वैज्ञानिकों के चमत्कार को नमस्कार

खुले आकाश के नीचे मां की गोद में लेटे-लेटे जब कभी चंदा मामा दूर के, सुना करते थे तो लगा करता था कि यह चंदा मामा निकट के क्यों नहीं हो जाते? मामा का घर और वह भी इतनी दूर यह तो कोई बात नहीं हुई। समय ने करवट ली और जब थोड़े से बड़े हुए तो पता चला कि ‘चंदा मामा’ के घर की सही जानकारी लेने में मानव सफल हो गया। आज जब जीवन के इस मोड़ पर खड़े हैं तो चंदा मामा की जानकारी आधुनिक नारदजी (अंतरिक्ष में तैर रहे रॉकेट)  हमें क्षण-क्षण दे रहे हैं। सचमुच मानव के भौतिक विज्ञान ने बड़ी उल्लेखनीय उन्नति की है।
भारत का अंतरिक्ष विज्ञान संबंधी ज्ञान उतना ही पुरातन है जितनी पुरातन यह सृष्टि है। कहने का अभिप्राय है कि जब सृष्टि की उत्पत्ति हुई थी, तो उसी समय वेदों की उत्पत्ति हुई जिनमें सृष्टि संबंधी और अंतरिक्षादि संबंधी समस्त ज्ञान विज्ञान अंतर्निहित था। इसी बात को महर्षि दयानंद जी महाराज ने आर्य समाज के नियमों में यह कहकर स्थान दिया है कि ”सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदि मूल परमेश्वर है।…वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है, वेद का पढऩा-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परमधर्म है।”
13 जनवरी 1998 को एक दैनिक पत्र में एक समाचार प्रकाशित हुआ था-”अमेरिकी अंतरिक्षस्थ संगठन द्वारा पिछले सप्ताह एक चंद्रशोधकर्ता उपग्रह अंतरिक्ष में स्थापित किया गया है, जो चंद्रमा के धु्रवीय स्थानों में स्थित बर्फीले पानी और गैसों की खोज करेगा। हमें इस बात पर गर्व है कि हमारे शास्त्रदृष्टा साक्षात्धर्माऋषियों ने इस तथ्य की खोज युगों पूर्व कर ली थी। ‘जैमिनीयोपनिषद’ के ऋषि ने कहा है कि चंद्रमा पर कृष्ण रूप भाग जल है।
अब आज जब हम अपने आधुनिक विश्व के वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष की खोज करते हुए देखते हैं, हम यह भी देखते हैं कि आज के वैज्ञानिक कैसे नये-नये अंतरिक्षीय रहस्यों से पर्दा उठाते जा रहे हैं, तो हमें उन पर आश्चर्य होता है। वास्तव में यह आश्चर्य करने की बात नहीं होनी चाहिए, अपितु हमें अपने आप पर गर्व होना चाहिए कि आज का विज्ञान जितना ही अंतरिक्षीय रहस्यों को उद्घाटित करता जा रहा है-वह उतना ही अधिक हमारे साक्षात्धर्मा ऋषियों के उत्कृष्टतम चिंतन को नमन करता जा रहा है। या कहिये कि वह उतना ही अधिक हमारे साक्षात्धर्मा ऋषियों के चिंतन की पुष्टि करता जा रहा है। हमारे ऋषियों का चिंतन अभी भी आज के वैज्ञानिकों की पहुंच से बाहर है। अभी तो हमारे ऋषियों का नक्षत्र विज्ञान और उसका रहस्य जानना भी इन लोगों के लिए एक अबूझ पहेली है। इसके अतिरिक्त अध्यात्म विज्ञान और ब्रह्मविज्ञान की ओर तो अभी तक यह संसार और इसका उन्नत विज्ञान देखने का भी साहस नहीं कर पाया है। अनंत का ज्ञान भी अनंत ही होता है….’हरि अनंत हरिकथा अनंता।’
