भारत के 50 ऋषि वैज्ञानिक अध्याय – 27 उत्तर मीमांसा के रचनाकार बादरायण व्यास

images - 2023-05-06T093304.136

उत्तर मीमांसा के रचनाकार बादरायण व्यास

उत्तर मीमांसा या वेदांत दर्शन का प्रवर्तक महर्षि व्यास को माना जाता है। धर्म जिज्ञासा के उपरांत मनुष्य की दूसरी जिज्ञासा ब्रह्म जिज्ञासा की होती है। ब्रह्यसूत्र का प्रथम सूत्र इसी जिज्ञासा की ओर संकेत करता है-

अथातो ब्रह्यजिज्ञासा।।

ब्रह्य के जानने की लालसा। ब्रह्म जिज्ञासा का अभिप्राय है कि इस जगत का कारण क्या है? हम कहां से उत्पन्न हुए हैं? कहां स्थित हैं? इस संसार में रहकर हमें सुख दु:ख की अनुभूति क्यों होती है? जगत में जो कुछ भी दिखाई दे रहा है यह सब क्या है, और क्यों है ? ‘श्वेताश्वरोपनिषद्’ में भी इसी प्रकार की जिज्ञासा व्यक्त की गई है।

जगत का कारण क्या है जड़ में ? हम क्यों आए हैं जग में ?
दु:ख की अनुभूति क्यों होती ? – भाव उठें जब ये मन में।
तब समझो ब्रह्म जिज्ञासा है, – है उसे जानने की इच्छा,
क्या, क्यों, कैसे ये सारे ,जिज्ञासा की तपन बढ़ाते हैं मन में।।

संसार में रहकर क्या करना है और क्या नहीं करना है ? यह मनुष्य की पहली जिज्ञासा है। ब्रह्म जिज्ञासा को लक्ष्य में रखकर रचे गए इस वेदांत दर्शन में कुल 4 अध्याय हैं। इसके कुल सूत्रों की संख्या 555 है। मनुष्य को संसार की कीचड़ से निकालकर परमानंद के सागर में गोते लगाने की ओर खींचकर ले जाना और ब्रह्म का साक्षात्कार कराकर शांति अर्थात मोक्ष प्राप्त करा देना ही ब्रह्म जिज्ञासा का अंतिम उद्देश्य है। जब हमको यह अनुभव होने लगता है कि हम कीचड़ के प्राणी नहीं हैं, हम तो आनंदलोक के वासी हैं तो विवेक जागृत होने लगता है। इसके पश्चात संसार रूपी कीचड़ से विरक्ति होने लगती है। मल, विक्षेप, आवरण समाप्त होने लगते हैं । सारे क्लेश मिटने लगते हैं। उनका संक्षेप होते-होते प्रक्षेप होकर विक्षेप हो जाता है। तब हमारे अंतर में बैठा हुआ ब्रह्म हमें स्वयं ही दिखाई देने लगता है। कहीं इसी को यक्ष कहा गया है तो कहीं इसी प्रकार के दूसरे नाम से संबोधित किया गया है।
कहने के लिए तो ब्रह्म का मिलना बड़ा सरल सा दिखाई देता है, पर व्यवहार में सच यही है कि इसे पाने के लिए अर्थात आत्मसाक्षात्कार करने के लिए बड़ी गहन साधना की आवश्यकता होती है। वेद का परम और अंतिम तात्पर्य इसी ब्रह्म की प्राप्ति कराना है, मोक्ष की प्राप्ति कराना है, यही कारण है कि उत्तर मीमांसा को हम वेदांत दर्शन के नाम से भी जानते हैं।
वेदस्य अन्त: अन्तिमो भाग इति वेदान्त:।। यह वेद के अन्तिम ध्येय और कार्य क्षेत्र की शिक्षा देता है।
वेदांत दर्शन को भारतीय अध्यात्मशास्त्र का मुकुट मणि माना गया है। हमारी सारी बाह्य प्रवृत्तियों को अंतर्मुखी करने की क्षमता हमें वेदांत से ही प्राप्त होती है। वेदान्त दर्शन के माध्यम से ही हमें प्रकृति, जीवात्मा और परमात्मा तीनों के अनादि होने का भेद पता चलता है। इनका ना कोई आदि है और ना कोई अंत है। इन तीनों को ही ब्रह्म भी कहा जाता है। जिसमें यह तीनों ब्रह्म समाविष्ट हैं, उसे परम ब्रह्म कहते हैं। वेदांत दर्शन में ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों का परस्पर संबंध क्या है और इन तीनों का स्वरूप क्या है ? इस पर गहन चिंतन बीज रूप में व्यक्त किया गया है। ब्रह्म के शुद्ध स्वरूप को इस दर्शन के माध्यम से ‘नेति नेति’ कहकर स्पष्ट किया गया है। बौद्धिक अंधकार और जड़ता को समाप्त कर मनुष्य को शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर तत्वदर्शी बनाने की ओर आगे चलने का काम वेदांत दर्शन करता है।

