निरंकारी बाबा का सच* भाग 2 अंतिम

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डॉ डी के गर्ग

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आइये इस मिशन पर एक-एक नजर डालते है

बाबा की अकूत संपत्ति और पारिवारिक कलह

इन धर्मगुरुओ की मृत्यु के पूर्व ही इनके उत्तराधिकार की मारधाड़ सुरु हो जाती है। आशुतोष बाबा का शव चेलों की लड़ाई के कारण कई साल से बर्फ में दबाया हुआ है,जय गुरु देव मथुरा वाले का ड्राइवर गुरु हो गया,ऐसा ही निरंकारी गुरु के परिवार में हुआ। इनकी तीन बेटियां है।

कहते है कि निरंकारी बाबा हरदेव सिंह को उनकी बेटी के पति ने ही कनाडा में एक्सीडेंट से मरवा दिया था साथ में एक बेटी का पति भी मर गया।
क्योंकि उसके पास बाबा हरदेव के दो हजार करोड़ की एफडी थी

जब यह बात भारत मे पता चली इसमें केस भी दर्ज हुआ और
इसी सदमे के कारण हरदेव की पत्नी भी मर गई। जो कि बाबा हरदेव के बाद गद्दी पर बैठी थी इसके बाद जो बेटी विधवा हो गई उसको गद्दी सौंप दी गई।
इस बाबा के पास जो अकूत धन संपत्ति है वह इनकी जान की दुश्मन बन गईं।

मुख्य अभिवादन– “धन निरंकार जी संतों“ इनका नमस्ते की जगह आपसी अभिवादन है। जो हिन्दू धर्म में प्रचलित अभिवादन जैसे की नमस्ते , राम राम , राधे राधे आदि से अलग ही है।

बड़े और बुजुर्गों के पैर छूने की परंपरा का मजाक:
इनके यह दोनो पक्ष एक दूसरे के पैर छूते है,सिर्फ गुरु को छोड़कर।

अन्य विष्लेषण 1ः- निरंकारी मिशन के नाम से स्पष्ट है की इन्होने अपने विस्तार के लिए हिंदी/संस्कृत भाषा के अतिरिक्त अंग्रेजी को भी अपने पंथ के नामकरण का हिस्सा बनाया ताकि विदेश में भी अपना जाल फैलाया जा सके। इनके गुरु अधिकांश समय विदेशो में लगाते है। हिन्दू धर्म के विपरीत ये हिंदी /संस्कृत भाषा का प्रचार और प्रसार का संकल्प नहीं लेते है।
2- अपनी ही स्तुतिगाण में तुक-बन्दी के गीत :- इनके प्रवचन में इधर-उधर से ली गयी कहानिया, कबीर के दोहे, सामान्य व्यहार के रसीले, लच्छेदार भाषण ही मिलेंगे जिनका कोई गंभीर विषय नहीं है, इस प्रकार के उपदेश ही अब इनका एक मात्र व्यसाय है।
इन नकली निरंकारियों ने प्रारम्भ से ही भोले-भाले लोगो को फसाने के लिए अपने ही भाड़े के चेलो चपाटो व बिकाऊ कवियों से अपनी ही स्तुतिगान में तुक-बन्दी रचवायी। ऐसी ही एक तुक-बन्दी ‘अवतार बाणी‘ नाम से है, जिसमें भी इन्होनें अपने ही पुत्रों, पत्नी, बहुत था पिछलग्गुओं आदि को संत दर्शाकर अपनी (अवतार सिंह) की ही स्तुति करवाई हैं। जो धर्म के नाम पर एक अपराध और लूट के श्रेणी में लिया जाना चाहिए।
3- ये मिशन यानि सत्याग्रह निराकार ईश्वर की आराधना के मार्ग पर चलाने के लिए शुरू हुआ वहाँ पर ये बाबा स्वयं को ही ईश्वर के सामान निरंकारी बाबा बताने लगे और ये अवतार सिंह अपने आप को ‘शहिन शाह अवतार सिंह‘ कहलवाने लगा व भोली-भली जनता को ब्रह्मज्ञान के नाम पर सद्गुरु बनकर स्वयं को ईश्वर, अल्ला, गॉड आदि का प्रतिनिधि बताने लगा।
प्रमाण के तौर पर मई १९६४ अंक, पत्रिका ‘संतनिरंकारी‘‘ के पृष्ठ ९ पर अवतार सिंह एक बिकाऊ कवि रिंद से अपनी स्तुति में लिखवाता है कि…
‘‘अल्ला आपे मुड़ आया जे।
गाड वी नाल लिआइया जे।
इह रब्ब आपे है आया।‘‘
अपने आपको रब्ब लिखवाने वाला अवतार सिंह फरवरी १९६६ अंक, पत्रिका ‘संत निरंकारी‘ में एक और अन्ध और बिकाऊ कवि एस आनंद से स्वयं को दुनिया बनाने वाला लिखवाता है व
‘‘दुनियाँ वालिओ दसाँ मैं गल इको,
इहो बैठा दुनियाँ बणाउुण वाला।
सदा ऐस ने कायम ते दायम रहणा,
बाकी जग ऐ आऊण ते जाण वाला।।‘‘
4 दुसरे को शतायु होने और निरोगी होने का आशीर्वाद देने वाले ये गुरु बीमार होने पर देश विदेश में इलाज कराते है और जब चेले बीमार होते है तो उनको गुरु के पास जाकर आशीर्वाद से ठीक करने का ढोंग करते हैं।
स्वयं को रब, अल्ला, गॉड व दुनियाँ बनाने वाला कहलवाने वाला अवतारसिंह १७ सितम्बर, १९६९ को दिल्ली में कैंसर के रोग से मर गया। बहुत इलाज कराया कोई दवा, दुआ काम ना आयी ऐसा सुनने में आता हैं कि मृत्यु के समय उसकी लाश बहुत अधिक सड़ गयी थी जिसके कारण उसके ही पुत्र व सम्बन्धियो ने उसे ‘विद्युत दाहन यंत्र‘ पर रखकर जला दिया।

