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भारतीय संस्कृति

आज का भोपाल था कभी भोजपाल

भोपाल आजकल मध्य प्रदेश की राजधानी है। इस नगर का प्राचीन काल से ही विशेष महत्व रहा है। 1010ईं में इसे परमार वंशीय राजा भोज के द्वारा बसाया गया था। यही कारण है कि इसका पुराना नाम भोजपाल था। इसीलिए इसका नाम प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के द्वारा राजा भोज की प्रतिमा का अनावरण करते समय पुन: भोजपाल का पुराना नाम देने की बात कही गयी थी, लेकिन बाद में लोगों की अनिच्छा के कारण मुख्यमंत्री अपनी घोषणा को लागू नही कर पाए थे।
पिछले दिनों 27 अक्टूबर को हम ‘उगता भारत’ के प्रांतीय प्रभारी श्रीपंकज अरोड़ा के निमंत्रण पर यहां पहुंचे तो उनसे कई जानकारियां हमें मिलीं, जिन्हें पाठकों के साथ बांटना हम उचित समझते हैं। इस नगर में एक भोजपुरा नामक प्राचीन बस्ती है, जो कि इसी बात की साक्षी देती है कि इस नगर का अतीत राजा भोज से कहीं न कहीं अवश्य जुड़ा है। भोपाल से 23 किलोमीटर दक्षिण में एक छोटा सा गांव भोजपुर भी है। उससे भी स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में प्रतापी परमारवंशीय शासक भोज का शासन रहा और उन्होंने कई नगर, उपनगर बस्ती या गांव बसाये। पाठकों की जानकारी के लिए बताते चलें कि एक भोजपुर बिहार में भी स्थित है। जहां अंग्रेजी काल में सैनिक भर्ती हुआ करती थी, बिहार की भोजपुरी बोली का नाम इसी गांव के नाम पर प्रसिद्घ हुआ। भोपाल की भोजपुरा नामक उपनगरी में आज तक भी एक प्राचीन शिवालय है। जो कि प्राचीन स्थापत्य कला का सुंदर नमूना है। इसी नगरी में राजा भोज ने किसानों के खेतों की सिंचाई के लिए एक बहुत बड़ी झील का निर्माण कराया था। इस झील के बांध को बाद में गुजरात के सुल्तान होशंगशाह ने कटवा दिया था, जिससे झील का पानी बड़ी मात्रा में निकल गया और इसका क्षेत्र सीमित हो गया। बाद में खुश्क हुए क्षेत्र में लोगों ने बसना आरंभ कर दिया। इसके उपरांत भी यह झील इतनी बड़ी है कि उत्तर भारत में अभी भी यह कहावत है कि ताल तो भोपाल ताल और सब तलईंया है। इस झील पर भी भोजताल लिखा है। इससे भी स्पष्ट है कि इस ताल को राजा भोज के सम्मान में ही यह नाम दिया गया है।
इसी भोजताल से लगता हुआ मुख्यमंत्री आवास है, जबकि राजभवन थोड़ा हटता हुआ है। इस ताल के तट पर किसी गौड़ शासिका कमलापति का दो मंजिला भवन है। लोगों का कहना है कि यह भवन सात मंजिला था जिसकी कई मंजिलें अब भी ताल के अंदर हैं। कमलापति के बारे में कहा जाता है कि उसने अपने पति की मृत्यु का संकेत पाकर इसी अट्टालिका से ताल में कूदकर आत्महत्या कर ली थी। यहां मुगल शासन का आरंभ 17वीं सदी के उत्तरार्ध में हुआ था। उस समय के कुछ महल और सुंदर भवन आज भी उनकी स्मृतियों को समेटे पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। इन भवनों में सात मंजिला ताजमहल जो शाहजहां बेगम का निवासग्रह था, आज भी भोपाल के गत वैभव का साक्षी है। भोपाल के पूर्व नवाब हमीदुल्ला का महल भी यहां पर है, जिसे लोग अहमदाबाद कहते हैं। भोजपुर में एक शिवमंदिर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण भी राजा भोज ने ही कराया था। इस मंदिर की ऊंचाई पचास फीट है। कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण गुप्तकाल में हुआ होगा। इस मंदिर से थोड़ी दूरी पर एक जैन मंदिर है, जो प्राचीन होने के बाद भी ऐसा नही लगता। आज की भागदौड़ की जिंदगी में लोग अपनी रोजी रोटी तक सीमित होकर रह गये हैं, प्राचीन इतिहास को समेटे खड़े अपने भव्य स्मारकों और नगरों के विषय में सोचने समझने और जानने की फुर्सत अब हमारे पास नही है। इसलिए जीता जागता इतिहास भी यदि हमारे सामने दम तोड़ रहा हो तो हम उसके प्रति निर्मम बने खड़े रहते हैं। अतीत के प्रति इतनी उदासीनता हमें सचमुच पतन के गर्त में धकेल रही है और हम धिकलते चले जा रहे हैं। इसे अपना दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य…?
-श्री निवास एडवोकेट

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