग का ज्ञान यथावत् होवे, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘सरस्वती’ है।

वेद का स्पष्ट संदेश है कि तीन विद्याओं के जानने से हम त्रिवेणी में पहुंच जाते हैं। ये त्रिवेणी यानि की गंगा ,जमुना ,सरस्वती तीनों धाराएं जब एक साथ मिल जाती है तो इसे त्रिवेणी कहा गया है जो आगे चलकर एक साथ प्रवाह से नीलधारा बन जाती है। इसी स्थान पर देवताओं और दैत्यों (कुविचार और सद्विचार)का संग्राम होता रहता है। आत्मा जब ज्ञान, कर्म और उपासना के द्वारा की त्रिवेणी में स्नान करता है तो दैत्य (कुविचार एवं पाप)पृथक हो जाते हैं और सुविचार आने से आत्मा स्वतः पवित्र हो जाती है।
विद्वानों का कहना है कि यहां पर स्नान करते हुए यह आत्मा त्रिवेणी से ऊपरी स्थान में स्नान करने चला जाता है ।जिसको ब्रह्मरंध्र कहते हैं।जब यह आत्मा ब्रह्मरंध्र में जाता है तो वहां पर आत्मा को बहुत सारे सूर्यो का सा प्रकाश प्राप्त होता है। उस प्रकाश में आत्मा प्रसन्न होता है। आनंद को प्राप्त करता है। स्थूल शरीर और पार्थिव शरीर को त्याग देता है। सूक्ष्म शरीर की दृष्टि कई गुणा वृद्धि को प्राप्त हो जाती है। ऐसा योगियों एवं ऋषियों का कथन है।
आध्यात्मिक रूप में त्रिवेणी में स्नान का भावार्थ अष्टांग योग के पालन से है। जिसका चौथा भाग प्राणायाम है। जिसको तीन भागो में एक साथ संपन्न किया जाता है -रेचक ,कुम्भक और पूरक। साधक को जब प्राणायाम का अभ्यास हो जाता है तो वह कुछ छण से लेकर लम्बे समय तक प्राण रोकने में सफल हो जाता है। जब कोई स्नान के लिए पानी में डुबकी लगाता है तो अपने प्राण (स्वास) को रोक लेता है ,इसी तरह प्रयाम के द्वारा स्वास रोककर साधक ईश्वर में कुछ समय के लिए लींन हो जाता है , इस परमानद की स्थिति को त्रिवेणी में डुबकी लगाना कहते है
उस परमात्मा की गोद में चले जाते हैं तथा परमानंद को प्राप्त करते हैं। परमानंद में रमण करने लगते हैं ।इस प्रकार यह त्रिविद्या ही तीन गंगा हैं। इन गंगा में स्नान करने से हृदय पवित्र हो जाता है । हम संसार सागर से परे हो जाते हैं। अर्थात मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। जो आत्मा का प्रथम लक्ष्य होता है उसको प्राप्त कर लेते हैं।
यह जो गंगा ,यमुना नदी है ये जड़ है,चेतना शून्य है , इसको जल संसाधन के रूप में प्रयोग किया जाता है .इसका बहाव बांध बनाकर रोकना हमारे हाथ में वह हमको मोक्ष कैसे प्राप्त करा सकती है?
इसलिए त्रिवेणी का वास्तविक भावार्थ समझने का प्रयास करे और प्राणायाम द्वारा त्रिवेणी में गोता लगाए।

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