भारत के नये राष्ट्रपति का चुनाव इन दिनों चर्चा में है। नये-नये नाम इस पद के लिए प्रत्याशी के लिए वैसे ही आ-जा रहे हैं, जैसे ऊपर से गिरते पानी में बुलबुले आते हैंं और समाप्त हो जाते हैं। बहुतों के मन में लड्डू फूट रहे हैं कि इस बार हो सकता है वही देश का प्रथम नागरिक बन जाए। समय थोड़ा रह गया है और कभी भी किसी व्यक्ति के नाम की घोषणा अब सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से हो सकती है कि उसका प्रत्याशी अमुक व्यक्ति हो सकता है। देखने वाली बात होगी कि कांग्रेस और देश का शेष विपक्ष उस नाम को अपनी सहमति देता है या नहीं? यदि नही तो विपक्ष की ओर से भी कोई नाम प्रस्तावित हो सकता है-तब चुनावी टक्कर निश्चित हो जाएगी।
स्वतंत्र भारत के इतिहास के दो राष्ट्रपति ऐसे रहे हैं-जिनकी पृष्ठभूमि अराजनीतिक रहे हैं और ये दोनों ही देश के सफल राष्ट्रपति सिद्घ हुए हैं। इनमें पहला नाम डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का है, तो दूसरा नाम डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का है। ये दोनों राष्ट्रपति लोकप्रिय रहे हैं, और आज भी इनको देश का जनमानस भली प्रकार जानता है और इनका सम्मान भी करता है। जद (यू) के शरद यादव का कहना है कि देश का राष्ट्रपति वह व्यक्ति होना चाहिए जो संविधान का ज्ञाता है। उनका तर्क अपनी जगह ठीक हो सकता है और यह भी हो सकता है कि वे ऐसा कहकर किसी प्रखर राजनीतिज्ञ को ही इस पद के लिए अवसर देना चाह रहे हों, पर यदि उन्हें यह पूछा जाए कि किसी राजनीतिज्ञ से वे यह अपेक्षा कैसे करते हैं कि वह संविधान को जानता होगा? और यह भी कि क्या डा. राधाकृष्णन और डा. कलाम अराजनीतिक व्यक्ति होकर संविधान के ज्ञाता नहीं थे? उत्कृष्ट बौद्घिक क्षमताओं से संपन्न व्यक्ति को किसी नयी बात या नये विषय या नई स्थिति परिस्थिति को समझने में देर नही लगती और यही बात डा. राधाकृष्णन और डा. कलाम ने करके दिखायी थी। इसलिए इस पद पर एक गंभीर अराजनीतिक दूरदर्शी विद्वान व्यक्ति का पहला दावा बनता है जो अपनी गंभीरता और दूरदृष्टि से भरी हुई विद्वत्ता का प्रदर्शन करते हुए देश को उचित मार्गदर्शन दे सकता है। वैसे भी भारत ज्ञान की पूजा करने वाला देश रहा है-ऐसे में उसके ‘ब्रह्मा’ (राष्ट्रपति) का भारतीय संस्कृति और भारतीय वैदिक ज्ञान-विज्ञान से ओतप्रोत होना आवश्यक है। भारत के राष्ट्रपति की योग्यताओं में यह पहली योग्यता होनी चाहिए।
ऐसी ही अदभुत प्रतिभा और बौद्घिक क्षमताओं से संपन्न एक नाम है हैदराबाद के वैज्ञानिक श्री सीएसआर प्रभु का। श्री प्रभु बचपन से ही संघर्षों से जूझते रहे हैं, उनका बचपन पिता के प्यार से वंचित रहा है, और बड़े संघर्षों वे वह आगे बढ़े हैं। श्री प्रभु इन्फॉर्मेटिक विभाग (भारत सरकार) के पूर्व नियामक हैं। वह उच्चकोटि के वैज्ञानिक हैं। साथ ही साथ श्री प्रभु भारतीय शास्त्रों के परमज्ञाता हैं, और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और तकनीकी अभ्यास के भी ज्ञाता हैं। उन्हें शासकीय अनुभव है। श्री प्रभु ने महर्षि भारद्वाज रचित ‘ब्रहद