ईश्वर, जीव और प्रकृति तीनों को ही अनादि माना है।
ना आदि इनका मिलता है ना अंत का कोई ठिकाना है।।

प्रकृति सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण वाली है। इसीलिये इसे त्रिगुणात्मिका भी कहा जाता है। इसी सत, रज, तम को चिकित्सा क्षेत्र में प्रकारांतर से वायु, पित्त ,कफ के नाम से जाना जाता है तो विज्ञान के क्षेत्र में इन्हें इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रॉन और प्रोटॉन कहा जाता है। प्रकृति के सत, रज, तम तीनों गुणों का वर्णन वेदांत दर्शन में अर्थात उत्तर मीमांसा में किया गया है। वेदांत दर्शन के रचनाकार ने अपने इस दर्शन के माध्यम से हमें बताया है कि जीवात्मा जन्म-मरण के बंधन में क्यों आता है और किस प्रकार जन्म मरण के इस दु:ख भरे जंजाल से उसकी मुक्ति हो सकती है ?
प्रकृति को ही हमारे यहां माया कहा जाता है। माया उसे कहते हैं जिसकी प्रतीति तो हो पर वास्तव में वह ना हो। प्रकृति अनेक रूप धारती है और हम देखते हैं कि उसके द्वारा धारण किए गए यह अनेक रूप समय आने पर नष्ट होते रहते हैं। इसके सारे रूपों की क्षणभंगुरता ही इसे माया बनाती है। प्रकृति ही जगत का उपादान कारण है। इसे मिथ्या कहना भी उचित नहीं है। क्योंकि वास्तव में यह अपनी सत्ता बनाए रखती हैं। परमपिता परमेश्वर सच्चिदानंद स्वरूप है। सच्चिदानंद शब्द सत चित और आनंद से बना है। प्रकृति में सत् है, जीव में चेतन और सत् दोनों हैं। जबकि ईश्वर में सत्, चित और आनंद तीनों हैं। प्रकृति में चेतन और आनंद नहीं हैं, इसी प्रकार जीव में सत और चित तो हैं, पर आनंद नहीं है। जीव प्रकृति और ईश्वर के बीच में खड़ा है। अपने से हीन अर्थात प्रकृति की ओर उसे जाना ही नहीं चाहिए। इसीलिए उसका लक्ष्य परमपिता परमेश्वर की प्राप्ति है। ब्रह्म का साक्षात्कार ही ईश्वर की प्राप्ति और आनंद की प्राप्ति है।
डॉ राधाकृष्णन ने लिखा है कि यह जगत मिथ्या नहीं है, ना ही इसका ढांचा स्वपन के समान है, यह वास्तव में अपनी विशेष सत्ता रखता है। स्वामी दयानंद जी महाराज ने भी ‘वेदांति ध्यान्तनिवारण’ में लिखा है कि “जो जीव ब्रह्म हो तो जैसी ब्रह्म ने यह असंख्या सृष्टि करी है, वैसे एक मक्खी और मच्छर को भी जीव क्यों नहीं कर सकता? इससे जगत को मिथ्या और जीव ब्रह्म की एकता मानना ही मिथ्या है।”
भारतीय दर्शन शास्त्री इस बात पर एकमत रहे हैं कि निमित्त कारण ,उपादान कारण और साधारण कारण के चलते चराचर जगत का यह सब खेल चल रहा है। मिट्टी के पात्र बनाने वाला कुंभकार और मिट्टी दोनों मिलकर भी तब तक कोई नया पात्र नहीं बना सकते जब तक कि दंड और चक्र कुंभकार के पास ना हों। अतः नया घड़ा बनाने के लिए कुंभकार, मिट्टी और इनके साथ साथ दंड और चक्र का होना अनिवार्य है। नव निर्माण की इस प्रक्रिया में कुंभकार निमित्त कारण है , मिट्टी उपादान कारण है और दंड चक्र आदि साधारण कारण है। परमपिता परमेश्वर सृष्टि निर्माण में जहां निमित्त कारण है, वहीं प्रकृति उपादान कारण के रूप में जानी जाती है। जैसे बिना मिट्टी के कुंभकार कोई नया घड़ा नहीं बना सकता, वैसे ही बिना प्रकृति रूपी उपादान करण के परम पिता परमेश्वर भी सृष्टि रचना नहीं कर सकते। जो लोग यह कहते हैं कि बिना प्रकृति के ही सब कुछ बन गया, सृष्टि बिना कर्ता के बन गई, उनका यह तर्क ज्ञानी दर्शनाचार्यों की दृष्टि में निरंकुश बुद्धि का तर्क रहित दर्शन का निराधार प्रलाप मात्र है।

