‘यमस्य लोका दध्या बभूविथ’ : राही तू आनंद लोक का

vijender-singh-arya11गतांक से आगे…..
तुझसा, प्राणी नही धनवान,
रे मत भटकै प्राणी……..(16)
पिंजरा मिल्यो है नौ द्वार को।
सुन पंछी की पुकार को।।
इसकी मूक तडफ़ पहचान,
रे मत भटकै प्राणी……..(17)
देखता रहा है, तन के रूप को।
जानाा कभी ना, निज के स्वरूप को।। तू है, दिव्य गुणों की खान
रे मत भटकै प्राणी……..(18)
चौबीसों घंटे जी इस राग में।
समर्पण, अभिप्सा और त्याग में।।
अपना, वेदों का ये विधान
रे मत भटकै प्राणी……..(19)
जान ले त्रिविध ब्रह्मा को।
सफल बना जा इस जन्म को।।
विजय छोड़ जा ऐसे निशान
रे मत भटकै प्राणी……..(20)
कुछ महत्वपूर्ण सोपानों की व्याख्या-
अपव्यय तो हो रहा तेरे तेज का।
ध्यान किया ना परहेज का।।
तेरा शून्य रहा रे परिणाम,
रे मत भटकै प्राणी……..(5)
व्याख्या:-हे मनुष्य तेरी शक्ति का अपव्यय हो रहा है। भाव यह है कि तेरा तेज अर्थात तेरी ऊर्जा, तेरी प्राणशक्ति कलह, क्लेश, राग द्वेष, काम, क्रोध, मद, मोह में व्यर्थ व्यतीत हो रही है। ठीक ऐसे, जैसे कोई नदी अपने तेज प्रवाह के साथ विपुल जल राशि को सागर में विलीन कर रही हो। काश! वह जल राशि धरती की प्यास बुझाती तो कितने प्राणियों को अन्न और जल मिलता? इतना ही नही सरिता के सीने में बहने वाले जलकणों में छिपी हुई ऊर्जा अर्थात विद्युतकणों का यदि बांध बनाकर संचयन किया जाता तो कितने कल कारखाने चलते, कितने लोगों को रोजगार मिलता? कितना बहुमुखी विकास होता? ऐसे ही मनुष्य! तेरी सोच नकारात्मक न होकर यदि सकारात्मक होती तो इस संससार का ही नही अपितु तेरी आत्मा का भी कल्याण होता। भाव यह है कि अपनी ऊर्जा का अपव्यय मत होने दे, इसे लोक कल्याणकारी कार्यों (पुण्य) में व्यतीत करो, कलह क्लेश और कुकर्मों में नही। ध्यान किया ना परहेज का से अभिप्राय है कि मन तथा पांच ज्ञानेन्द्रियों और पांचों कर्मेन्द्रियों पर कभी नियंत्रण नही किया। क्या देखना है, क्या नही देखना है, क्या सुनना है, क्या नही सुनना है, कहां जाना है, कहां नही जाना है, क्या खाना है क्या नही खाना है, क्या बोलना है, क्या नही बोलना है, क्या सोचना है, क्या नही सोचना है, क्या करना है, क्या नही करना है? इत्यादि विषयों पर हे मनुष्य! तेजी ऊर्जा का अपव्यय होता रहा। ये शरीर तो राम (भगवान) प्राप्ति का साधन था किंतु तूने अपनी अज्ञानता के कारण इसे काम (विषय और भोग) का साधन बना लिया। यह मानव जीवन तो मनुष्यत्व से देवत्व को प्राप्त करने के लिए मिला था। तूने अपने जीवन में अनेकों समस्याओं का सामना किया, पग-पग पर अनगिन कष्टï उठाए लेकिन परिणाम बीजगणित के उस बड़े सवाल की तरह रहा जिसमें अनेकों घातों, छोटे कोष्ठों, बड़े, मछले कोष्ठों को खोलने के बावजूद भी सवाल का उत्तर शून्य आता है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य तेरे जीवन का परिणाम भी शून्य रहा। अत: भटक मत, समय रहते सचेत हो जा। अपनी ऊर्जा की अपव्यय मत होने दे।
ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेंन्द्रयों में सबसे अधिक पाप रसना और वासना से होते हैं। इसलिए इन दोनों इंद्रियों पर कड़ा नियंत्रण रखना चाहिए। यहां तेज शब्द का प्रयोग केवल ऊर्जा के लिए ही नही अपितु प्रभाव (यश) के संदर्भ में भी हुआ है। माना कि मनुष्य ने अपने पुरूषार्थ और पूर्व जन्म के प्रारब्ध के आधार पर धन-दौलत, पद-प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली किंतु इस जन्म में यदि वह अपने तेज का, प्रभाव का, यश का इस्तेमाल दबंग, बनकर किसी का हक छीनता रहा, शोषण करता रहा, किसी की आत्मा को सताता रहा तो यह अपने प्रभाव (यश) का दुरूपयोग है, तेज का अपव्यय है। ऐसा व्यक्ति, लोगों की बददुआएं लेता है, अपकीर्ति के गर्त में गिरता है, इहिलोक ही नही अपितु अपना परलोक भी बिगाड़ लेता है। परमात्मा की कृपा से वंचित होने लगता है। इसलिए अपने तेज का अपव्यय किसी भी सूरत में मत होने दो ताकि तुम इस संसार में यश और प्रभु-कृपा के पात्र बने रहो। परहेज से अभिप्राय है आत्मानुशासन से। माना कि प्रभु ने मनुष्य को वाणी अनमोल उपहार दिया है, जिससे आपको बोलने का अधिकार है किंतु कटु बोलना, झूठ बोलना, असंगत बकवास करना तथा चुगली निंदा करना, परहेज की श्रेणी में आता है। यहां तक कि चारों आश्रम-ब्रह्चारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यस्थ को भी परहेज (आत्मानुशासन) से जीवन निर्वाह करने का प्रावधान हमारे धर्मशास्त्रों में है ताकि सभी अपनी अपनी मर्यादा में रहें। इसलिए परहेज (आत्मानुशासन) का हर अवस्था में पालन किया जाए। आवेश में हों अथवा आक्रोश में हों, तब भी परहेज (आत्मानुशासन) का पालन करें। ध्यान रहे जोश में भी होश कायम रहे। इस संदर्भ में कवि कितना सुंदर कहता है:-
जो जग चाहवै आपुनो, बढ़ै दिनों-दिन मोल।
रसना में जादू छिपयो, तोल-तोल कै बोल।।
++ ++ ++
जितने भी रिश्ते श्मसान तक,
आगे गया न कोई आज तक।।
तेरा, कर्म रहेगा प्रधान,
रे मत भटकै प्राणी……..(6)
कर्म के संदर्भ में यहां बृहदारण्यक उपनिषद पृष्ठ 789 (जनक की सभा में याज्ञवल्क्य और आर्तभाग का विवाद) पर उद्त प्रसंग युक्तियुक्त रहेगा:-
(1.)आर्तभाग में याज्ञवल्कय से पूछा-हे मुनिश्वर!
यह बताओ कि पुरूष के मर जाने पर कौन वस्तु है जो उसे नही छोड़ती? याज्ञवल्क्य ने कहा, नाम पुरूष को मरने के बाद भी नही छोड़ता अच्छा किया होता है तो अच्छा नाम चलता है बुरा किया होता है तो बुरा नाम चलता है।
क्रमश:

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