५ बड़ी चालाकी से निरंकार ईश्वर को अपने धर्म गुरु में फिट कर दिया, जबकि ईश्वर सर्वव्यापक है कण-कण मे रहता है परन्तु गुरबचन सिंह अपने चेलो चपटो से ढोलकियां बजा बजा कर गवाता था
‘‘इहदीयां तलीयां विच रब्ब वसदा‘‘
अर्थात्ः- गुरबचन सिहं या अन्य निरंकारी गुरू की हथेलियो के मध्य ईश्वर रहता हैं।
पिता का भांति ही पुत्र ने भी अगस्त १९७० अंक, पत्रिका ‘संत निरंकारी‘ में अपने के चेले बिकर सिंह लुधियाना से कहलवाया कि…
‘‘निरंकारी बाबा की हथेलियां हिलीं तो ईश्वर प्रत्यक्ष नजर आया, आवागमन से मुक्ति मिल गयी।‘‘
अब कोई इन नकली गुरू-चेलो से पूछे कि जो परमेश्वर निराकार है रूप, रंग, गंध, देश व काल आदि सीमाओं से परे है वो कैसे इन पाखण्डियो के हथेली में आ गया और कैसे इन्होने उस निराकार के दर्शन कर लिये।
6ः- गुरू ग्रन्थ साहिब का दुरूपयोगः- ये निरंकारी अपने आडम्बर और पाखण्ड के लिए गुरूग्रन्थ साहिब का दुरूऊपयोग करते है साथ ही सिख गुरूओं, गुरूद्वारो और ग्रन्थ साहिब को गाली भी देते हैं। ऐसा ही सन् १९७८ की बैसाखी वाले दिन अमृतसर में इन्होने अपने एक कुसतसंग में भी किया जिसका विरोध जब सिखोंने किया तो गुरबचन सिंह ने उन पर गोली चलवा दी जिसके फलस्वरूप १३ सिख शहीद हुए और ७८ घायल।
7- निरंकारियो का सिख धर्म से कुछ भी लेना-देना नहीं है, रहा सवाल नामधारी सिखों का जिनके गुरुबाबा राम सिंह का आजादी की लड़ाई में बहुत योगदान है और जिन्होंने महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन के पहले विदेशी का बहिष्कार किया था, परिणाम स्वरूप सैकड़ों नामधारीयो को मौत की सजा तथा अन्य सजायोँ को भुगतना पड़ा था। नामधारी सिर्फ एक बात को छोड़कर कि वे अपने गुरू से नाम (बीज मंत्र) लेते हैं, इस एक भिन्नता को छोड़कर पूरी तरह से सिख सिध्दांतों का पालन करते हैं। और बाबा राम सिंह पर भी आस्था रखते हैं।
8- जब ये मिशन सिर्फ गुरु के प्रवचनों को को सब कुछ मानता है।
9.निरंकार माने क्या? इनको स्वयं नहीं पता की निरंकार किसको कहा गया है।
सच्चाई यह है कि ये सभी भगवान् के नाम पर घोर नास्तिक है, झूठे हैं और समाज में पारिवारिक मायाजाल में जकड़े रहने पर भी सभी ही अपने को निरंकार कहते हैं जो झूठ ही तो है। जन मानस को खुदा-गॉड भगवान् के नाम पर नास्तिकता में भरमा-भटका कर नास्तिकता में ढकेलते हुए धर्म पिपासुओं– भगवद् जिज्ञासुओं-सत्यान्वेषियों को निराकर-निरंकार रूप नास्तिकता में भरमा-भटका कर भटका-लटका दिया जा रहा है।