कुंभकार नहीं बना सकेगा बिन मिट्टी कोई पात्र।
कुंभकार बिन मिट्टी भी नहीं बन सकती है पात्र।।
कुंभकार है निमित्त यहां , और प्रकृति उपादान।
चक्र है साधारण कारण, ऐसा सही-सही जान।।

सृष्टि के संबंध में निमित्त कारण उसे माना जा सकता है जो स्वयं अदृश्य हो, अपरिवर्तनीय हो, कहीं दूर होकर भी निकट हो, छुपा होकर भी उजागर हो, जो निराकार हो, वह अपने इसी प्रकार के स्वरूप से दृश्य घटकों का निर्माण करता है। उपादान कारण उसे कहते हैं, जिससे निर्माता किसी नवीन पदार्थ की रचना करता है, निर्माण करता है। उपादान कारण प्रकृति को माना गया है तो जीव को साधारण कारण माना गया है। इस प्रकार ईश्वर निमित्त कारण, प्रकृति उपादान कारण और जीव साधारण कारण के रूप में व्याख्यायित किया गया है।
ईश्वर, जीव और प्रकृति के इस स्वरूप की व्याख्या करने वाले वेदांत दर्शन के आचार्य बादरायण व्यास जी को शत शत नमन।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

Comment:

betnano giriş
betparibu giriş
efesbet giriş
efesbetcasino giriş
efesbetcasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
romabet giriş
sekabet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
romabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
batumslot giriş
vaycasino giriş
betplay giriş
efesbet giriş
efesbetcasino giriş
efesbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
yakabet giriş
norabahis giriş
yakabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betplay giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
tlcasino
fiksturbet giriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
Restbet giriş
Restbet güncel
vaycasino giriş
vaycasino giriş
meybet giriş
meybet giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
casival
casival
betnano giriş
betnano giriş
betplay giriş
betplay giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
betplay giriş
betplay giriş
betnano giriş
timebet giriş
timebet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
favorisen giriş
favorisen giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
nesinecasino giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
efesbet giriş
efesbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş