भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 43 , भारत के महान चिकित्साविज्ञानी भाव मिश्र

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भारत के महान चिकित्साविज्ञानी भाव मिश्र

जब भारत के राजनीतिक गगन मंडल पर अनेक विदेशी आक्रमणकारियों के द्वारा आक्रमण कर भारत की राजनीतिक स्थिति को अत्यंत दुर्बल किया जा रहा था और भारत की राजनीतिक शक्ति उन विदेशी आक्रमणकारियों से लोहा ले रही थी, तब भी भारत की मेधा शक्ति मानवता की सेवा में लगी हुई थी। वास्तव में विश्व इतिहास के इस उजले पक्ष पर ही भारत का विश्व के सभी देशों की अपेक्षा अधिक अधिकार है। भारत ने अपनी सकारात्मक ऊर्जा का रचनात्मक क्षेत्र में प्रयोग करने को प्राथमिकता दी है। यही कारण है कि जिस समय शेष संसार के देश एक दूसरे पर आक्रमण कर करके या एक दूसरे के देश में जाकर नरसंहार करने की बातों में उलझकर नकारात्मक क्षेत्र में ऊर्जा को व्यय कर रहे थे, उस समय भी भारत अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करते हुए इतिहास बना रहा था।

भारत निरंतर करता रहा विश्व का कल्याण।
मेधा शक्ति महान थी , होता रहा गुणगान।।

 जिस समय भारत पर अकबर का राज्य था, उस समय हमारे एक महान चिकित्सा वैज्ञानिक भाव मिश्र का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम लटक मिश्र बताया जाता है। जहां अकबर और उसके पश्चात उसका पुत्र जहांगीर अपने शासनकाल में हिन्दुओं की हत्या करने में आनंद की अनुभूति कर रहे थे, उसी समय इस वैज्ञानिक ने अपनी विशेष प्रतिभा से 

अपनी सकारात्मक शक्ति और ऊर्जा को संसार के कल्याण के लिए खपा दिया। एक चिकित्सा वैज्ञानिक के रूप में भाव मिश्र ने भारत के चिकित्सा विज्ञान और उसके सिद्धांतों को अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भाव-प्रकाश’ में प्रकट किया है। इस ग्रंथ के अध्ययन से इस महान चिकित्सा वैज्ञानिक के ज्ञान गांभीर्य का हमें बोध होता है। उनके सात्विक मानस, सात्विक चिन्तन और सात्विक अध्ययन से उपजी सात्विकता ने जिस सकारात्मक शक्ति का वायुमंडल में संचार किया उससे मानवता मुखरित हो उठी।
उनका संसार में आना उस समय और भी अधिक महत्वपूर्ण और सार्थक सिद्ध हो जाता है जब हम देखते हैं कि जिस काल में वह जन्मे थे, उस काल में भारत और भारतीयता पर रह-रहकर अत्याचार किए जा रहे थे। भारतीय धर्म, भारतीय संस्कृति, भारतीय चिंतनधारा और भारत के सर्वस्व को मिटाने का बहुत बड़ा खेल उस समय भारत की भूमि पर चल रहा था। यद्यपि अनेक राजनीतिक शक्तियां मिलकर ऐसे भारत विरोधी तत्वों के विनाश में लगी हुई थीं, परंतु यह भी सत्य है कि उस समय हमारी मेधा शक्ति पर भी बहुत बड़ा कुठाराघात हो रहा था। इसके उपरांत भी भाव मिश्र जी के भावपूर्ण प्रकाश से मां भारती प्रकाशित हो रही थी तो यह हमारे लिए सौभाग्य और कुत्ता का ही विषय है। आयुर्वेद का उन्होंने गहरा अध्ययन किया और अपनी उपलब्धियों के माध्यम से विश्व को भारत की ओर देखने के लिए प्रेरित किया।

बनारस नगरी देश की, जन्म लिया था आय।
अध्ययन मंथन किया, नाम दिया चमकाय।।

भारत की ज्ञान परंपरा की प्रतीक बनारस नगरी में जन्मे भावमिश्र ने चिकित्साशास्त्र के सभी प्राचीन ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था। अपने काल में उनमें और अधिक सुधार करते हुए उन्हें संशोधित और परिष्कृत रूप में तत्कालीन समाज के लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया । जिससे उनकी उपयोगिता और भी अधिक बढ़ गई। उस समय विदेशी आक्रमणकारी अपने आहार - व्यवहार और खानपान में भारत के लोगों से विपरीत मान्यताएं रखने के कारण अपने साथ अनेक प्रकार के रोगों को भी लेकर आए थे। जिससे हमारे देश के लोगों के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा था। भाव मिश्र ने उस समय भारत में आयातित रूप में पहुंची बीमारियों का भी निदान खोजने का सफल प्रयास किया। इस प्रकार के प्रयास और पुरुषार्थ से उन्हें भरपूर लोकप्रियता प्राप्त हुई। संपूर्ण देश में उनकी ख्याति फैल गई थी। उस समय उनकी बराबरी का कोई चिकित्सक संपूर्ण देश में नहीं था। संपूर्ण देश का अभिप्राय उस समय के उस वृहत्तर भारत से है जिसमें आज का पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, ईरान का कुछ क्षेत्र, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान, बर्मा, नेपाल, तिब्बत का बहुत बड़ा क्षेत्र सम्मिलित था।

अपने ग्रंथ ‘भावप्रकाश’ को उन्होंने जहां अपने अध्ययन अनुभव और ज्ञान से समृद्ध किया है वहीं इसकी भाषा शैली को भी बहुत सुंदर रखने का सफल प्रयास किया है। इस ग्रंथ में भावमिश्र ने मानव शरीर की बनावट, भारतीय चिकित्साविज्ञान अर्थात आयुर्वेद की उत्पत्ति और विकास पर प्रकाश डालने के साथ-साथ आहार विज्ञान का हमारे जीवन पर क्या प्रभाव होता है?- इस विषय को भी बड़ी सरलता से स्पष्ट किया है । हमारे प्रत्येक चिकित्सा विज्ञानी ने आहार विज्ञान पर विशेष अनुसंधानात्मक चिंतन प्रस्तुत कर मानव को आहार विज्ञान के प्रति सचेत रहने का पग पग पर संकेत किया है। भाव मिश्र ने भी इस विषय में विशेष कार्य किया। उन्होंने बच्चों के रोगों को लेकर भी बहुत उपयोगी चिंतन प्रस्तुत किया है। उनकी भाषा बहुत ही प्रांजल है।

बाल रोग कैसे मिटे, दिया था अद्भुत ज्ञान।
आहार-विहार की शुद्धता, करती है कल्याण।।

 भारत के चिकित्सा विज्ञान आयुर्वेद को उस समय तक भारत से बाहर विश्व के अन्य क्षेत्रों में भी मान्यता प्राप्त हो चुकी थी। स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विश्व के अन्य क्षेत्रों में आयुर्वेद के मूल चिंतन के साथ कुछ नई औषधियां जोड़ने के सूत्र भी अन्य भाषाओं में सम्मिलित किए गए। उन पुस्तकों को लोगों ने अलग-अलग नाम भी दिए। यद्यपि मूल रूप में भारत का आयुर्वेद ही काम कर रहा था। विश्व के इन क्षेत्रों में जहां - जहां भी आयुर्वेद की विचारधारा को लेकर अनुसंधान के दृष्टिकोण से कुछ विशेष औषधियां उसमें सम्मिलित की गई थीं उनका उल्लेख भी भाव मिश्र ने अपने ग्रंथ में किया है।

भाव मिश्र के इस प्रकार के कार्य को दूसरों की बौद्धिक संपदा को चोरी करने या अपने हित के लिए उपयोग में लाने की प्रवृत्ति के साथ जोड़कर देखने की आवश्यकता नहीं है। हमें उनके इस कार्य को इस प्रकार देखना चाहिए कि बाहरी विश्व में जहां-जहां भी चिकित्सा क्षेत्र में कार्य हो रहा था, उसके मूल में आयुर्वेद विश्व की एकमात्र चिकित्सा पद्धति के रूप में कार्य कर रहा था। इस प्रकार हमारी ज्ञान संपदा के आधार पर विकसित वैश्विक चिकित्सा ग्रंथों में आए नए अनुसंधान और प्रयोगों को उन्होंने भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप उस समय प्रस्तुत किया जब यहां भी बाहर के लोग आकर आक्रमणकारी के रूप में रहने लगे थे और भारतीय परिवेश को दूषित प्रदूषित कर रहे थे।
विदेशियों के यहां आकर बसने के बाद उस समय एक फिरंग नाम का रोग बहुत अधिक फैल गया था। वास्तव में फिरंग शब्द फ्रेंच से बना है। इसी फ्रेंच को लोगों ने फिरंगी कहा और फिरंगी का अभिप्राय विदेशी से लिया गया। यद्यपि मूल रूप में इसका अर्थ फ्रांसीसी लोगों से था। इस रोग को भी सफलतापूर्वक शांत करने में भाव मिश्र ने सफलता प्राप्त की थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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