Categories
पूजनीय प्रभो हमारे……

पूजनीय प्रभो हमारे……भाग-53

लाभकारी हो हवन हर जीवधारी के लिए

जब हम कहते हैं कि ‘लाभकारी हो हवन हर जीवधारी के लिए’ तो उस समय हवन के वैज्ञानिक और औषधीय स्वरूप को समझने की आवश्यकता होती है। हवन की एक-एक क्रिया का बड़ा ही पवित्र अर्थ है। इस अध्याय में हम थोड़ा-थोड़ा प्रकाश याज्ञिक क्रियाओं की वैज्ञानिकता पर डालेंगे। साथ ही यह भी बताने का प्रयास करेंगे कि किसी भी याज्ञिक क्रिया के करने से हमारे शरीर और उसके रोग निवारण पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है?
सर्वप्रथम आचमन पर आते हैं। इसमें जल को चूसकर पिया जाता है। जल को चूसकर पीने से शारीरिक निरोगता तथा मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। आचमन एकयौगिक क्रिया है, जिसके जल से मस्तिष्क की अमृतग्रंथि में से रस का स्राव-कान या तालु मार्ग से मुख में आकर मिल जाता है, जो कण्ठकूप में स्थित ‘विशुद्घि चक्र’ को प्रभावित करता है। इस क्रिया के करने से सात्विकता विकसित होती है। साथ ही इस प्रकार जल को नियमित पीने से रक्त की पुष्टि होती है। तीन बार आचमन करने का अभिप्राय है, मन वचन एवं कर्म की एकता से अपने शरीर में सत्य, यश और श्री की अभिवृद्घि करना। इस प्रकार आचमन की क्रिया भी हमारे लिए शारीरिक नीरोगता का कारण है।
अब आते हैं अंग स्पर्श पर। इस क्रिया में इंद्रियों का स्पर्श कर शरीर को बाह्य रूप में पवित्र करने की क्रिया संपन्न की जाती है। मन, वचन और कर्म की एकता हमें आचमन से प्राप्त हो जाती है, जिससे हमारे भीतर सदभावनाएं विकसित होती हैं। व्यक्ति को आचमन के पश्चात ही एक अदभुत सी शांति का अनुभव अपने भीतर होने लगता है। उसी शांति की अनुभूति में गोते खाते-खाते जब अंग स्पर्श किये जाते हैं तो उस शांति मिश्रित आत्मबल की धारा को हम अपने शरीर के अंग प्रत्यंग में प्रवाहित करने लगते हैं। मानो शरीर रूपी भवन के एक-एक कक्ष में विद्युत बल्बों की श्रंखला को प्रदीप्त करने लगते हैं। साथ ही ऐसा अनुभव होने लगता है कि इस असार संसार से हमारा संबंध विच्छेद हो गया है। इस स्थिति को यज्ञ की मानसिक पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। जैसे भोजन से पूर्व हम भोजन के लिए जब मानसिक रूप से तैयार होते हैं तो उस समय हमारे मुंह में लार अपने आप आ जाती है। लार का आना स्वाभाविक शारीरिक क्रिया है जो हमें मानसिक रूप से भोजन के साथ जोड़ देती है। 
ईश्वर अपने आप भोजन के आने से पूर्व लार को इसलिए भेजते हैं कि उसके रस से भोजन सुपाच्य बनेगा, इसी प्रकार अंग स्पर्श आदि करने से हम मनोवैज्ञानिक रूप से हवन के साथ जुड़ जाते हैं। जिससे हमारे भीतर श्रद्घारूपी रस की उत्पत्ति होती है जो प्रत्येक वेदमंत्र के साथ घुल-मिलकर जब भीतर जाती है तो आत्मिक भोजन को हमारे कल्याणार्थ स्वादु और सुपाच्य बना देती है। हर इंद्रिय को यह क्रिया दिव्यता प्रदान करती है। इसीलिए वाणी नाक, आंख, कान, भुजा पैर आदि इंद्रियों का मार्जन इस क्रिया में किया जाता है। अंग स्पर्श के मंत्रों को कर्मकाण्डीय ग्रंथ पारस्कर ‘ग्रहयसूत्र’ से लिया गया है।
