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सही दिशा में प्रभावहीन बजट

वित्त मंत्री ने छोटे उद्योगों द्वारा देय इन्कम टैक्स में कटौती की है। उनकी मंशा सही दिशा में है, परंतु छोटे उद्योग इन्कम टैक्स तब ही अदा करते हैं, जब वे जीवित रहें। वर्तमान में छोटे उद्योगों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों के तहत सरकार प्रयास कर रही है कि देश में बड़े उद्योग आएं तथा आटोमेटिक मशीनों से उत्तम गुणवत्ता का सस्ता माल बनाएं। इससे उपभोक्ता को लाभ होगा, परंतु छोटे उद्योग इनसे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं। मसलन बीते समय में छोटे शहरों में डबल रोटी तथा साबुन बनाने के छोटे कारखाने पूरी तरह समाप्त हो गए हैंज्
वित्त मंत्री ने बजट में सरकार के पूंजी खर्चों को बढ़ाने की बात कही है। ग्रामीण सडक़ एवं विद्युतीकरण जैसी महत्त्वपूर्ण योजनाओं में निवेश बढ़ाया गया है। यह कदम सही दिशा में है। इस दिशा में पहली चुनौती कार्यान्वयन की है। एनडीए सरकार के अब तक के प्रथम तीन वर्षों के कार्यकाल में सरकार के पूंजी खर्चों में गिरावट आई है। यह क्षम्य है, चूंकि बीते वर्ष में सरकार पर सातवें वेतन आयोग तथा वन रैंक, वन पेंशन के बोझ आ पड़े थे। अब इस बोझ को अर्थव्यवस्था झेल चुकी है और वित्त मंत्री के लिए पूंजी निवेश में वृद्धि करना संभव है। यदि वित्त मंत्री इस घोषणा को जमीन पर लागू करने में सफल होते हैं, तो निश्चित रूप से आम आदमी को लाभ होगा और आर्थिक विकास को गति मिलेगी।
वित्त मंत्री ने छोटे उद्योगों द्वारा देय इन्कम टैक्स में कटौती की है। उनकी मंशा सही दिशा में है, परंतु छोटे उद्योग इन्कम टैक्स तब ही अदा करते हैं, जब वे जीवित रहें। वर्तमान में छोटे उद्योगों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तरफ मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों के तहत सरकार प्रयास कर रही है कि देश में बड़े उद्योग आएं तथा ऑटोमेटिक मशीनों से उत्तम गुणवत्ता का सस्ता माल बनाएं। इससे उपभोक्ता को लाभ होगा, परंतु छोटे उद्योग इनसे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते हैं। मसलन बीते समय में छोटे शहरों में डबल रोटी तथा साबुन बनाने के छोटे कारखाने पूरी तरह समाप्त हो गए हैं, चूंकि बड़ी कंपनियों द्वारा इन्हीं माल को सस्ता बना कर बाजार में बेचा जा रहा है। छोटे उद्योगों पर दूसरी मार सस्ते आयातों की है। चीन में बने सस्ते पटाखे तथा खिलौनों ने घरेलू उद्योगों को बंद करा दिया है। इन मूल समस्याओं का समाधान आयकर में कटौती करके हासिल नहीं होता है।
छोटे उद्योगों को गतिमान बनाने के लिए एक्साइज ड्यूटी में छूट बढ़ानी थी। मान लीजिए छोटे उद्योग में साबुन के उत्पादन की लागत 10 रुपए आती है। बड़े उद्योग द्वारा वही साबुन आठ रुपए में बना लिया जाता है। बड़े उद्योग को तीन रुपए एक्साइज ड्यूटी अदा करनी हो, तो उन्हें इसे 11 रुपए में बेचना होगा। ऐसे में छोटे उद्योग को एक्साइज ड्यूटी अदा न करनी हो तो वह इसे 10 रुपए में बेच सकते हैं। तब छोटे उद्योग चल निकलेंगे। समानांतर कदम में छोटे उद्योगों द्वारा बनाए जा रहे माल पर आयात कर भी बढ़ाना होगा। अन्यथा बड़े घरेलू उद्योगों के स्थान पर हमारे छोटे उद्योग बड़े विदेशी उद्योगों के हाथ मारे जाएंगे। छोटे उद्योगों को कमाई के बाद इन्कम टैक्स अदा करने में कठिनाई कम है। इन्कम टैक्स में छूट बढ़ाने की जगह एक्साइज ड्यूटी में छूट देनी थी और आयात में वृद्धि करनी थी। वित्त मंत्री ने छोटे उद्योगों की इस मूल समस्या की अनदेखी की है, इसलिए इनकी स्थिति दुरूह बनी रहेगी। इन उद्योगों द्वारा ही अधिकतर रोजगार उत्पन्न किए जाते हैं, इसलिए आने वाले समय में रोजगार की स्थिति भी कठिन बनी रहेगी। वित्त मंत्री ने बजट में कृषि की बुनियादी संरचना में निवेश