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स्वर्णिम इतिहास

स्वातंत्र्य संघर्ष की दोनों धाराओं के जनक ऋषि दयानंद

क्षितीश वेदालंकार
अन्य प्राणधारी जीवों से मनुष्य को अलग करने वाला कोई तत्व है, तो वह बुद्घितत्व ही है। इसीलिए गायत्री मंत्र में अन्य किसी पदार्थ की प्राप्ति की कामना न करके, ‘धियो योन: प्रचोदयात्’ कहकर केवल बुद्घि को ही सन्मार्ग पर प्रेरित करने की प्रार्थना की गयी है। ऋषियों ने अपने बुद्घिबल से धर्म अधर्म का, कर्तव्य-अकर्तव्य का और पापपुण्य का निर्धारण किया। आहार-निद्रा-भय प्रजनन आदि में अन्य प्राणियों से समान होकर भी मानव जीवन को सर्वाधिक उपयोगी बनाने का नुस्खा भी मनुष्य ने अपने बुद्घिबल से निकाल लिया। वह नुस्खा है-धर्म के लिए जीवन अर्पण करना। धर्म की रक्षा का अर्थ है- साधुओं का परित्राण और दुष्टों काा विनाश। गीतोक्त धर्म का यही सार है और पुरूष से पुरूषोत्तम (उत्तम पुरूष=श्रेष्ठ पुरूष=आर्य) बनने का यही क्रम है। जिसने अपना जीवन दुष्टों के विनाश में और श्रेष्ठ पुरूषों के परित्राण में लगा दिया वह पुरूष से पुरूषोत्तम बन गया।

हिंसा और अहिंसा
इस प्रक्रिया में हिंसा या अहिंसा का प्रश्न गौण है। अहिंसा श्रेष्ठ है, धर्म है पर उसे परमधर्म कहकर जिस निरपवाद चरमावस्था तक पहुंचा दिया गया है, वह वैदिक धर्म को अभिप्रेत नही है। जब तक संसार में बातों से न मानकर केवल लातों की भाषा समझने वालों का अस्तित्व है तब तक अहिंसा को निरपवाद बना देने से संसार में अन्याय और अत्याचार को प्रश्रय ही मिलेगा। वेद ने ‘यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यंचौ चरत: सह’ के द्वारा ब्रह्म बल को श्रेष्ठ मानकर भी क्षत्रबल को सदा उसके समान महत्व दिया है। ‘शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चर्चा प्रवर्तते’-जब राष्ट्र शस्त्र के द्वारा रक्षित होगा, तभी वहां शास्त्र चर्चा संभव होगी। वैदिक धर्म का आदर्श है-
अग्रतश्चतुरो वेदान पृष्ठत: सशरं धनु:।
इदं शास्त्रमिदं शस्त्रं शापादपि शरादपि।।
आगे-आगे चारों वेद और पीठ के पीछे वाणों से भरा तरकश तथा धनुष पहले शस्त्र, फिर शास्त्र। जो समझाने से भी, जो समझाने से भी, अहिंसात्मक शांतिपूर्ण उपायों से भी ठीक रास्ते पर नही आता, उसके लिए शर संधान आवश्यक है।
तुलसी रामायण के अनुसार जब मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम तीन दिन तक समुद्र से अनुनय विनय करते रहे और समुद्र रास्ता देने को तैयार नही हुआ, तब शरीरधारी धर्म के उस अवतार ने भी अपने क्षात्रधर्म की मर्यादा का पालन करते हुए कहा-
विनय न मानत जलधि जड़ गये तीन दिन बीत।
लक्ष्मण बाण संभालेहु, भय बिन होय न प्रीत।।
अहिंसा को चरम परम कहकर अपवाद शून्य बना देने वाले किसी मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं। जब तक संसार में रावण, कंस, दुर्योधन और शिशुपाल रहेंगे तब तक अहिंसा को अपवाद शून्य नही बनाया जा सकता, न ही राम और कृष्ण के जीवन की संगति लगाई जा सकती है। कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण के समय स्वयं अहिंसा के देवता महात्मा गांधी ने सशस्त्र सेना भेजने का समर्थन किया था और राष्ट्र नायक श्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन आक्रमण के समय अपनी गलती महसूस की थी। सच तो यह है कि चीनियों के इस विश्वासघात ने ही उनकी जान ली।

क्रांतिकारी निष्काम कर्मयोगी
यह सही है कि भारत को स्वतंत्र कराने में महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये और कांग्रेस द्वारा अपनाये गये अहिंसात्मक सत्याग्रहों का बहुत बड़ा योग है, पर क्रांतिकारियों की भूमिका को और उसी की एक शाखा केे रूप में आजाद हिंद फौज के कत्र्तव्य को-नकारना भयंकर भूल है। आज तक यह भूल होती रही-शायद जानबूझकर इस ख्याल से कि कहीं सत्ता में वे भी भाग न मांगने लग जाएं। पर सत्ता का भोग क्रांतिकारियों के दर्शन के ही विरूद्घ है। केवल त्याग और बलिदान-सो भी सर्वथा निस्वार्थ-यही क्रांति दर्शन का मूल मंत्र है। एक तरह से कहा जा सकता है कि आधुनिक राजनैतिक नेता सकाम कर्मयोगी भले ही बखाने जाएं पर गीता के निष्काम कर्मयोगी तो केवल क्रांतिकारी है। निष्काम कर्मयोग की यही परंपरा आर्य समाज को अपने प्रवर्तक ऋषिवर दयानंद से विरासत में मिली है। ऋषि दयानंद और आर्यसमाज के धार्मिक तथा सामाजिक सुधार वाले रूप पर ही आज तक अधिक जोर दिया गया है, इस सीमा तक कि इनका राजनैतिक क्रांतिकारी रूप अक्सर आंखों से ओझल रह गया है। 
क्रमश:

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