अंत में कुछ सवालः निरंकारियों से :
१) क्या ये मिशन वेद, उपनिषद, दर्शनशास्त्र, मनुस्मृति को मानता है? यदि है तो इस विषय पर इसके गुरु क्यों नहीं बोलते? यदि नहीं, तो वेद, उपनिषद, दर्शनशाश्त्र में क्या गलत है?
2) इनके किसी भी गुरु में वेद, उपनिषद, दर्शनशास्त्र, मनुस्मृति नहीं पड़े, तो इनको बिना पढ़े इन्हे ज्ञान कहा से प्राप्त हुआ? इस मिशन का मुख्य धर्म ग्रन्थ कौन सा है, जिस पर विश्वास किया जाये?
3) गुरु शब्द का अर्थ क्या है? गुरु का पुत्र, माँ, बहु, बेटा, बेटी होना पर्याप्त है?गुरु की योग्यता क्या होनी चाहिए ?
४) धर्म क्या है ?अधर्म क्या है ? कर्मफल क्या है ? ईश्वर किसको कहते है ? ईश्वर के क्या कार्य है ? ईश्वर स्तुति कैसे करनी चाहिए ?
5.ये बीज मंत्र क्या है और इसका भावार्थ तथा किस ग्रंथ से किया गया?
अन्त में मित्रों देव दयानन्द की एक बात स्मरण आ रही है कि ‘‘गुरू वो है जो अपने सत्योपदेश से हृदय का अज्ञान रूप अन्धकार मिटा देवे‘‘ अतः सच्चे गुरू का संग (साथ) करो परन्तु अन्तिम लक्ष्य ईश्वर ही होन कि गुरू और गुरु घंटाल। अब ये मिशन पूरी तरह से गुरु बिजनेस वाले मॉडल पर चल रहा है। ये अपने शिष्यों को धर्म, कर्म से दूर करते जा रहे है, जिनसे सावधान होना जरुरी है।
गुरुओं का गुरु परम पिता परमेश्वर है, इस उक्ति का अर्थ है कि गुरु ईश्वर की वेद परंपरा या ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का एक माध्यम है। वह गुरु गुरु नहीं होता जो स्वयं भी अंधकार में भटकता हो या लोगों को भटकाने का काम करे। जब वेद की परंपरा श्रुति के माध्यम से आगे बढ़ रही थी तब भी गुरु की आवश्यकता थी। आज जब वेद की परंपरा बहुत पीछे छूट गई है,बिना विद्वान गुरु के वेद परंपरा आगे नहीं बढ़ सकती।

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