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गुजरात चुनाव:मोदी का वास्तविक मुद्दा हिंदुत्व ही है

गुजरात में चुनावी मुद्दा विकास नहीं बल्कि हिन्दुत्व है। नरेन्द्र मोदी ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी न उतार कर यह संदेश फिर से दिया है कि उनकी वैचारिक नीति और धरातल न तो बदली है और न ही बदलने वाली है। सवाल है कि जब पूरे देश में मोदी के विकास की चर्चा है तब नरेन्द्र मोदी ने विकास को छोड़कर अपना परमपरागत मुद्दा ‘हिन्दुत्व’ को चुना क्यों? हिन्दुत्व के मुद्दे पर वे लौटे क्यो? क्या उनकी कोई मजबूरी थी? क्या उनकी सत्ता विकास या मुस्लिम संतुष्टिकरण के मुद्दे पर नहीं लौटती? क्या विकास के मुद्दे से चुनाव लडऩे पर गुजराती मानुष नरेन्द्र मोदी को खारिज कर दूसरी राजनीतिक धारा को सत्ता सौंपने की ओर अग्रसर होता? क्या विकास के मुद्दे पर चुनाव लडऩे से गुजरात की अस्मिता जमींदोज होती या फिर निष्क्रिय हो जाती? यह डर तो नरेन्द्र मोदी के चुनावी चेहरे पर साफ दिखता है। चुनावी सभाओं में नरेन्द्र मोदी के मुख से और उनके एक्शन से विकास की बातें शक्तिहीन ही दिखती हैं। उनका सारा फोकस हिन्दुत्व और गुजराती अस्मिता को फिर से जगाने और झकझोरने के पर है। जब नरेन्द्र मोदी चुनावी सभाओं में यह कहते हैं कि क्या गुजरात की जनता को लांक्षित करने के लिए दंगाई और हिंसक कहकर अपमानित करने वालो को इस चुनाव में जवाब देना है तब चुनावी सभा में जुटी भीड़ नरेन्द्र मोदी की मूरीद होती है बल्कि गुजराती अस्मिता को अपमानित करने वालों के खिलाफ आक्रोश भी व्यक्त करती है। मोदी के उभरे विशाल व्यक्तित्व से चिडऩे और नाराज होने वाले हिन्दुत्व के बड़े चेहरे भी प्रश्नहीन हैं। जहां तक गुजरात की बहुसंख्यक आबादी का सवाल है तो वह इस बात से खुश ही नजर आती हे कि नरेन्द्र मोदी अपनी जड़ जुड़े हुए हैं और अपने समर्पण से न तो डिगे है और न उखडऩे के लिए तैयार है। जड़ से जुड़े रहना,अपने समर्पण के प्रति ईमानदारी दिखाना और सक्रियता के साथ उसमें शक्ति-जोश भरना ही उनकी चाकचैबंद राजनीतिक प्रक्रिया है और इस राजनीतिक प्रकिया का वे सफलतापूर्व इस चुनाव में प्रदर्शन भी कर रहे हैं। उनकी जड़ हिन्दुत्व में ही है। हिन्दुत्व से कटने से उनकी वही हाल और वैसी ही विकट स्थितियां हो सकती है जो केन्द्रीय स्तर पर खुद उनकी पार्टी भाजपा को हुई है। क्या राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा अपने असली मुद्दे से भटकी हुई और दिशाहीन-शक्तिहीन नहीं है?
गुजरात की बहुसंख्यक आबादी शेष राष्ट्र की बहुसंख्यक आबादी की संस्कृति और वैचारिक सोच से अलग सोच रखती है और उनकी संस्कृति भी चाकचैबंद है। उन्हें उदारतावाद में अमनी मूल संस्कृति को नष्ट करना मान्य नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी और गुजरात की जनता को आप दंगाई कह कर उन्हें अपमानित कर सकते हैं पर वे जवाब चुनाव के समय अपनी संस्कृति-अपनी अस्मिता पर बटन दबाती है। इस विधान सभा चुनाव में भी गुजरात की बहुसंख्यक अबादी अपनी संस्कृति और अपनी अस्मिता को ध्यान में रखकर ही बटन दबायेगी। निष्कर्ष यह है नरेन्द्र मोदी सत्ता में लौटेंगे तो सिर्फ हिन्दुत्व के सवाल पर।
चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से पूर्व खूब चर्चा थी कि इस बार नरेन्द्र मोदी अपना चैंगा बदलेगे और राष्ट्रीय स्तर पर अपने आप को स्थापित करने या फिर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा को पूरी करने के लिए अपनी दंगाई छवि को बाई-बाई कहेंगे व अपनी राजनीतिक छवि ऐसी विकसित करेंगे जिससे उनकी सर्वानुमति विकसित होगी और सर्वमान्यता भी बढेंगी? उन्होंने गुजरात को बेमिसाल और अनुकरणीय विकास व उत्थान का इतिहास रचा है। उनकी राजनीतिक छवि और उनके राजनीतिक एक्सरसाइज में सिर्फ और सिर्फ गुजरात का बेमिसाल, अतुलनीय विकास व उत्थान ही होगा। ये सभी चर्चाए बेईमानी साबित हुई और इसका कोई आधार नरेन्द्र मोदी के चुनावी अभियान में किसी भी प्रकार से दिख नहीं रहा है। यह सही है कि नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के विकास की जो मजबूत नींव खड़ी की है और उस नींव पर जो मजबूत सिंहासन खड़ा किया है उस नींव और सिंहासन की गूंज क्या सिर्फ देश में ही हुई है या होती है? इसका उत्तर नहीं ही होगा। नरेन्द्र मोदी द्वारा खड़ी की गयी विकास की चाकचैबंद नींव और सिंहासन की गूंज सात समुन्दर पार तक होती है। अमेरिका-ब्रिटेन गुजरात दंगों के लिए नरेन्द मोदी के खिलाफ थे और नरेन्द्र मोदी को जमींदोज करने के लिए कूटनीतिक मुहिम चलाते थे, गैर सरकारी सगठनों को करोड़ो डॉलर देकर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रोपगंडा चलाते थे,न्यायिक प्रक्र्रिया मे हस्तक्षेप कराते थे आज वही अमेरिका-ब्रिटेन नरेन्द्र मोदी के सामने नतमस्तक हुए हैं। ब्रिटेन के उचायुक्त खुद अहमदाबाद आकर नरेन्द्र मोदी से मिलकर दोस्ती के हाथ बढ़ाये जबकि अमेरिका ने अपने यहां आने के लिए नरेन्द्र मोदी को बीजा देने की कानूनी अड़चने समाप्त करने जैसा बयान जारी किया। यह सब प्रमाण नरेन्द्र मोदी के बढ़ते कद और कामयाबी का था। इस कामयाबी पर गुजराती अस्मिता नाज कैसे नहीं करेगी? जिस सदभावना यात्रा को नरेन्द्र मोदी के बदलती राजनीतिक प्रकिया और संस्कृति को रेखाकिंग करने की कोशिश हुई थी उसमें भी नरेन्द्र मोदी की हिन्दुत्व के प्रति समर्पण और विश्वास था। एकात्मक वाद कहीं न कहीं दृष्टिगोचर था, प्रस्फुटित था, जीवंत था। यह अलग बात है कि तथाकथित भेड़ चाल में तब्दील हो चुका मीडिया और तथाकथित करेंसी संस्कृति के बुद्धिजीवी सदभावना यात्रा को मुस्लिम अस्मिता को संतुष्ट करने जैसे विवाद खड़े किये थे। नरेन्द्र मोदी की सदभावना यात्रा किसी भी स्थिति में मुस्लिम अस्मिता की तुष्टिकरण के लिए नहीं थी। मुस्लिम छेदा टोपी प्रकरण आप को याद ही होगा। सदभावना यात्रा के दौरान मुस्लिम आबादी बड़ी सक्रियता के साथ जुड़ी हुई थी। एक मुस्लिम मौलाना ने नरेन्द मोदी को मुस्लिम ‘छेदा टोपी’ पहनाने की कोशिश की थी। नरेन्द्र मोदी ने मुस्लिम छेदा टोपी पहनने से साफ इनकार कर दिया था। मुस्लिम ‘छेदा टोपी’ पहनने से इनकार करने पर तथाकथित उदारवादी-बुद्धिजीवी विवाद का पिटारा खोल दिये थे और ‘छेदा टोपी’ प्रकरण को मुस्लिम अस्मिता को अपमानित करने वाला बताया था। मुस्लिम मौलानाओं ने भी नरेन्द्र मोदी की आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सदभावना यात्रा का असली राजनीतिक-सांस्कृतिक अर्थ यह था कि गुजरात में सभी का सामान विकास और उन्नति सुनिश्चित हो रही है,शासन व्यवस्था भेदभाव से ग्रसित नहीं है। सदभावना यात्रा मुस्लिम अस्मिता को संतुष्ट करने के लिए थी नहीं। नरेन्द्र मोदी को मालूम है कि मुस्लिम अस्मिता को संतुष्ट करने के कितने घातक परिणाम होंगे और उनकी राजनीतिक जमीन किस प्रकार सिखक जायेगी? नरेन्द्र मोदी पर राजनीतिक दबाव कम नहीं थे। अपनी पार्टी के अंदर से और बाहर के उदारवादी सहचरों से भी नरेन्द्र मोदी पर भारी दबाव था कि वे दो-चार मुस्लिम प्रत्याशी बनायें। भाजपा की राष्ट्रीय नेता चाहते थे कि पार्टी को मुस्लिम आबादी के बीच सकारात्मक संदेश देने के लिए गुजरात विधान सभा चुनाव में दो-चार मुस्लिम प्रत्याशी खड़े किये जायें, खासकर मुस्लिम बहुलतावादी क्षेत्रों से, ताकि जीत भी सुनिश्चित हो सके। नरेन्द्र मोदी इस विचार को बड़ी आसानी और चालाकी से दफन कर दिया।

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