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प्रशासनिक लापरवाही के परिणाम होते हैं प्राकृतिक हादसे

उमेश चतुर्वेदी

प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का वश नहीं। लेकिन इन आपदाओं से जुड़ी कुछ घटनाएं और सामान्य हादसे ऐसे होते हैं, जिन पर काबू पाया जा सकता था। हाल के दिनों में घटी कुछ घटनाओं को इन्हीं श्रेणियों में रखा जा सकता है। इन घटनाओं ने देश और समाज को विचलित कर दिया। पहली घटना रही मेरठ से दिल्ली को जोड़ने वाले एक्सप्रेस वे पर हुई दुर्घटना, जिसमें गलत दिशा से आ रही एक बस से कार की आमने-सामने की टक्कर हुई, जिसमें एक हंसता-खेलता परिवार खत्म गम और आंसुओं के समंदर में डूब गया। इस हादसे के कुछ ही दिन पहले दिन में हुई जोरदार बारिश ने दिल्ली को जैसे झील में तब्दील कर दिया। कुछ इसी तरह हिमाचल प्रदेश भी डूब रहा है। मंडी जिले में तो सड़कों पर मलबे की बाढ़ आ गई। इन घटनाओं में पहली नजर में कोई समानता नजर नहीं आती। एक जहां सड़क हादसा है तो दूसरी-तीसरी घटना प्राकृतिक आपदा है। लेकिन इन घटनाओं में समानता इस लिहाज से है कि इनसे बचा जा सकता था या उनसे होने वाले नुकसान को कम से कम किया जा सकता था।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में राजनीतिक तंत्र होता है। लोगों के मत से चुनकर आने की वजह से उन पर सवाल होना भी चाहिए। हमने जिस तरह का नैरेटिव विकसित किया है, उसमें मोहल्ले की गड़बड़ी से लेकर राष्ट्रीय समस्या के लिए सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक तंत्र ही जिम्मेदार माना जाता है। इसलिए सवालों के घेरे में वही सबसे ज्यादा रहता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ राजनीतिक तंत्र ही इसके लिए जिम्मेदार है? क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि इसके लिए व्यवस्था और उसके सबसे अहम अंग नौकरशाही जवाबदेह नहीं है?

नौकरशाही पर सबसे वैज्ञानिक और स्वीकार्य अध्ययन जर्मन समाजशास्त्री मैक्स वेबर का माना जाता है। उन्होंने लोकतांत्रिक व्यवस्था में निरंतरता के लिए नौकरशाही और प्रशासनिक तंत्र को बेहतरीन जरिया बताया है। अपने इसी अध्ययन में मैक्स वेबर नौकरशाही की नकारात्मक भूमिका की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। उनका मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की नौकरशाही नियमों और उसकी प्रक्रिया को ही अपना लक्ष्य मान लेती है। दफ्तरी सोच की वजह से यह तंत्र एक तरह से कल्पनाहीन विशेषज्ञों का समूह विकसित करने लगती है। चाहे मेरठ एक्सप्रेस वे पर हुआ हादसा हो या दिल्ली के डूब जाने की कहानी या फिर ऐसी ही कोई और घटना, हर घटना या हादसे का विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि हमारा व्यवस्था तंत्र भी कल्पनाहीनता की सुरंग में समाता जा रहा है। मेरठ एक्सप्रेस वे हुई घटना महज हादसा नहीं है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही भी है। दिल्ली अगर डूब रही है, यहां की सड़कें अगर धंस रही हैं, कुछ साल पहले अगर पटना डूब रहा था, अगर मंडी की गलियों में मलबा बह रहा है, कुछ साल पहले जयपुर की सड़कें अगर मलबे से डूब गई थीं, तो इसके मूल में कहीं न कहीं भारतीय तंत्र की कल्पना और अनुमानहीनता की कमी ज्यादा जिम्मेदार रही है। हमारा तंत्र हादसों और घटनाओं के बाद चेतता है। वह उन हादसों और घटनाओं का अनुमान लगाकर उन्हें रोकने या बाधित करने के लिए जरूरी कदम नहीं उठा पाता।

