गुरु बिन मुक्ति नाही* भाग -४

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गुरु बिन मुक्ति नाही
डॉ डी के गर्ग

गुरु , उपदेशक,आचार्य,शिक्षक का भेद समझें

ये समझना बहुत जरूरी है इसी अज्ञानता के कारण धर्म प्रचारक पहले गुरु की उपाधि से सुशोभित होते है और फिर धीरे धीरे स्वयं को ईश्वर का दूत बताकर पूजने लगते है।

ये स्पष्ट हो चुका है कि गुरुओं का गुरु परम पिता परमेश्वर है, इस उक्ति का अर्थ है कि गुरु ईश्वर की वेद परंपरा या ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का एक माध्यम है।वह गुरु गुरु नहीं होता जो स्वयं अंधकार में भटकता हो या लोगों को भटकाने का काम करे। अंधकार को मिटाने वाला ही गुरु होता है। लेकिन वैदिक विद्वान गुरु का अस्तित्व सदा रहा है और सदा रहेगा। बिना गुरु के वेद परंपरा आगे नहीं बढ़ सकती।
जब वेद की परंपरा श्रुति के माध्यम से आगे बढ़ रही थी तब भी गुरु की आवश्यकता थी। परन्तु आज जब वेद की परंपरा बहुत पीछे छूट गई है।

शिक्षकः– क्या शिक्षक को गुरु कहना साहित्यिक या व्यावहारिक रूप से सही है ?
हां , कह सकते है लेकिन आदि गुरु ईश्वर के सामान स्वीकार कर ईश्वर से तुलना करना गलत है। आधुनिक दृष्टि से गुरू उसे कहते है जो किसी कला में निपुण है और शिक्षा देता हो जैसे शिक्षा गुरु, व्यायाम, संगीत गुरु, नृत्य गुरु आदि। कुछ इस तरह के गुरु को साधारणतय मास्टर के नाम से भी जाना जाता है जैसे टेलर मास्टर, नाई, हलवाई आदि। आज के युग में जो चोरी, डकैती में निपुण है उनके शिष्य और उन्हें भी उनके साथी अक्सर गुरु कहते हैं।
लेकिन मूल अर्थ शिक्षक का है जो वेतन या बिना वेतन शिक्षण कार्य करता है।
आचार्य
आचार्य का पद कोई साधारण नही है, सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानंद ने ईश्वर के गुणों के आधार पर जो विभिन्न नामों की व्याख्या की है उनमें ईश्वर का एक नाम आचार्य भी है।
चर गतिभक्षणयोः
आङ्पूर्वक इस धातु से ‘आचार्य्य’शब्द सिद्ध होता है।
य आचारं ग्राहयति, सर्वा वि। बोधयति स आचार्य ईश्वरः’
जो सत्य आचार का ग्रहण करानेहारा और सब विद्यायो की प्राप्ति का हेतु होके सब विद्या प्राप्त कराता है, इससे परमेश्वर का नाम ‘आचार्य’ है।
आचार्य शब्द की व्युत्पत्ति है
‘‘आचारं ग्राहयति इति आचार्य ‘‘
जो आचार, नियमों और सिद्धातों आदि का अच्छा ज्ञाता हो और दूसरों को उसकी निशुल्क शिक्षा देता हो। जिसका आचरण अनुकरणीय और सर्वोत्तम हो, तथा किसी विशेष विषय का ज्ञाता हो।
महर्षि दयानंद कृत संस्कार विधि के 11वें अध्याय में कहा है कि आचार्य के अधीन धर्म आचरण में रहा कर ।परंतु यदि आचार्य अधर्म आचरण वा अधर्म करने का उपदेश करें उसको तू कभी मत मान और उसका आचरण मत कर।अर्थात व्यवस्था दी कि आचार्य भी धार्मिक हो। इससे सिद्ध हुआ कि आचार्य अथवा गुरु आवश्यक है।
जो इस प्रकार की शिक्षा शशुल्क देता है उसको उपाध्याय कहते है।
प्राचीन-काल से ही आचार्य एक शिक्षा सम्बन्धी पद रहा है। उपनयन संस्कार के समय बालक का अभिभावक उसको आचार्य के पास ले जाता था।
शिक्षक वो जो स्कूल कालेज में अध्यापन करते हैं, आचार्य जो धर्म आदि की शिक्षा गुरुकुल मे देते हैं,धर्मगुरु जो धर्म की शिक्षा देते हैं,उपदेशक उसको कहते है जो उपदेश देते हैं.

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