विमान भाष्य’ पर विशेष कार्य किया है, जिससे विश्व ने हमारे इस ऋषि की बौद्घिक क्षमताओं का और उसकी प्रतिभा का लोहा माना है। विश्व को पता चला है कि आधुनिक विमान विद्या पर सबसे पहला बौद्घिक अधिकार भारत का है। उसी के ऋषि भारद्वाज का ज्ञान-विज्ञान आज के संसार के काम आ रहा है। इस कार्य को करके श्री प्रभु ने देश की बहुत बड़ी सेवा की है। वह लंबे काल से देश विदेश में भारत की योग परंपरा को लोगों के सामने लाने का कार्य भी करते रहे हैं और योगासन व प्राकृतिक चिकित्सा को अपनाकर लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति भी सजग और सावधान करते रहे हैं।
श्री सीएसआर प्रभु को भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी का भरपूर ज्ञान है और वह धारा प्रवाह हिंदी में अच्छा भाषण दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त वह तेलगू, कन्नड़, तमिल, अंग्रेजी, संस्कृत के भी विशेष ज्ञाता हैं। इतना ही नहीं उडिय़ा और बंगाली सहित अन्य भाषाओं पर भी उनका अच्छा अधिकार है। वह तीन माह में कोई भी भाषा सीखने की क्षमता रखते हैं।
श्री प्रभु को भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का विशद और गहरा ज्ञान है। फलस्वरूप वह भारतीय राष्ट्रनीति (राजनीति नहीं) की वास्तविकता से परिचित हैं और जानते हैं कि राजा का ‘राष्ट्रधर्म’ क्या होता है? वह लोकोपकार की भावना से ओतप्रोत हैं। भारत के ‘राजधर्म’ की आज न केवल भारत को अपितु समस्त संसार को भी आवश्यकता है। इसके लिए आवश्यकता है कि भारत का राष्ट्रपति भारत की ज्ञान परंपरा में पारंगत होना चाहिए। जिससे कि शेष विश्व के लिए वह भारत का ‘प्रतिनिधि पुरूष’ बन सके। आज आतंकवाद की भट्टी में जूझते विश्व समुदाय के लिए यह आवश्यक है कि उसे भारत का ‘राजधर्म’ समझाया जाए और मानवतावाद की भारतीय परंपरा को विश्व राजनीति का संस्कार बना दिया जाए। हमारा मानना है कि यह तभी हो सकता है जबकि भारत का प्रथम नागरिक भारत की ज्ञान परंपरा से ओतप्रोत हो, श्री प्रभु एक संत जैसा जीवन जी रहे हैं और उन्हें ‘लौकेष्णा’ की कोई चाह नहीं है। उनकी चाह राष्ट्रकल्याण है, जनकल्याण है और विश्वकल्याण है। उनके चिंतन की उच्चता और पवित्रता उन्हें वैश्विक मानस का धनी पुरूष बनाती है और उनके विषय में हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि भारत के राष्ट्रपति पद के लिए डा. राधाकृष्णन और डा. कलाम की भांति वह भी एक योग्य प्रत्याशी हो सकते हैं।
भारत की सरकार को और सभी राजनीतिक दलों को सारे राजनीतिक पूर्वाग्रहों को त्यागकर श्री प्रभु जैसे व्यक्तित्व को आगे आने का अवसर प्रदान करना चाहिए। यदि भारत की राजनीति डा. कलाम की विद्वत्ता और शालीनता को नमन कर सकती है तो कोई कारण नही कि डा. सीएसआर प्रभु की विद्वत्ता और वैज्ञानिक बुद्घि को वह प्रणाम नही कर सकती। ‘प्रभु’ को ‘प्रणाम’ करना तो वैसे भी हमारी परंपरा है अच्छा हो कि हम अपने बीच के ‘प्रभु’ को पहचानें और उन्हें ‘प्रभु’ से ‘विभु’ बनने का अवसर प्रदान करें।

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