Categories
डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

25 करोड़ बनाम एक अरब

25 crore vs 1 arab1857 की क्रांति के पश्चात अंग्रेजों ने भारत के लिए 1858 का भारत शासन अधिनियम लागू किया। इसके बाद 1861 में भारत परिषद अधिनियम, 1892 में भारत परिषद अधिनियम, 1909 में मार्लेमिंटो सुधार और भारतीय परिषद अधिनियम, 1919 में भारत सरकार अधिनियम, और 1935 में पुन: भारत शासन अधिनियम, कुल छह अधिनियम लागू किये। दूसरे शब्दों में 1858 से 1935 तक के 77 वर्षों में लगभग हर साढ़े 12 वर्षों के अंतराल पर अंग्रेजों को भारत में नया अधिनियम लागू करना पड़ा। इसके अतिरिक्त भारत में अपने शासन की नींव को मजबूत करने के लिए उन्हें इस देश में भारतीय दण्ड संहिता सहित कितने ही अन्य कानून भी लागू करने पड़े। ये वही अंग्रेज थे जिनके विषय में यहां कुछ लोग कहते नही अघाते कि उन्होंने ही हमें सभ्यता सिखाई और उनका दिमाग कानून का पुतला होता था। यदि ऐसा था तो उन्हें देश में लगभग हर साढ़े 12 वर्ष बाद नया संविधान क्यों लागू करना पड़ा? वस्तुत: अंग्रेज अपनी सुविधा के लिए देश में नया कानून लाते थे। उन्होंने इस देश की सुविधा के लिए तथा शासन को जनोन्मुखी बनाने के लिए कभी कोई कानून नही बनाया। उनका कानून ब्रिटेन से पास होकर आता था और ब्रिटेन में बैठे कितने ही कानून निर्माता ऐसे होते थे कि जिन्होंने कभी भारत के दर्शन भी नही किये थे। इसलिए उनसे यहां के समाज और सामाजिक परिस्थितियों के समझने की आशा नही की जा सकती थी। अत: उन कानूनों में अपने हित साधने का स्वार्थ छिपा होता था जनहित उनमें गौण होता था। उदाहरण के लिए 1860 की भारतीय दण्ड संहिता को ही आप लें, जिसे हम आज तक लागू किये हुए हैं, और हम इस संहिता को अंग्रेजों के उपकार के रूप में देखते हैं। परंतु कभी यह नही सोचा कि ये संहिता देश में लागू क्यों की गयी? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उस समय की परिस्थितियों को समझना पड़ेगा। 1857 की क्रांति में जिन असंख्य लोगों ने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष किया था, उन्हें भारत की तत्कालीन न्याय प्रणाली और न्यायाधीश देशभक्त मान रहे थे। इसलिए वो लोग तत्कालीन न्याय प्रणाली की सजा के नही, अपितु पुरस्कार के पात्र थे। तब अंग्रेजों ने अपना कानून, अपनी न्याय व्यवस्था और अपने न्यायाधीश बैठाकर इन देश भक्तों को फांसी तक पहुंचाने के लिए भारतीय दण्ड संहिता लागू की। इस संहिता में राज्य के विरूद्घ अपराध का भी एक अध्याय है। ये अध्याय अंग्रेजों ने अपने लिए ही स्थापित किया था। उन्होंने राज्य (स्टेट) अपने राज्य को ही माना। भारत में उन्होंने स्टेट की बात कही नेशन (राष्ट्र) की नही। इसलिए कहीं पर भी राष्ट्र के विरूद्घ अपराध की बात नही की। जबकि भारत में राष्ट्र के विरूद्घ अपराध की बात तो की जाती रही थी स्टेट के विरूद्घ नही। भारत का बहुसंख्यक हिंदू कभी भी राष्ट्रविरोधी नही रहा। स्वतंत्रता के बाद भी नही और उससे पूर्व के काल में भी नही। गुलामी के काल में स्टेट और नेशन दो अलग अलग चीजें थीं। स्टेट विरोधी होना तब राष्ट्र विरोधी होना नही बल्कि राष्ट्र भक्त होना माना जाता था। इसलिए हिंदू राष्ट्र द्रोही ना तो तब था और ना आज है। हां, वह उस समय राज्य विरोधी अवश्य था। इसलिए राज्य विरोधियों को फांसी तक पहुंचाने के लिए अंग्रेजों ने भारतीय दण्ड संहिता देश में लागू की। आज हम उसी संहिता को बड़ी शान से लागू किये हुए है-स्टेट और नेशन को भी हमने परिभाषित नही किया है। अंग्रेजों के कानून ने देश