संत की मेरी अनुभूति/मेरा संन्याषी धर्म* *स्मृति से मिट जाते हैं नाते-रिश्तेदार, दोस्त व इतिहास*

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आचार्य श्री विष्णुगुप्त

जब आप जीवन से सन्यांस लेते हैं, सन्याषी बनते हैं और सन्यांषी धर्म का पालन सत्यनिष्ठा के साथ करने लगते हैं तो फिर धीरे-धीरे आपके अंदर एक सन्याषी के गुण और विचार विकसित होने लगते हैं। किसी भी कसौटी को आप सत्यनिष्ठा के साथ जोड़कर देखने लगते हैं, अपने कर्म से मानव कल्याण की सद्इच्छाओं से जोड लेते हैं। धीरे आपके अंदर में अंहकार का भाव विलोप होने लगता है, लालच का भाव विलुप्त होने लगता है, इच्छाएं मृत्यु की ओर अग्रसरित होती हैं, अइच्छाएं विकसित होने लगती हैं, मृत्यु से भय समाप्त हो जाता है।
जब मैंने जीवन से सन्यास लिया था तब यह उम्मीद नहीं थी कि एक सन्याषी की सद्वृतियां इतनी जल्दी विकसित हो जायेंगी। जैसे-जैसे हमने सन्याषी धर्म का पालन करना शुरू किया वैसे-वैसे मेरे मन से विकार और अन्य गैर जरूरी विचार मिटते चले गये। मेरे अंदर अहंकार का नामोनिशान मिट गया। इच्छाएं मर गयी। लालच का भाव आता नहीं। किसी चीज के प्रति अनिच्छाएं विकसित हो गयीं। लगने लगा कि जब सबकुछ नश्वर है तो फिर इसे पाने के लिए प्रतियोगिता और स्पर्द्धा में शामिल होने की क्या आवश्यकता है?
सन्याषी का कोई परिवार नहीं होता है, कोई दोस्त नही होता है। सन्याषी का अपना पिछला इतिहास भी कोई अर्थ नहीं रखता है और न ही सन्याषी अपना पिछला इतिहास याद कर रखता है। कहने का अर्थ यह है कि पिछली स्मृतियां मन से मिट जाती हैं, मिटने लगती हैं। ऐसी स्थितियां जब उत्पन्न होने लगती हैं तब सन्यास धर्म की सफलता सुनिश्चित होने लगती है।
मैं खुद इसका अनुभव कर रहा हूं। मैं अपने नाते-रिश्तेदारों का नाम और उनका इतिहास भूल रहा हूं। अपने दोस्तों का नाम भूल रहा हूं और उनके पिछले कर्म को भी भूल रहा हूं। अपने लहू के रिश्तेदार भी स्मृति से अलग हो रहें हैं। ऐसी परिस्थितियां मेरे लिए तो असहज नहीं हैं पर नाते-रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए कष्टकारी और अपमानजनक लगती है। नाते-रिश्तेदारी और दोस्त लोग मेरे लिए ऐसी स्थिति में अहंकारी होने और आंख मोटाने जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं। मैं ऐसी स्थिति से भी चिंतित नहीं होता, विचलित नहीं होता। आखिर क्यों? इसलिए कि मैं जब सन्याषी बन गया हूं, जीवन से सन्यास ले लिया हूं तो फिर मेरे लिए ये सब तो नश्वर के समान हैं, बेअर्थ हैं। इनकी चिंता क्यों? गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को तो यही संदेश दिया था। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि हे अर्जुन जिसे तुम अपने कह रहे हों, जिसे तुम अपने लहू के हिस्से मान रहे हों, ये सब मोह, माया है, नश्वर है, धनुष उठाओं और अपना कर्म करो।
मैं खूद का अपना पिछडा इतिहास और कर्म को लगभग भूल चुका हूं। मैंने कहां पढ़ाई की थी, मेरे पास कौन-कौन सी डिग्रियां हैं, मैनें राजनीतिक, सामाजिक संघर्ष कितना किया था, मैने कहां-कहां नौकरियां की थी, मैंने कितनी पुस्तकें लिखी हैं, मेरी कितनी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, मैने अखबारों में कितने लेख लिखें हैं, यह सब भी अब मेरी स्मृति से दूर है। मैंने कुछ उपन्यास लिखें थे जो कुछ पूर्ण और कुछ अधूरे थे, वह भी अब याद नहीं है, पांडूलिपि भी नहीं बची है। पांडूलिपि कहां खो गयी, कैसे खोयी यह भी याद नहीं है। मुझे जो पुराने नाम से बुलाते हैं उनकी ध्वनियां अब कानों में बहुत ही कम जाती है, फिल्टर होकर जाती है। इसलिए मुझे कोई पुराने नाम से पुकारता है तो मुझे उसका अहसास बहुत कम ही होता है, आगे बढते जाने की ही इच्छाएं प्रबल होती हैं।
मैं गेरूआ वस्त्र तो नहीं पहनता पर सन्याषी धर्म का पालन करने की पूरी कोशिश जरूर करता हूं। मैं उन सन्याषियों से थोड़ा दूर हैं जो धन कमाने के लिए सन्याषी का ढोंग करते हैं। मैं भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के कर्म का सहचर हूं। राष्ट्र की सुरक्षा और समृद्धि ही मेरे लिए आवश्यक है। मैं भगवान श्रीराम के धनुष और भगवान श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र का वाहक हूं। राष्ट्र और सनातन की सुरक्षा भगवान श्रीराम के धनुष और श्रीकृष्ण के सुदर्शन चक्र के बिना हो ही नहीं सकती है।
संदेश क्या है? संदेश स्पष्ट है। एक संन्याषी से कोई भी इच्छाएं नहीं रखनी चाहिए, सन्याषी को सिर्फ वर्तमान में ही देखना चाहिए। सन्याषी से अपने भविष्य की इच्छाएं पूर्ति करने के विचार तो किसी भी परिस्थिति में संग्रहित नहीं करने चाहिए।

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आचार्य श्री विष्णुगुप्त
नई दिल्ली

Mobile… 9315206123

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