बढ़ाने की बात कही है। मनरेगा के अंतर्गत उत्पादक कार्य करने पर जोर रहेगा। ग्रामीण सडक़ों का विस्तार किया जाएगा। गांवों के विद्युतीकरण को अधिक धन उपलब्ध कराया गया है। ये कदम सही दिशा में एवं स्वागत योग्य हैं। परंतु इन कदमों के बावजूद किसान की आय दोगुना होने के स्थान पर घटती जाएगी। इस निवेश से किसान की उत्पादन लागत में गिरावट आएगी। टमाटर का उत्पादन वह 20 रुपए प्रति किलो के स्थान पर 19 रुपए प्रति किलो में कर सकेगा, परंतु बाजार में टमाटर के दाम 21 रुपए से घट कर 18 रुपए रह जाएं तो किसान का घाटा बढ़ेगा। पूर्व में वह 20 रुपए में उत्पादन करके 21 रुपए में बेचता था और एक रुपए का लाभ कमाता था। अब वह 19 रुपए में उत्पादन करके 18 रुपए में बेचेगा और एक रुपए का घाटा खाएगा। स्वतंत्रता के बीते 70 वर्षों में किसान की यही कहानी रही है। सरकार ने कृषि में निवेश किया, किसान ने उत्पादन बढ़ाया, परंतु दाम घटते गए और किसान मरता गया। कृषि में निवेश बढ़ाने से कृषि उत्पादों के निरंतर गिरते दाम की समस्या हल नहीं होती है। यहां संज्ञान लेना चाहिए कि कृषि उत्पादों के गिरते मूल्य का लाभ शहरी उपभोक्ताओं को मिलता है। आज देश की 60 प्रतिशत आबादी शहरों में रहने लगी है अथवा परिवार के कर्ता शहर में कामकाज करते हैं। शहरवासियों की टेलीविजन तथा सोशल मीडिया में भी पहुंच है। वोट की गणित में शहरवासी भारी पड़ते हैं। इसलिए वित्त मंत्री ने अनकहे तौर पर शहर के हितों को साधा है और गांव को स्वाहा किया है। राजनीतिक दृष्टि से वित्त मंत्री के पास दूसरा विकल्प नहीं था। कृषि उत्पादों के गिरते मूल्यों की अनदेखी करना उनकी राजनीतिक मजबूरी थी, परंतु तब वित्त मंत्री को किसान की आय दोगुना करने के फर्जी वादे करके गुमराह नहीं करना चाहिए। वित्त मंत्री ने बजट में सेवा कर में वृद्धि नहीं की है, परंतु साथ-साथ संकेत दिया है कि गुड्स एंड सर्विस टैक्स के लागू होने पर सेवाओं पर देय सर्विस टैक्स में वृद्धि की जाएगी। इस मंतव्य पर सावधानी से चलना चाहिए। इस समय देश की लगभग 55 प्रतिशत आय सेवा क्षेत्र से आ रही है। इसमें तमाम सेवाएं शामिल हैं जैसे रेल यात्रा, रेस्तरां में भोजन करना, सॉफ्टवेयर को बनाना, किताबों का अनुवाद करना इत्यादि। सेवा क्षेत्र में ही नए रोजगार उत्पन्न हो रहे हैं। इसलिए सेवा कर बढ़ाना सोने के अंडा देने वाली मुर्गी पर टैक्स बढ़ाना सरीखा होगा। लेकिन इस क्षेत्र को टैक्स से अछूता भी नहीं छोड़ा जा सकता है। वित्त मंत्री को सडक़ों आदि में निवेश करने के लिए राजस्व चाहिए। संभव नहीं है कि देश की आय में 25 प्रतिशत योगदान करने वाले विनिर्माण क्षेत्र पर टैक्स का बोझ बढ़ाया जाए और 55 प्रतिशत योगदान करने वाले सेवा क्षेत्र को अछूता छोड़ दिया जाए। इस समस्या का समाधान है कि सेवा क्षेत्र को दो हिस्सों में बांट दिया जाए-खपत एवं उत्पादन। जैसे रेस्तरां में भोजन करना खपत है, जबकि सॉफ्टवेयर को बनाना उत्पादन है, यद्यपि दोनों ही सेवा क्षेत्र में गिने जाते हैं। कुछ सेवाएं मिलीजुली हैं, जैसे रेल यात्रा।
वित्त मंत्री को चाहिए कि तमाम सेवाओं का अध्ययन कराएं। आकलन कराएं कि प्रत्येक सेवा में खपत का हिस्सा कितना है और उत्पादन का कितना। फिर सेवाओं को ‘खपत’ एवं ‘उत्पादन’ श्रेणीयों में वर्गीकृत कर दें। खपत वाली सेवाओं पर 18 प्रतिशत अथवा 28 प्रतिशत की दर से जीएसटी लगाएं। उत्पादन वाली सेवाओं पर पांच प्रतिशत अथवा 12 प्रतिशत की दर से जीएसटी लगाएं। ऐसा करने से सेवा क्षेत्र द्वारा टैक्स अदा किया जाएगा और साथ-साथ सेवाओं का उत्पादन भी बढ़ेगा। देश की आर्थिक विकास दर बढ़ेगी और रोजगार उत्पन्न होंगे। वित्त मंत्री की मंशा सही दिशा में है, परंतु उपरोक्त विषयों की अनदेखी करने के कारण इस बजट का परिणाम सुखद नहीं रहेगा।

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