में सामाजिकता और नैतिकता का सत्यानाश किया। इस कानून में हृदय शून्यता का पुट था। इसमें भाव प्रधान सामाजिक और नैतिकता का सर्वथा अभाव था, और चूंकि हम इसी कानून की शैली में आज भी कानून बनाते जा रहे हैं, इसलिए आज भी इसमें संवेदनशून्यता है। उदाहरण के लिए आप समझें एक पिता अपने जीवन काल में एक पुत्र को दस बीघा जमीन अपने पैसे से लेकर देता है। जबकि दूसरे पुत्र को उसी समय कह दिया जाता है कि तुम्हें अगली बार इतने ही रूपयों की जमीन अलग से लेकर दी जाएगी। परंतु अगली बार जमीन खरीदने से पूर्व ही पिता की मृत्यु हो जाती है। तब प्रचलित कानून की व्यवस्था के अनुसार खरीदी गयी, बीघा जमीन का मालिक वही पुत्र होगा जिसके नाम से जमीन खरीद की गयी है। जबकि भारत की सामाजिक नैतिक व्यवस्था के अंतर्गत गांव समाज के सम्भ्रांत व्यक्ति दस बीघा जमीन में आधे का मालिक दूसरे भाई को भी मानते हैं और इसके लिए दूसरे भाई पर नैतिक दबाव बनाकर उस जमीन में से दूसरे भाई का हिस्सा मिनटों में दिला देते थे। जबकि आज का कानून और न्याय प्रणाली दोनों भाईयों को सालों लड़ाकर भी न्याय नही दे पाता है, अपितु देता है एक दूसरे के प्रति ईष्र्या घृणा और शत्रुता की एक विनाशकारी भावना। इसका अभिप्राय है कि अंग्रेजों का प्रचलित कानून समाज में न्याय के स्थान पर अन्याय का पोषक है और हमारी सामाजिक नैतिक व्यवस्था जिसे धर्मगत व्यवस्था कहा जाता था कहीं अधिक सक्षम और सफल थी। उस न्याय व्यवस्था में धर्म महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। अत्यंत जटिल परिस्थितियों में धर्म की सौगंध उठाने की परंपरा का निर्वाह किया जाता था। जिसे देने के लिए हर व्यक्ति तैयार नही होता था। इसलिए धर्म से व्यक्ति दण्ड की भांति डरता था। अंग्रेजों के जाने के पश्चात परिवर्तन नही हुआ। लार्ड मैकाले ने अपने काल में जिस अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली का प्रचलन देश में किया, उसे नेहरू एण्ड कंपनी के आशीर्वाद से और भी फलीभूत किया गया। जन 1948 तक गांधी जी जब तक जीवित रहे तब तक हिंदी को लेकर कोई विद्रोह या विरोध का भाव देश में नही था। क्योंकि गांधीजी स्वयं अहिंदी भाषी होकर भी हिंदी पर बल देते थे। लेकिन उनके बाद स्थिति में परिवर्तन हुआ। नेहरू जी हिंदी के प्रति कोई लगाव नही रखते थे। उन्हें अंग्रेजी से लगाव था। अंग्रेजी शैली में उन्हें राज करना अच्छा लगता था। संस्कृत को वह सर्वथा मृत भाषा मानते थे। इसलिए उन जैसे लोगों के कारण देश में हिंदी विरोधी परिवेश बनना आरंभ हुआ। फलस्वरूप देश में अंग्रेजी कानून को हटाने की बात कभी नही सोची गयी। व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रही। इसका फलितार्थ ये हुआ कि देश का बेढंगा विकास होना आरंभ हुआ। देश में तेजी से एक संपन्न वर्ग पनपा। जो आज का 25 करोड़ भारतीयों का वह संपन्न वर्ग है जो हर प्रकार से सुख सुविधा की जिंदगी बसर कर रहा है। ये भारत में अमेरिकी शैली में रहने वाले लोग हैं। सूटकेश की राजनीति का जन्मदाता यही वर्ग है। हर नेता के यहां इनका आना जाना बेरोक टोक रहता है। एक आम आदमी जिन गलियों में जाने की सोच तक नही सकता वहां इनका आना जाना रोज रहता है। उन्ही गलियों में सूटकेश देश के निर्धन वर्ग का कत्ल कराते हैं और किसी को पता तक नही चलता कि कत्ल क्यों और कैसे हो गया? आप तनिक सोचें जब देश के लार्ड साहब को सूटकेश वाले घेरे बैठे हों और जहां सूटकेशों के बल पर लार्ड साहबों की हर प्रकार की सुख सुविधा का ध्यान रखा जाता हो, चाणक्य के उस देश में क्या कोई मंत्री झोंपड़ी में रहकर देश चलाने की बात सोच सकता है। ठीक है कि देश में लोकतंत्र है लेकिन धनाढय वर्ग राजनीति उद्योग और नौकरशाही को हड़प चुका है, या कहिए कि ये तीनों मिलकर व्यवस्था का अपहरण कर चुके हैं। सत्ताधीश धनाधीश और धराधीश ये ही लोग हैं। दुख की बात तो ये है कि जो मध्यम वर्ग से या निम्न वर्ग से कोई लड़का या लड़की पढ़ लिखकर या अधिकारी बनकर आगे निकलता है वह भी इसी लुटेरे और स्वार्थी वर्ग में शामिल हो जाता है। मानो उसका जीवनोद्देश्य भी इन्हीं तक पहुंचने का था-अर्थात चमक दमक की दुनिया में गायब हो जाना। आज भी शिक्षा का उद्देश्य ये है कि आप धनिक वर्ग में कैसे जाए? एक ऐसा वर्ग जो भारतीयता से घृणा करने वाला हो और विदेशी सोच को पसंद करता हो। फलस्वरूप देश से देशी उत्पादन ही नही बल्कि देशी आदमी भी समाप्त होता जा रहा है। जिसके हाथ में वेद, महाभारत, गीता और रामायण हों, उस व्यक्ति को तथा उस पुस्तक को रूढि़वादिता का परिचायक माना जाता है, क्या भारत इसी के लिए आजाद हुआ था? सचमुच यह दयनीय व्यवस्था तो वह अवस्था नही थी-जिसके लिए आजादी की लड़ाई लड़ी गयी थी। आजादी की लड़ाई लोकतंत्र का अपहरण करने वाले और देश के आर्थिक संसाधनों पर अपना एकाधिकार जमा चुकी तत्कालीन निर्मम व्यवस्था के विरूद्घ लड़ी गयी थी। हम व्यवहार में देख रहे हैं कि एक घातक व्यवस्था से निकलकर उससे भी बुरी व्यवस्था में हम प्रविष्ट हो गये हैं। व्यवस्था परिवर्तन नही हुआ बल्कि व्यवस्था का ऊपरी लेबल बदल गया है। इसीलिए भारतीयों से ही घृणा कर भारत पर एकाधिकार कर उसे अपनी बपौती मानकर चलने वालों 25 करोड बनाम एक अरब की प्रचलित व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है। प्रचलित शिक्षा प्रणाली को जितनी शीघ्रता से बदल दिया जाए उतना ही अच्छा होगा। प्रचलित व्यवस्था में स्वार्थ पूर्ण परिवेश है जिसने हमारी सामाजिक नैतिक व्यवस्था को छिन्न भिन्न किया है। अत: देश के कर्णधारों के लिए व्यापक चिंतन की आवश्यकता है। देश बचाने के लिए देशीपन (जिसके व्यापक अर्थ हैं) को बचाना प्राथमिकता होनी चाहिए।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betvole giriş
betvole giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
winxbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
meritbet giriş
winxbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
romabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
betnano giriş
milanobet giriş
artemisbet giriş
setrabet giriş
artemisbet giriş
betnano giriş
rinabet
betorder giriş
vaycasino giriş
betorder giriş
rinabet
betnano giriş
betvole giriş
betvole giriş
setrabet giriş
milbet giriş
milbet giriş
betwild giriş
betwild giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
norabahis giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
norabahis giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betvole giriş
betvole giriş
fenomenbet
betvole giriş
betkanyon
betvole giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
imajbet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betvole giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
timebet giriş
timebet giriş
maxwin
realbahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
timebet giriş
timebet giriş
betpuan giriş
betpuan giriş
meritking giriş
meritking giriş
vaycasino giriş
meritking giriş