गुरू पूर्णिमा पर्व रहस्य* भाग 3 अंतिम

GuruPurnima1

Dr DK Garg

भाग3 अंतिम

2.धूर्त गुरुओ द्वारा भ्रान्ति पैदा करने के लिए कबीर के दोहे और संस्कृत के श्लोक के गलत भावार्थ का इत्यादि का सहारा: प्रयोग में लाये जाने वाले दोहे और इनके उल्टे सीधे भावार्थ देखिये :
1 सब धरती कागद करूँ लेखनी सब बन राय ॥
सात समुन्द्र की मसि करूँ , गुरु गुण लिखा न जाय ॥
2 तीन लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय।
करता करे ना करि सकै , गुरु करे सो होय ॥ (वाणी कवीर साहिब)
3 वर्तमान मे देश में छोटे बड़े हजार से ज्यादा स्वयंभू धर्म गुरु उपलब्ध है जो स्वयं को भगवान का दूत बताने से नही हिचकते, अधिकांश अनपढ़ है जो चमत्कार दिखाने और आशीर्वाद देने में माहिर हैं,इनके दरबार में खूबसूरत महिलाओं का जमावड़ा रहता है और ये जोड़े में इनकी मार्केटिंग करती है.
इन गुरुओं के अपने अपने अभिवादन है जैसे जय गुरु देव, सदगुरु,गुरु तेरा आसरा आदि. इसी तरह इनके नाम भी है जैसे श्री श्री ,सदगुरु,महा गुरु, परमगुरु आदि।
4 इन नकली गुरुओ की मंशा ये होती है की इनको पैगंबर मानकर पूजा जाए ,कभी ये कृष्ण तो कभी शिव का अवतार बन जाते है और अतीत में ऐसा होता रहा है की शुरू में प्रवचन,फिर गुरु और फिर धीरे-धीरे पैगंबर बन गए और पूजने लगे। इसलिए इनके अभिवादन भी अपनी अपनी तरह के अलग अलग होते है जैसे रविशंकर का अभिवादन जय गुरु देव, इस्कॉन का हरे कृष्णा, डेरा सच्चा सौदा वाले का -धन धन गुरु तेरा आसरा, निरंकारियों का -धन धन निरंकार जी संतो ऐसे हजारो नकली गुरु भरे पड़े है।
5 धूर्त गुरुओं के विषय में :
कबीर ने कहा है
जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।
अंधा−अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥
जिसका गुरु अँधा अर्थात् ज्ञान−हीन है, जिसकी अपनी कोई चिंतन दृष्टि नहीं है और परंपरागत मान्यताओं तथा विचारों की सार्थकता को जाँचने−परखने की क्षमता नहीं है; ऐसे गुरु का अनुयायी तो निपट दृष्टिहीन होता है। उसमें अच्छे-बुरे, हित-अहित को समझने की शक्ति नहीं होती, जबकि हित-अहित की पहचान पशु-पक्षी भी कर लेते हैं। इस तरह अँधे गुरु के द्वारा ठेला जाता हुआ शिष्य आगे नहीं बढ़ पाता। वे दोनों एक-दूसरे को ठेलते हुए कुएँ मे गिर जाते हैं अर्थात् अज्ञान के गर्त में गिर कर नष्ट हो जाते हैं।
गोस्वामी जी ने ठीक ही लिखा है–
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुरु घोर नरक महुँ परई।।(रामचरितमानस–उत्तरकांड/98-4द्)
अर्थात्–जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, परंतु शोक नहीं हरता, वह घोर नरक में पड़ता है।
जीवन में दुःख का कारण मनुष्य के स्वयं के कर्म हैं। जो जैसा करेगा वो वैसा भरेगा के वैदिक सिद्धांत की अनदेखी कर मनुष्य न तो अपने कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयत्न करना चाहता है। न ही पाप कर्मों में लिप्त होने से बचना चाहता हैं, परन्तु उस पाप के फल को भोगने से बचने के लिए अनेक अनैतिक एवं असत्य मान्यताओं को स्वीकार कर लेता हैं। जैसे कि गुरु नैया पार लगा देगा जिस दिन हम यह जान लेंगे की कर्म करने से मनुष्य जीवन की समस्त समस्यायों को सुलझाया सकता है। उस दिन हम चमत्कार जैसी मिथक अवधारणा का त्याग कर देंगे।
