दिल्ली में हुए साक्षी हत्याकांड से पूरी मानवता की रूह कांप गयी है

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ललित गर्ग

यह सराहनीय है कि काफी कम समय में पुलिस अपराधी तक पहुंच गई है। अब इस मामले में पूरी तेजी के साथ न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में अपराधी को त्वरित सजा एवं सख्त से सख्त सजा से ही समाज में सही संदेश दिया जा सकता है।

फिर एक और 16 साल की साक्षी की साहिल ने बेरहमी से हत्या कर दी। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के शाहबाद डेयरी में हुए इस हत्याकांड ने अनेक सवाल खड़े कर दिये हैं। समाज में बढ़ती हिंसक वृत्ति, क्रूरता एवं संवेदनहीनता से केवल महिलाएं ही नहीं बल्कि हर इंसान खौफ में है। मानवीय संबंधों में जिस तरह से बालिकाओं की निर्मम हत्याएं हो रही हैं उसे लेकर बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं। विडंबना यह है कि समाज में गहरी संवेदनहीनता पसरी है। निर्ममता-क्रूरता एवं बर्बरता हमेशा से हमारे समाज के अंधेरे कोनों में व्याप्त रही है, पर इस मामले में जिस तरह से सरेराह हिंसा एवं बेरहमी देखी गई है और उसके प्रति लोगों में जो शर्मनाक उदासीनता देखी गई है, वह अपने आप में किसी अपराध से कम नहीं है। वह हत्यारा एक नाबालिग लड़की को खुलेआम मारता रहा, इस खौफनाक एवं दर्दनाक दृश्य के दस से ज्यादा लोग साक्षी होने के बावजूद किसी ने भी हत्यारे को यह जघन्य काण्ड करने से नहीं रोका, हत्यारे ने चाकू से वार पर वार किए और लड़की का सिर तक कुचल दिया, पत्थर से भी वार किये, तब भी लोग बचाव के लिए सामने नहीं आए। कोई एक तमाशबीन भी शोर तक मचाने के लिए कुछ पल खड़ा न हुआ। एक व्यक्ति ने हत्यारे का हाथ पकड़ने की कोशिश की, पर झटके जाने के बाद हिम्मत न जुटा सका। मतलब, दस में से किसी एक व्यक्ति ने मानवीयता एवं संवेदनशीलता का तनिक भी परिचय नहीं दिया।

श्रद्धा हत्याकांड एवं उसके बाद निक्की हत्याकाण्ड जैसे कई कांड सामने आ चुके हैं। समाज बार-बार सिहर उठता है, घायल होता है। इस सिहरन को कुछ दिन ही बीते होते हैं कि नया साक्षी हत्याकांड सामने आ जाता है। इन प्रदूषित एवं विकृत सामाजिक हवाओं को कैसे रोका जाए, यह सवाल सबके सामने है। समाज को उसकी संवेदनशीलता का अहसास कैसे कराया जाए। समाज में उच्च मूल्य कैसे स्थापित किए जाएं, यह चिंता का विषय है। कभी-कभी हिंसा के ऐसे शर्मनाक एवं डरावने दृश्य सामने आते हैं कि निंदा के लिए शब्द कम पड़ने लगते हैं। इस हत्याकांड ने समाज की विकृत एवं संवेदनहीन होती स्थितियों को उधेड़ा है। नये बन रहे समाज में अगर यहां से कोई आंकड़ा निकाला जाए, तो आज समाज में दस में से कोई एक आदमी भी सामने हो रही हत्या या अन्याय को रोकने के लिए आगे नहीं आता। साक्षी अकेली जूझती रही और अंततः समाज की उदासीनता से हार गई। उस लड़की के माता-पिता बिलख रहे हैं और हत्यारे के लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं।

यह सराहनीय है कि काफी कम समय में पुलिस अपराधी तक पहुंच गई है। अब इस मामले में पूरी तेजी के साथ न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में अपराधी को त्वरित सजा एवं सख्त से सख्त सजा से ही समाज में सही संदेश दिया जा सकता है। जैसे-जैसे समाज उदार एवं आधुनिक होता जा रहा है, जड़ताओं को तोड़ कर युवा वर्ग नई एवं स्वच्छन्द दुनिया में अलग-अलग तरीके से जी रहा है, संबंधों के नए आयाम खुल रहे हैं, उसी में कई बार कुछ युवक अपने लिए बेलगाम जीवन सुविधाओं एवं प्यार को अपनी बपौती समझ कर ऐसी हिंसक एवं अमानवीय घटनाओं को अंजाम दे रहे है। साक्षी हत्याकांड में भी अपराधी लड़के को कथित रूप से यह शिकायत थी कि लड़की उससे दोस्ती रखना नहीं चाहती थी। क्या वह लड़का इतना जाहिल एवं जानवर था कि उसे अपनी बात मनवाने के लिए सभ्य तरीके नहीं आते थे? क्या वह लड़का यह मानता था कि किसी लड़की की मर्जी का कोई अर्थ नहीं है? क्या कोई लड़की अपनी मर्जी से दोस्त भी नहीं चुन सकती? क्या जबरन दोस्ती मुमकिन है? क्या कोई दोस्ती नहीं करेगा, तो उसकी हत्या हो जाएगी? यह दुस्साहस कहां से आ रहा है। समाज और देश में ऐसे सवाल बढ़ते जा रहे हैं, जिनका जवाब सभी लोगों को सोचना चाहिए।

