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विशेष संपादकीय

गोली का आदेश नहीं है-दिल्ली के दरबारों से!

भारतीय सेना का एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। भारत में सेना के होने की पुष्टि भारत के प्राचीन साहित्य से भली प्रकार होती है। सेना राजा की अहिंसक नीति को राज्य में लागू कराने तथा विदेशी शत्रु से अपने देश की सीमाओं की रक्षा के दायित्व संभालती रही है। ‘राजा की अहिंसक नीति’ से हमारा अभिप्राय है-राजा अपनी प्रजा में शांति व्यवस्था स्थापित करने के लिए अर्थात अहिंसा की रक्षा के लिए और अहिंसक लोगों की सुरक्षा हेतु जिस हिंसा को अर्थात समाज के दुष्ट लोगों का संहार करने को अनिवार्य मानता है, सेना उस कार्य को स्वयं करने में सक्षम होती है। विदेशी राजा अपने राज्य विस्तार की योजना को सिरे चढ़ाने हेतु हम पर कभी भी आक्रमण कर सकता है। ऐसे विदेशी राजा की किसी भी योजना को सिरे चढऩे से पूर्व मसल देना हमारी सेना का दायित्व होता है। यह एक सर्वमान्य सत्य है कि दायित्व की पूत्र्ति में कत्र्तव्यबोध देखा जाता है-उसमें किसी को कोई अधिकार था या नहीं था यह नहीं देखा जाता। दायित्व और कत्र्तव्य के पीछे विवेक खड़ा होता है-और विवेक कभी भी कोई गलत कार्य नहीं होने देता। 
भारत की सेना भारत की लंबी सीमाओं की रक्षा सदियों से करती आ रही है। इस सेना ने सदा भारत की एक एक इंच भूमि के लिए संघर्ष किया है और कितनी ही बार शत्रु को भारत की सीमाओं से बाहर खदेडऩे में सफलता प्राप्त की है। जब-जब इस सेना ने ऐसा कार्य किया है तब कभी भी इसकी विवेक शक्ति पर किसी ने प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया। इसका कारण यही रहा है कि हमारी सेना ने जो कुछ किया वह अपना दायित्व और कत्र्तव्य मानकर किया और उस दायित्व और कत्र्तव्यभाव के पीछे इसकी विवेकशक्ति सदा जाग्रत रही। यहां सूपनखा के प्रणय निवेदन को राम ठुकरा देते हैं और उसका अपहरण या शीलभंग नहीं करते, इसी प्रकार शिवाजी शत्रु पक्ष की सुंदर महिला को भी माता का सम्मान देकर सादर शत्रु पक्ष को लौटा देते हैं। भारत के राजाओं की इस महान परम्परा का हमारी सेना ने सदा सम्मान किया है। यह बलात्कारियों की सेना नहीं है अपितु बलात्कारियों को दंडित करने वाली सेना है।
आज भारत की सेना के सामने भीतर के ‘जयचंदों’ के ‘छलछंदों’ से लडऩे की बड़ी चुनौती है। कुछ लोगों का मूर्खतापूर्ण तर्क है कि  ‘जयचंदों’ को अपना मानकर उनके ‘छलछंदों’ के प्रति सेना को मानवतावादी आत्मीय व्यवहार करना चाहिए। अब ऐसे मूर्ख लोगों को यह कौन समझाये कि जो ‘जयचंदों’ के ‘छलछंदों’  में लगकर मां भारती का अपमान करने की योजनाओं में संलिप्त हैं-वे अपने नहीं हैं और उन्हीं के विनाश के लिए सेना का गठन किया जाता है। इसलिए भारतीय सेना को इन ‘जयचंदों’ के ‘छलछंदों’ से निपटने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए। भारतीय सेना के हाथ बांधने का अभिप्राय है कि इन लोगों के सामने सवा अरब की आबादी का यह देश आत्मसमर्पण करता है और उनके कायरतापूर्ण कृत्यों को अपनी मौन स्वीकृति प्रदान करता है। जिसे कभी भी एक जीवंत राष्ट्र को स्वीकार नहीं करना चाहिए। 
क्रांतिवीर सावरकर के समक्ष अमेरिका के एक पत्रकार लुई फिशर ने आकर प्रश्न किया कि आप भारत का विभाजन क्यों नहीं होने देते? इस पर सावरकर जी ने लुई फिशर से प्रतिप्रश्न किया कि आप नीग्रो लोगों को उनकी भारी मांग के उपरांत भी एक अलग देश क्यों नहीं देते? तब लुई फिशर ने कहा कि हम देश का बंटवारा कभी पसंद नहीं करेंगे। इस पर सावरकरजी ने कहा कि जो दृष्टिकोण आपका नीग्रो लोगों के प्रति है-वही हमारा उन लोगों के प्रति है जो देश का बंटवारा चाहते हैं। 
यह वीरोचित उत्तर था वीर सावरकर का। इसी कार्यशैली को हमारी राजनीति का राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के संदर्भ में मूल आधार बनाया जाना चाहिए था। यदि ऐसा होता तो दुष्ट विघटनकारी और देश का अहित करने वाले लोगों को यह सारा देश एक ही दृष्टिकोण से देखता और उनका एक ही उपचार घोषित करता कि इनका कोई भी रक्षक नहीं हो सकता और इन्हें हमारी सेना जैसे और जब चाहे तब समाप्त कर सकती है। माना कि हमारी इस मान्यता में कुछ अतिवादिता हो पर ऐसी अतिवादिता नित्य प्रति की अतिवादिता को समाप्त कर पूर्ण शांति बनाने में और देश को उन्नति और विकास की ओर ले चलने में सदा सहायक होती है। ऐसी परिस्थितियों में हमारे सैनिकों के हाथों को बांधकर रखना और उन्हें शत्रु के समक्ष मरने के लिए अकेला छोड़ देना एक राष्ट्रीय अपराध है। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार से सारा देश एक स्वर से यह अपेक्षा करता है और मांग करता है कि हमारे सैनिकों के नित्य प्रति के बलिदानों से हम दुखी हो चुके हैं। उनके हाथों में आपने हथियार तो दिये हैं परंतु स्मरण रहे कि ये हथियार आपने उनके हाथों को बांधने के लिए नहीं अपितु शत्रु को बांधकर लाने और मां भारती के श्रीचरणों में लाकर पटकने के लिए दिये हैं। शत्रु शत्रु होता है, उसमें अपना पराया कुछ नहीं होता। शत्रु चाहे इस पार का हो चाहे उस पार को हो-वह हमारा केवल शत्रु है और उससे हमारी सेना वैसे ही निपटे जैसे शत्रु से निपटा जाता है-‘तो कोई बात बने’। आज की परिस्थितियों में तो हमारा वीर सैनिक हमें मौन रूप में आंदोलित और आक्रोशित करते हुए केवल यही कह रहा है-
सरकारें ही पिटवाती हैं-हमको इन गद्दारों से, 
गोली का आदेश नहीं है दिल्ली के दरबारों से।।
आज दिल्ली का दरबार कायरों का दरबार नहीं है, आज के दिल्ली दरबार से अपेक्षा है कि वह यथाशीघ्र हमारे सैनिकों को गोली का आदेश दे और हमें सम्मान से जीने के लिए प्रेरित करे।

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