वास्तविक गुरु कौन है? और गुरु की उपाधि का पात्र कौन हो सकता है?
इस प्रश्न का उत्तर वैदिक साहित्य में मिलता है। जिसमें वास्तविक गुरु माता,पिता,और ईश्वर को बताया है जिसने जन्म से ही ज्ञान प्रदान किया और संस्कार दिए.वेद ज्ञान के प्रदाता चार ऋषि भी इसी श्रेणी में आते है जिन्होंने ईश्वर के ज्ञान को कलमबद्ध किया.वेद अपुरुषीय है इसलिए इस आलोक में ईश्वर और इन ऋषियों को गुरु कहा है.
मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेदः ( शतपथब्रा ०)
यह शतपथ ब्राह्मण का वचन है वस्तुतः जब तीन उत्तम शिक्षक अर्थात एक माता दूसरा पिता और तीसरा आचार्य होवे तभी मनुष्य ज्ञानवान होता है ।वह कुल धन्य है वह संतान बड़ा ही भाग्यवान् है जिसको उत्तम् धार्मिक एवं विद्वान माता -पिता प्राप्त है ।
तीसरा गुरु परमपिता ईश्वर है जो ईश्वर हमको बुद्धि देने वाला, जन्म से ही दुध पीने आदि का ज्ञान देने वाला, और समय समय पर हृदय मे निर्णय लेने का ज्ञान देने और अच्छे और गलत का आभास कराने वाला ईश्वर ही वास्तविक गुरु या सद्गुरु है।
आचार्य विद्वान का अर्थ उस शिक्षक से हैं जिसको वेद का ज्ञान है और वेद के अनुकूल आचरण करता है तथा वैदिक ज्ञान का प्रचार प्रसार करता है. धर्म को जानने वाले, धर्म मुताबिक आचरण करने वाले ,धर्मपरायण और सब शास्त्रों में से तत्त्वों का आदेश करने वाले गुरु कहे जाते हैं। उपरोक्त विश्लेषण से गुरु और शिक्षक के भेद स्पष्ट हो जाता है।बिना शास्त्रीय ज्ञान के सिर्फ आशीर्वाद देने वाले तथाकथित गुरु का उल्लेख नही है।
पर्व विधि : सामवेद मंत्र १०७७ में गुरु-शिष्य का विषय वर्णित है। मंत्र निम्न है।
तं त्वा विप्रा वचोविद: परिष्कृण्वन्ति धर्णसिम्।
सं त्वा मृजन्त्यायव:।।
मंत्र का भावार्थ:- गुरुओं का यह कर्तव्य है कि वे विद्या और सदाचार के दान से शिष्यों के हृदयों को परिष्कृत, शुद्ध और अलंकृत करें।
इस जगत का सबसे बड़ा गुरु कौन हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें योग दर्शन में मिलता हैं।
स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् || ( योगदर्शन : 1-26 )
वह परमेश्वर कालद्वारा नष्ट न होने के कारण पूर्व ऋषि-महर्षियों का भी गुरु है ।
अर्थात ईश्वर गुरुओं का भी गुरु हैं। अब दूसरी शंका यह आती हैं की क्या सबसे बड़े गुरु को केवल गुरु पूर्णिमा के दिन स्मरण करना चाहिए। इसका स्पष्ट उत्तर हैं की ईश्वर को सदैव स्मरण रखना चाहिए और स्मरण रखते हुए ही सभी कर्म करने चाहिए। अगर हर व्यक्ति सर्वव्यापक एवं निराकार ईश्वर को मानने लगे तो कोई भी व्यक्ति पापकर्म में लिप्त न होगा। इसलिए धर्म शास्त्रों में ईश्वर को अपने हृदय में मानने एवं उनकी उपासना करने का विधान हैं।
१ इस दिन अपने योग्य शिक्षकों का सम्मान करें और स्वयं भी अपने ज्ञान को आगे की पीढ़ी /साथियो को देने का संकल्प ले।
२ घर के पुस्तकालय में धार्मिक और सामाजिक पुस्तकों का संग्रह करें
३ यज्ञ के उपरांत ईश्वर के गुणों पर चर्चा करते हुए गुरु को धन्यवाद दे।

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