भारत के वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में इंदिरा गांधी के शासनकाल से इस ओर विशेष कार्य किया जाना आरंभ किया गया। तब से लेकर अब तक हमने अंतरिक्ष के सीने पर खेल-खेलकर कई रोमांचकारी कहानियों का निर्माण किया है। अब श्री हरिकोटा से ‘इसरो’ ने देश के सर्वाधिक शक्तिशाली और अब तक के सबसे भारी उपग्रह प्रक्षेपण रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 को प्रक्षेपित किया है। इस प्रक्षेपण से 4 टन श्रेणी के उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की दिशा में भारत के लिए नये अवसर खुल गये हैं। भारत द्वारा प्रक्षेपित रॉकेट सबसे अधिक भारी है। जिसे देश से छोड़ा गया है। अभी तक 2300 किलोग्राम से अधिक वजन के संसार उपग्रहों के लिए इसरो को विदेशी प्रक्षेपकों पर निर्भर रहना पड़ता था। जीएसएलवी एम के 3 डी 4000 किलो तक के पेलोड को उठाकर जीटीओ और 10000 किलो तक के पेलोड को पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचाने में सक्षम है। इससे डिजिटल इंडिया को मजबूती  मिलेगी। ऐसी इंटरनेट सेवाएं मिलेंगी जैसी कि पहले कभी नहीं मिलीं। इस प्रकार यह प्रक्षेपण पूर्णत: क्रांतिकारी है। अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित या भारतीय उपग्रहों में से 13 संचार उपग्रह हैं।
जीएसएलवी एमके 3 देश का पहला ऐसा उपग्रह है जो अंतरिक्ष आधारित प्लेटफॉर्म का प्रयोग कर तेज गति वाली इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराने में सहायक होगा। इससे देश को इंटरनेट सेवाएं बढ़ाने में सफलता मिलेगी। आज जब विश्व के कुछ विकसित देश नई तकनीकी के आधार पर दिन दूनी और रात चौगुनी उन्नति करते जा रहे हैं और अपने नागरिकों को हर प्रकार  की सेवा सुविधा उपलब्ध कराने की ओर ध्यान दे रहे हैं, तब भारत को भी इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता थी। सचमुच हमारे वैज्ञानिकों को इस बात के लिए इस कृतज्ञ राष्ट्र का विनम्र अभिवादन और अभिनंदन प्राप्त करने का अधिकार है जो दिन रात  लगे रहकर देश को आधुनिकतम और नवीनतम तकनीकी उपलब्ध कराके विकास और उन्नति के पथ पर अग्रसर करने के लिए कृतसंकल्प है।
वह अखण्ड संकल्प को लेकर चल रहे हैं और विकल्प रहित संकल्प के पुजारी हैं। उनकी यह पूंजी और बौद्घिक क्षमताएं ही इस देश की बौद्घिक संपदा है। जिस पर देश के हर व्यक्ति को गर्व है। सचमुच हमारे एक हाथ में शस्त्र और एक हाथ में शास्त्र लेकर चलने का समय आ गया है। शास्त्र का अभिप्राय जीवन जीने के सभी साधनों से है और जीवन की परिभाषा को सुरक्षा प्रदान करने के उन सभी उपायों से है जो हमारे जीवन को सहज और सरल बना सकने की क्षमता रखते हों। जबकि शास्त्र का अभिप्राय हमारे मानसिक और बौद्घिक ज्ञान की उन सभी असीम संभावनाओं को अपनी मुट्ठी में ले लेने से है जिससे हम बौद्घिक ऐश्वर्यों के स्वामी हो सकें। साथ ही ऐसी बौद्घिक क्षमताएं हमारी हों कि हम विनम्र और अहंकार शून्य हों। अच्छा हो कि हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिक ज्ञान विज्ञान की इस स्वाभाविक उत्पत्ति और परिणति की ओर हमें लेकर चलें। उनके चमत्कार को नमस्कार।

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