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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

निजी अनुभवों की सांझ-8

ऐसा कब होता है?
जब कत्र्तव्य बोध से लेाग च्युत हो जाते हैं और जब राष्ट्रबोध से लोग विमुख हो जाते हैं, तब ‘कमीशन’ और ‘पैसा’ कर्तव्य बोध और राष्ट्रबोध को भी लील जाता है। आज हमें यही  ‘कमीशन’ और पैसा हमें लील रहा है। प्राकृतिक प्रकोप हमारी अपनी बदलती प्रकृति और प्रवृत्ति के परिणाम हैं। ज्ञानवान लोग इस तथ्य को समझ भी रहे हैं। इसीलिए तो कहा गया है-
‘यत्र अपूज्य पुज्यन्ते, तत्र दुर्भिक्ष, मरणम, भयम्’
अर्थात जहां अपूज्यों को पूजा जाता है, कुपात्रों का सम्मान होता है वहां दुर्भिक्ष, मृत्यु और भय का साम्राज्य होता है।
खेल और राजनीति
हर खिलाड़ी केपीछे भारत में एक दिग्गज राजनीतिज्ञ का हाथ है। खेलों में राजनीति ने हमारी प्रतिष्ठा को विदेशों में गिराने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए हमको बांग्लादेश जैसे छोटे देशों से भी हार का सामना करना पड़ जाता है। अनुभवी लोगों का कहना है कि विदेशी भ्रमण पर जाने वाली टीमों के चयन में हमारे देश में राजनीति जमकर की जाती है। जितने बड़े स्तर से किसी खिलाड़ी के चयन हेतु संस्तुति आती है उसे उतनी ही प्राथमिकता देते हुए टीम के लिए चयनित कर लिया जाता है।
मर्यादा का उल्लंघन
राजनीति जहां अपनी मर्यादा को लांघ जाएगी, अपनी सीमाओं को भूल जाएगी और अपनी गरिमा को भूल जाएगी वहां परिणाम राष्ट्र के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले ही सामने आएंगे, इसमें दो मत नहीं हैं।
भारतीय खिलाडिय़ों में यह भी देखा गया है कि कई बार  तो राजनीतिज्ञों के सगे-संबंधी ही खेल रहे होते हैं। दूसरे शब्दों में कहे तो राजनीति का खेल और खेल की राजनीति दोनों एक ही स्थान से संचालित करने का पूरा प्रबंध हमारे ये राजनीतिज्ञ खिलाड़ी करते रहते हैं। एक अरब से अधिक जनसंख्या वाले राष्ट्र के लिए यह स्थिति लज्जास्पद है। इतनी बड़ी जनसंख्या वाले राष्ट्र में प्रतिभाओं को कमी नहीं है, किंतु प्रतिभाओं को आगे आने और लाने की प्रक्रिया में कमी है। जो वास्तव में प्रतिभा कहीं और मानी जा सकती है, उन्हें नीचे और पीछे छोड़ दिया जाता है। आगे और ऊपर वे लोग आ जाते हैं-जो राष्ट्र के लिए कई बार लज्जा और अपमान का कारण बन जाते हैं। दुख की बात यह है कि इस सबके उपरांत भी इसी प्रकार की दोषपूर्ण चयन प्रक्रिया हमारे यहां निरंतर जारी है। क्योंकि घटनाओं से शिक्षा न लेने का हमने प्रण किया हुआ है। जो रास्ता चुन लिया गया है-हमें उसी पर बढ़ते चले जाना है।
हमें ऐसा प्रबंध करना चाहिए कि खेलों की सारी सुविधाएं और खिलाडिय़ों के पूर्ण प्रशिक्षण का प्रबंध तो सरकार करे, उन पर होने वाले सारे व्यय को वहन करे, किंतु क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड सहित सभी खेलों के बोर्डों के अध्यक्ष अराजनीतिक व्यक्ति हों। बहुत ही अच्छा हो कि हमारे नामी और प्रतिष्ठित पूर्व खिलाड़ी ही इन पदों पर विराजमान हों। विद्यालय स्तर पर ही यह प्रयास किया जाए कि खेलों  में निखरती प्रतिभा को राष्ट्रीय संपत्ति मानते हुए उसे वहां से ही सही दिशा, सही प्रशिक्षण और सही दर्शन दिया जाने लगे। यद्यपि अभी भी ऐसी प्रक्रिया कुछ सीमा तक कार्य कर रही है किंतु वह अत्यंत दोषपूर्ण है।
भ्रष्टाचार में भी उत्कृष्टता
हर विभाग में महीना वसूली की जो भ्रष्ट प्रक्रिया भारत में जन्मी और विकसित हुई है, इसने एकनई सोच को जन्म दिया है। ये सोच है कि जो प्रतिमाह इस महीना वसूली के द्वारा आ रहा है वह सब ईमानदारी का ही तो है, अर्थात भ्रष्ट होकर भी हम उत्कृष्ट हैं।
सेना में भ्रष्ट बने उत्कृष्ट
इसीलिए हमारे गौरव और आत्म सम्मान की प्रतीक भारतीय सशस्त्र सेनाओं में ऐसे तत्व भी पहुंच गये हैं। जिन्होंने परमवीर चक्र पाने के लिए पाकिस्तान से एक फर्जी ‘मिनी युद्घ’ का नाटक ही रच डाला।
हम समझते हैं कि इस प्रकार के नाटक के करने में उसका भी क्या दोष है? नीचे ऊपर तक बैठे नाटककारों को देखिये ये किस प्रकार के नाटक रच रहे हैं, और उत्कृष्टता के पुरस्कार लेने में सफल हो रहे हैं। भ्रष्ट होकर भी उत्कृष्ट होने का उनका नाटक सफल हो गया इसलिए वे ‘मैटल डिटैक्टर’ से निकल गये। जबकि सेना के परमवीर का नाटक सफल नहीं हो सका इसलिए उसे पकडक़र जेल भेजने का नाटक कर दिया गया है। 
ऐसी स्थिति और परिस्थितियों में सबको भूत सा सवार है कि हम उत्कृष्ट हैं और राष्ट्र सेवा करने में किसी से पीछे नहीं हैं। इस सोच का कारण है कि राष्ट्र के मूल्य और राष्ट्र सेवा के ढंग को समझाने की समुचित व्यवस्था हमने अपने यहां विकसित नहीं की। इस विषय पर में समय रहते सोचना होगा। इस स्थिति के परिणाम स्वरूप भ्रष्टाचार हमारे राष्ट्रीय चरित्र का एक आवश्यक अंग बन गया है। अब से 20 वर्ष पूर्व तक यह स्थिति थी कि सरकारी कार्यालयों में अधिकारी किसी अच्छे और सही काम को करने के सौदे में कुछ पैसा आदि लिया करते थे।
(लेखक की पुस्तक ‘वर्तमान भारत में भयानक राजनीतिक षडय़ंत्र : दोषी कौन?’ से)
पुस्तक प्राप्ति का स्थान-अमर स्वामी प्रकाशन 1058 विवेकानंद नगर गाजियाबाद मो. 9910336715

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