डॉक्टर हेडगेवार और स्वाधीनता आंदोलन

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जब RSS के संस्थापक के.बी हेडगेवार ने फूंका था अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल, ऐसे लड़ी थी आजादी की लड़ाई

अनन्या मिश्रा

आज के दिन यानी की 21 जून को आरएसएस के संस्थापक डॉ हेडगेवार का निधन हो गया था। बता दें कि उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र सेवा को समर्पित कर दिया था। जिसके चलते उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया था।

राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) के संस्‍थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की आज के दिन यानी की 21 जून को निधन हो गया था। डॉ हेडगेवार पेशे से डॉक्टर थे। लेकिन उन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। वहीं वह बचपन से ही अंग्रेजों से सख्त नफरत करते थे। हिंदुओं को उनका खोया हुआ गौरव दिलाने के उद्देश्य से डॉ हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की थी। 21 जून को ‘डॉक्‍टरजी’ के निधन के बाद 13 दिन तक शोक रहा। आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ हेडगेवार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में…

नागपुर के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में 8 अप्रैल 1889 को डॉ.केशव राव बलीराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। उनको बचपन से ही अंग्रेजों से सख्त नफऱत थी। बताया जाता है कि स्कूल में पढ़ने के दौरान जब एक अंग्रेज इंस्पेक्टर स्कूल के दौरे पर आया तो हेडगेवार ने उसका स्वागत ‘वंदे मातरम’ के जयघोष से किया था। जिस पर अंग्रेज इंस्पेक्टर इतना भड़क गया कि उसने हेडगेवार को स्कूल से निकाल दिया था। जिसके बाद उन्होंने यवतमाल से अपनी पढ़ाई पूरी की थी। साल 1914 में हेडगेवार ने एलएम एंड एस परीक्षा पास कर ली। जिसके बाद उन्होंने एक साल की अप्रेंटिसशिप पूरी की और साल 1915 में वह डॉक्टर बन नागपुर वापस लौटे।

हालांकि उनका डॉक्टरी में कुछ खास मन नहीं लगा और उन्होंने लोगों का इलाज करने की जगह उस बीमारी का पता लगाना शुरू कर दिया था। जिससे पूरा राष्ट्र पीड़ित था। अपनी इसी सोच की वजह से उन्होंने अपना पूरा जीवन देश को समर्पित कर दिया था। डॉ.हेडगेवार जब नागपुर पहुंचे तो उनकी मुलाकीत भावजी कारवे से हुई। इसके बाद दोनों ने नागपुर के क्रांतिकारी युवाओं को संगठित करने का जिम्मा उठाया। बता दें कि डॉ हेडगेवार ने कोलकाता और पंजाब के क्रांतिकारी संगठनों से बेहद करीबी संबंध रखा।

साल 1910 में जब वह डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए कोलकाता गए थे। उस दौरान वह देश की नामी क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से जुड़ गए थे। जब साल 1915 में वह नागपुर वापस लौटे तो कांग्रेस में सक्रिय हो गए। इस दौरान उन्होंने इंडियन नैशनल कांग्रेस के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। वहीं साल 1921 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए उनको जेल की सजा भी काटनी पढ़ी थी। जिसके बाद साल 1922 को डॉ हेडगेवार को जेल से रिहाई मिली थी।

26 दिसंबर 1920 में सी. विजयराघवाचार्य की अध्यक्षता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। इस दौरान एक घटना घटित हुई। कांग्रेस अधिवेशन में गौ रक्षा को लेकर एक प्रस्ताव पेश किया गया था। बताया जाता है महात्मा गांधी ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। जिसकी वजह से मामले को लेकर तनाव की स्थिति बन गई थी और मीटिंग को बीच में खत्म करना पड़ा था। इस घटना का डॉ हेडगेवार पर काफी गहरा असर पड़ा था। वहीं गांधीजी और कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति से डॉ. हेडगेवार का कांग्रेस से मतभेद शुरू हो गया था।

हिंदुओं के बीच देशभक्ति और एकता की कमी के चलते विदेशी आक्रमणकारियों के सामने हार का सामना करना पड़ा और देश गुलामी की जंजीर में जकड़ गए। तब डॉ. हेडगेवार को यह महसूस हुआ कि लोगों के मन में निस्वार्थ भाव, मजबूत चरित्र, देशभक्ति, राष्ट्रीय जागृति के बोध के साथ-साथ एकता, निस्वार्थ सेवा और अनुशासन का जज्बा पैदा करना होगा। राष्ट्र को ऊपर उठाने और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए उन्होंने एक अनोखे संगठन की स्थापना करने का फैसला किया।

डॉ. हेडगेवार ने आजीवन कुंवारे रहने का फैसला करते हुए अपना पूरा जीवन राष्ट्र को समर्पित करने की कसम खा ली थी। इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए हेडगेवार ने विजयादशमी के दिन 27 सितंबर 1925 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। जिसके बाद युवाओं के एक समूह को प्रतिदिन 1 घंटा खुले खेत में एकत्र किया जाता। उस एक घंटे के दौरान राष्ट्रीय खेल गतिविधि में युवा हिस्सा लेते। इसके बाद वह युवाओं को एकता, अनुशासन, देशभक्ति और निस्वार्थ सेवा और देश प्रेम का पाठ पढ़ाते थे।

इस दौरान वह युवाओं को देशभक्ति गीत और देशभक्तों की कहानियां सुनाकर प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने युवाओं से रोजाना राष्ट्रहित में एक घंटे शाखा में आने की अपील की थी। संघ का नाम इसकी स्थापना के पूरे एक साल बाद किया गया था। वहीं 7 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार ने अपने घर पर पहली बैठक आयोजित की थी। जिसमें कुल 26 लोगों ने हिस्सा लिया था।

साल 1925 से 1940 तक डॉ. हेडगेवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे। जिसके बाद उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहने लगा। 21 जून 1940 को डॉ हेडगेवार का निधन हो गया। बता दें कि डॉ हेडगेवार की समाधि रेशम बाग नागपुर में स्थित है।

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