अंग स्पर्श के पश्चात महर्षि दयानंद जी महाराज ने ईश्वर स्तुति-प्रार्थना-उपासना के आठ मंत्रों को रखा है, इन आठों मंत्रों में ईश्वर की स्तुति अर्थात उसका संकीर्तन=गुण गण वर्णन किया जाता है। उसकी उपासना अर्थात ईश्वर के समीप बैठने की अनुभूति की जाती है तब उससे तीव्र इच्छा के बड़ी उत्कटता से कुछ मांगा जाता है-जिसे प्रार्थना कहा जाता है। जैसा जिसका ज्ञान-स्तर होता है-वैसा ही उसकी स्तुतिप्रार्थनोपासना का स्तर होता है। कहने का अभिप्राय है कि यदि कोई व्यक्ति कम शिक्षित है तो उसके शब्दों में अधिक ज्ञान दिखाई नहीं देगा, जबकि एक उच्चशिक्षित व्यक्ति अपनी प्रार्थना आदि में उच्च सुसंस्कृत शब्दों का प्रयोग कर सकता है। पर ईश्वर किसी के शब्दों की छोटाई-बड़ाई को नहीं देखते। वह तो केवल श्रद्घाभावना को देखते हैं। यदि यज्ञ पर आपकी श्रद्घा नहीं है तो मानो कुछ भी नहीं है। इसलिए यज्ञ के साथ श्रद्घा का जुडऩा अति आवश्यक है। श्रद्घा का यह सोपान आचमन से रोपित होता है, अंग स्पर्श से जन्मता है और स्तुति प्रार्थनोपासना से विकसित होता है।
ईश्वर स्तुतिप्रार्थनोपासना के पश्चात अग्नि प्रणयन या अग्न्याधान किया जाता है। अग्नि के वैदिक विद्वानों ने 108 नाम रूपादि माने हैं। अग्नि तेजस्विता का प्रतीक है। अग्नि जैसा तेज जिसके भीतर आ जाए वह संसार के समस्त विषय-विकारों को बिना अधिक परिश्रम के ही जलाकर खाक कर देता है। संभवत: हमारे पौराणिक जगत में कई महात्मा अपने नाम से पूर्व श्री श्री 108 लगाते हैं। जिसका अभिप्राय है कि इनके पास अग्नि के 108 नामों व रूपों का समस्त विज्ञान है-जो इन्होंने हृदयस्थ कर लिया है। अब ये अग्निरूप हो गये हैं-इनके तेज के समक्ष अब कोई टिक नहीं सकता। यह अवस्था बड़ी ऊंची साधना से मिलती है पर जब मिल जाती है तो संसार के सारे विषय-विकारों से ऊपर उठ चुकी उस दिव्यात्मा का कोई सानी नहीं होता। उसकी झलक मात्र पाकर बहुतों का कल्याण हो जाता है। कहने का अभिप्राय है कि ऐसी दिव्यात्मा के दर्शन से बहुत से लोगों का हृदय परिवर्तन हो जाता है और वे अपने दुर्गुणों को छोडक़र दिव्यपथ के पथिक बन जाते हैं। 
पृथ्वी में विद्यमान अग्नि पवमान, अंतरिक्ष की अग्नि पावक, द्युलोक की अग्नि ‘शुचि’ कही जाती है। हमारे घरों में चूल्हे की अग्नि ‘आमादग्नि’ मांस या शव को जलाने वाली अग्नि क्रव्याद और देवताओं को प्रसन्न करन्ने वाली अग्नि ‘देवयाज’ कही जाती है। 
विद्वानों ने इस देवयाज अग्नि को जातवेद, द्रविणोद, इध्म, नराशंस, ईल, दैव्यहोतार, स्वाहाकृति, धृतप्रतीक, धूमकेतु, हव्यवाहन, स्वाहापति आदि नाम दिये हैं। इसी प्रकार की अग्नि से वर्षा हो जाती है, इन्हीं अग्नियों को आहवनीय अग्नि भी कहते हैं।
क्रमश:

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
otobet giriş
xslot giriş
otobet giriş
otobet giriş
otobet giriş
betyap giriş
betyap giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
maksibet giriş
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
betpark giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot
xslot
hititbet
kralbet
kralbet
betnano
betnano