यद्यपि समाज में प्यार करने के तौर-तरीकों पर सवाल उठाता रहा है लेकिन जो कुछ समाज में हो रहा है वह पाश्विकता एवं दरिंदगी की हद है। प्यार हो, विवाह हो या लिव-इन रिलेशनशिप, हिंसात्मक व्यवहार और हिंसक-अंत को बीमार मानसिकता से नहीं समझा जा सकता। हिन्दू-मुस्लिम प्रेम संबंधों के बढ़ते प्रचलन से यह समझना मुश्किल है कि भरोसे की बुनियाद पर खड़े संबंधों के बीच किसी व्यक्ति के भीतर इस स्तर की संवेदनहीनता एवं उन्माद कैसे उभर आता है कि वह अपनी प्रेमिका को मार डालता है। पहले तो दुनिया से छिपा कर कोई युवक किसी युवती के साथ प्रेम संबंध में या फिर सहजीवन में जाता है, फिर किसी जटिल स्थिति के पैदा होने पर उसका मानवीय हल निकालने के बजाय वह हत्या का रास्ता अख्तियार करता है। इस तरह की मानसिकता का पनपना नये निर्मित होते समाज पर एक बदनुमा दाग है एवं बड़ा प्रश्न भी है कि इस तरह के प्रेम संबंधों की ऐसी क्रूर एवं हिंसक निष्पत्ति क्यों होती है? इस तरह के व्यवहार को कैसे सोच-समझ कर की गई किसी पेशवर अपराधी की हरकत नहीं कहा जाएगा? निश्चित तौर पर ऐसी घटनाएं कानून की कसौटी पर आम आपराधिक वारदात ही हैं, लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि प्रेम संबंधों में भरोसा अब एक जोखिम भी होता जा रहा है!

आखिर बेटियों एवं नारी के प्रति यह संवेदनहीनता कब तक चलती रहेगी? युवतियों को लेकर गलत धारणा है कि उन्हें प्रेम, भौतिकतावादी जीवन एवं सैक्स के ख्वाब दिखाओं एवं जहां कहीं कोई रुकावट आये, उसे मार दो। एक विकृत मानसिकता भी कायम है कि बेटियां भोग्य की वस्तु हैं? जैसे-जैसे देश आधुनिकता की तरफ बढ़ता जा रहा है, नया भारत-सशक्त भारत-शिक्षित भारत बनाने की कवायद हो रही है, जीवन जीने के तरीकों में खुलापन आ रहा है, वैसे-वैसे महिलाओं एवं अबोध बालिकाओं पर हिंसा के नये-नये तरीके और आंकड़े भी बढ़ते जा रहे हैं। अवैध व्यापार, बदला लेने की नीयत से तेजाब डालने, साइबर अपराध, प्रेमी द्वारा प्रेमिका को क्रूर तरीके से मार देने और लिव इन रिलेशन के नाम पर यौन शोषण हिंसा के तरीके हैं। कौन मानेगा कि यह वही दिल्ली है, जो करीब दस साल पहले निर्भया के साथ हुई निर्ममता पर इस कदर आन्दोलित हो गई थी कि उसे इंसाफ दिलाने सड़कों पर निकल आई थी। अब ऐसा सन्नाटा क्यों?

जाहिर है, समाज की विकृत सोच को बदलना ज्यादा जरूरी है। बालिकाओं के जीवन से खिलवाड़ करने, उन्हें बीमार मानसिकता के साथ प्रेम-संबंधों में डालने, उनके साथ रेप, हत्या जैसे अपराध करने की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए कड़ी से कड़ी कार्रवाई करने और पुलिस व्यवस्था को और चाक-चौबंद करने की मांग के साथ समाज के मन-मिजाज को दुरुस्त करने का कठिन काम भी हाथ में लेना होगा। यह घटना शिक्षित समाज के लिए बदनुमा दाग है। अब एक सभ्य समाज के रूप में हमें अपने नागरिकों को उनके कर्तव्यों का बोध कराना ही जरूरी हो गया है। हम अपना हक पाने का, मांगने के लिए तो कहीं भी लड़ जाते हैं, लेकिन कर्तव्य या जिम्मेदरी निभाने की जब बात आती है तो कतरा कर निकल जाते हैं। यह समय है, जब हमें व्यापक रूप से समाज और संस्कृति सुधार के बारे में सोचना चाहिए। अगर ऐसी घटनाएं होती रहीं तो फिर कानून का खौफ किसी को नहीं रहेगा और सरेआम इस तरह की हत्याओं से किसी का भी जीवन कैसे सुरक्षित होगा। समाज तमाशबीन बना रहेगा तो फिर कौन रोकेगा हिंसा, हत्या, हैवानियत, बलात्कार को, और प्रेम-प्यार के नाम पर ऐसी हिंसक दरिंदगी को।

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