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बिखरे मोती

‘यमस्य लोका दध्या बभूविथ’

vijender-singh-arya1अथर्ववेद की उपरोक्त पंक्ति का भावार्थ :-जिसने मेरे अंतर को झकझोर दिया। (19/56/1)
यमस्य अर्थात नियंत्रणकर्ता, न्यायकारी भगवान। लोका-अर्थात प्रकाश से, लोक से। बभूविथ-तू समर्थ हुआ।
व्याख्या :-मनुष्य को आगाह करते हुए अथर्ववेद का ऋषि कहता है-हे मनुष्य! तू कहां से आया है? कहां तुझे जाना है? तू राही किस मंजिल का है? मनुष्य की इस सोयी हुई जिज्ञासा को मुखरित करते हुए, जगाते हुए, ऋषि इस मंत्र में स्वयं ही उत्तर देते हैं-तू तो न्यायकारी, नियंत्रणकर्ता भगवान के लोक से आया है, अर्थात इस जनम मरण के प्रवाह में पडऩे से पूर्व तू ब्रह्मलोक में था यानि कि आनंद लोक में था। मुक्ति में था और तेरा गंतव्य भी वही है अर्थात तेरी मंजिल भी वही है। हे प्राणी! तू भटक मत। हमेशा याद रख, तू तो आनंद लोक का राही है। तुझे बूंद की भांति सागर में मिलना है, परमानंद से मिलना है, उस परमतत्व से मिलना है। अतएव सत-चर्चा (परमात्मा की स्तुति, प्रार्थना और उपासना) सत्कर्म (यजन अर्थात पुण्य-वे कार्य, जिनसे परमात्मा प्रसन्न होता है) और सत चिंतन (तेरे चित्त का प्रवाह परमात्मा की तरफ हो) को कभी मत भूल ये शरीर तुझे मनुष्यत्व से देवत्व को प्राप्त करने के लिए मिला है।
भगवान श्री कृष्ण भी इस संदर्भ में गीता में अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं, हे पार्थ, यदि उस परम तत्व को प्राप्त करना चाहते हो अर्थात अपने गंतव्य पर पहुंचना चाहते हो तो, जीवन को इस भाव से जीओ:-
1.मैं शरीर नही अपितु आत्मा हूं।
2.मुझमें अनेक प्रतिभाएं हैं।
3.मुझमें अनेक शक्तियां हैं।
4.मुझमें अनेक विचार हैं।
5.मुझमें अनेक गुण हैं जिन्हें पहचानने की आवश्यकता है।
6.मैं अविनाशी हूं।
7.मैं आनंद द्वीप का वासी हूं। पृथ्वी पर कर्मक्रीड़ा करने आया हूं। अत: मुझे हमेशा ऐसे कर्म करने चाहिए जिनके आधार पर मैं पुन: आनंद द्वीप का वासी बन सकूं। उपरोक्त विचारों ने मेरे मानस को झकझोर कर रख दिया। तब यह कविता का पुष्प खिला।
तर्ज :-पी-पी पपीहा बैरी बोलता, भेद जिया के सारे खोलता तेरा, मेरे रै पिया कैसा बोल, ओ पपीहा बैरी!
न्यू मत बोलै रै गजबी बाग में।
भजन
सच से क्यों मुखड़ा मोड़ता, राह धर्म की क्यूं छोड़ता, तेरा, जग में भटक रहा ध्यान, रे मत भटकै प्राणी!
राही तू आनंद लोक का।
पल-पल उमरिया तेरी घट रही।
चित की चदरिया छिन-छिन फट रही।।
गया, भूल लक्ष्य नादान,
रे मत भटकै प्राणी…………(1)
नीड बनाया राग और द्वेष को।
भूल गया हू विश्वेश को।।
जिसने, फूंके थे तुझमें प्राण, रे मत भटकै प्राणी………(2)
भक्ति-भलाई तेरी छूटगी।
धर्म की मटकी तेरी फूटती।।
हुआ, नही निज गेह का ध्यान,
रे मत भटकै प्राणी……..(3)
संध्या समय तो नजदीक है।
जीवन बना जो रमणीय है।।
तेरा, होगा तभी उत्थान,
रे मत भटकै प्राणी…………….(4)
अपव्यय तो हो रहा तेरे तेज का।
ध्यान किया ना परहेज का।।
तेरा, शून्य रहा रहे परिणाम,
रे मत भटकै प्राणी……..(5)
जितने भी रिश्ते शमसान तक।
आगे गया ना कोई आज तक।।
तेरा, कर्म रहेगा प्रधान,
रे मत भटकै प्राणी……..(6)
मृत्यु की मृत्यु होती मोक्ष में।
देख रहा है कोई परोक्ष में।।
अपना, लक्ष्य बना निर्वाण,
रे मत भटकै प्राणी……..(7)
आत्मलोक ही ब्रह्लोक है।
रहता नही कोई शोक है।।
करले, आत्मका का तू त्राण,
रे मत भटकै प्राणी……..(8)
तीन ऋचाओं का यज्ञ कर।
तीन ही आहुति डालकर।।
ऐसा, बन जा तू यजमान,
रे मत भटकै प्राणी……..(9)
कामनाओं का कर ले अंत तू।
ऐसा रे बन जा सच्चा संत तू।।
करना, एक दिन है प्रयाण,
रे मत भटकै प्राणी……..(10)
सत-चर्चा, सत-कर्म कर।
सत-चिंतन का भी ध्यान कर।।
कह रहे, गीता में भगवान,
रे मत भटकै प्राणी……..(11)
मद आश्रय, मय्याशक्त बन।
मेरा तू आर्जव भक्त बन।
मेरी, शरण में आ नादान,
रे मत भटकै प्राणी……..(12)
आत्मा तो अंशी भगवान का।
पर्दा पडय़ा है अज्ञान का।।
हो रहा, मैं-मेरे में घमासान,
रे मत भटकै प्राणी……..(13)
सात विभूति का पात्र बन।
मुझको तो चाहिए तेरा मात्र मन।।
ले-ले मुंह मांगा वरदान
रे मत भटकै प्राणी……..(14)
नोट:-विभूति शब्द की व्याख्या विस्तार से की गयी है। अत: सात विभूतियों के संदर्भ में व्याख्या पृष्ठ 40 से 55 पर देखें।
भगवान कहते हैं:-हे मनुष्य!मुझे तेरा तन और धन नही चाहिए। मुझे तो केवल तेरा मन चाहिए। जिसने मन मेरे अर्पण कर दिया उसे तो मैं अपनी आगोश में ले लेता हूं और मुंह मांगी मुराद पूरी करता हूं।
सब कुछ पाकै परेशान क्यों?
स्व से रहा है अनजान क्यों?
तेरा पंगु रहा विज्ञान,
रे मत भटकै प्राणी……..(15)
मानस में मोती लाया भेंट में।
भूला रे मैं की चपेट में।।
क्रमश:

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