पुरानी पीढ़ी के लोग अपने अनुभवों के आधार पर कहते रहे हैं कि आजादी के पहले की नौकरशाही ज्यादा कल्पनाशील थी। वह अपनी हर योजना भविष्य, भावी अनुमानों और उस पर आधारित परिणामों को ध्यान में रख बनाती थी। आईसीएस यानी इंपीरियल सिविल सर्विस ही आज की भारतीय नौकरशाही की मूल है। लेकिन लगता है कि उसने अपने पूर्ववर्ती तंत्र का यह गुण आत्मसात नहीं किया। साल 1922 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज ने तत्कालीन ब्रिटिश नौकरशाही को ब्रिटिश राज का स्टील फ्रेम बताया था। तब की नौकरशाही ने ब्रिटिश सरकार को बचाने के लिए स्टील फ्रेम की तरह काम तो किया, उसे बनाए रखने के लिए भी अपनी कल्पनाशीलता का सहारा लिया। उन्होंने जो योजनाएं बनाईं, जो निर्माण किए, वे अरसा बाद तक अप्रासंगिक नहीं हुए। लेकिन उसकी तुलना में आज के तंत्र को देख लीजिए। उसकी बनाई योजना, उसके हिसाब से उठाए कदम जल्द ही अप्रासंगिक हो जाते हैं। दिल्ली अगर डूब रही है तो कहीं न कहीं दिल्ली के तंत्र की सोच भी इसके लिए जिम्मेदार है। जब सामान्य जन तक को पता है कि दिल्ली में जून के आखिर में मानसून आ जाएगा, ऐसे में शहर के ड्रेनेज को बहाने वाले नालों की सफाई हर हाल में मई तक हो जानी चाहिए थी, सड़कों की खुदाई और मरम्मत तक मई या अधिकतम जून के बीच तक हो जाना चाहिए था। लेकिन दिल्ली घूमिए, कई सड़कों पर सीवर लाइनें मई में बनानी शुरू हुई हैं। अरबिंदो मार्ग के दोनों तरफ की सड़क को ठीक मानसून आने के पहले खोद दिया गया।

मेरठ एक्सप्रेस वे पर बस और कार की टक्कर महज हादसा नहीं थी, बल्कि वह प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा रही। एक्सप्रेस वे पर आठ किलोमीटर तक कोई बस कैसे गलत दिशा में दौड़ती रह सकती है? इसका अनुमान तंत्र को होना चाहिए और उसे रोकने का इंतजाम भी उसे ही करना चाहिए। देशभर की ट्रैफिक पुलिस को देखिए, वह सिर्फ दंडात्मकर कार्यवाही में जुटी रहती है। वह इस ताक में रहती है कि कोई ट्रैफिक नियम तोड़े, ताकि वह उसे पकड़ कर कभी अपनी तो कभी सरकारी खजाने को भर सके। जबकि होना चाहिए कि वह ट्रैफिक को सही तरह से आगे बढ़ाती रहे। नगर निगमों के अधिकारियों की कार्यप्रणाली देखिए। गलियों में शोर बढ़ता रहे, गलियां अतिक्रमण से संकरी होती रहें। गलत तरीके से निर्माण होता रहे, ऐसे मामलों के खिलाफ निरोधात्मक कार्रवाई की बजाय निगम का तंत्र अपनी जेब भरने और ऐसे मामलों में उदासीनता बरतता रहता है। पुलिस और प्रशासनिक तंत्र भी इसमें शामिल रहता है। हां, जब उन्हीं गलियों में कोई हत्या हो जाती है, कभी बलवा हो जाता है, या आग लग जाती है और अतिक्रमण के चलते फायर ब्रिगेड की गाड़ियां नहीं घुस पातीं तो तंत्र का समूचा हिस्सा जैसे सोते से जाग जाता है। फिर कार्रवाइयां होती हैं। ऐसा करके तंत्र एक तरह से अपनी गलतियों पर लीपापोती ही करता है। इसके बाद वह अगले हादसे तक लंबी तानकर सो जाता है।

पंडित नेहरू के सचिव रहे एमओ मथाई ने अपनी किताब ‘रेमेनेंसेज ऑफ नेहरू एज’ में लिखा है कि नेहरू इंपीरियल सिविल सर्विस को लेकर बहुत सकारात्मक नहीं थे। वे इसे भंग कर देना चाहते थे। लेकिन पटेल ने उन्हें मनाया। उसके बाद तंत्र को लेकर नेहरू की राय बदली। तब उम्मीद की जा रही थी कि भविष्य में तंत्र भारत की बदली स्थितियों के मुताबिक सोच लेकर आगे बढ़ेगा। लेकिन अब तक के अनुभव बताते हैं कि ऐसा कम ही हो पाया। मानव जनित हादसों से बचा जाए और प्राकृतिक हादसों से होने वाले नुकसान को कम से कम करना तभी संभव होगा, जब हमारा तंत्र अनुमान केंद्रित बने, कल्पनाशील बने और अपने दफ्तरी खांचे, नियम-कायदे और प्रक्रिया के घेरे से बाहर निकले। इसके लिए जरूरी कदम उठाया जाना होगा। पूरे तंत्र की एक तरह से ओवरहालिंग करनी होगी। तंत्र में शामिल होने वाले लोगों को सेल्फ स्टार्टिंग बनाना होगा, इसके लिए उनकी ट्रेनिंग प्रक्रिया में जरूरी बदलाव करना होगा। उससे निकले नौकरशाह कहीं ज्यादा कल्पनाशील होंगे, जिन्हें जमीनी समस्याओं और आगामी परेशानियों का भान होगा। तभी वे आज की तुलना में कहीं बेहतर बदलाव लाने का औजार बन सकेंगे। अन्यथा मेरठ ना सही, किसी और एक्सप्रेस वे पर हादसा होगा, मासूम जानें जाएंगी, दिल्ली ना सही कोई और शहर डूबेगा, किसी अन्य शहर की गलियां मलबे में डूबेंगी।

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