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भारतीय संस्कृति

अंग्रेजी नववर्ष की तरह नवसंवत्सर को भी देशभर में उत्साहपूर्वक मनाया जाना चाहिए

प्रह्लाद सबनानी

भारत में सनातन हिंदू परम्परा में नव वर्ष का एतिहासिक महत्व है। भारतीय इतिहास में दरअसल नव वर्ष मनाने के कई महत्वपूर्ण शुभ कारण मिलते हैं। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इसी दिन के सूर्योदय से श्रद्धेय ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।

भारतीय सनातन हिंदू संस्कृति के अनुसार फागुन और चैत्र माह वसंत ऋतु में उत्सव के महीने माने जाते हैं। चैत्र माह के मध्य में प्रकृति अपने श्रृंगार एवं सृजन की प्रक्रिया में लीन रहती है और पेड़ों पर नए नए पत्ते आने के साथ ही सफेद, लाल, गुलाबी, पीले, नारंगी, नीले रंग के फूल भी खिलने लगते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे पूरी की पूरी सृष्टि ही नई हो गई है, ठीक इसी वक्त भारत में हमारी भौतिक दुनिया में भी एक नए वर्ष का आगमन होता है।

पश्चिमी देशों में तो सामान्यतः अंग्रेजी तिथि के अनुसार नव वर्ष प्रत्येक वर्ष की 1 जनवरी को बहुत ही बड़े स्तर पर उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। वैसे तो पूरे विश्व में ही नव वर्ष भरपूर उत्साह के साथ मनाया जाता है। परंतु कई देशों में नव वर्ष की तिथि भिन्न भिन्न रहती है तथा नव वर्ष को मनाने की विभिन्न देशों की अपनी अलग अलग परम्पराएं भी हैं। नव वर्ष प्रत्येक देश में एक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।

भारत में सनातन हिंदू धर्म के अनुसार नव वर्ष को नवसंवत्सर कहा जाता है एवं यह देश के विभिन्न भागों में अलग अलग नामों से पुकारा जाता है। भारत में हिंदू धर्मावलम्बियों के लिए नव वर्ष का प्रथम दिन बहुत शुभ माना जाता है एवं प्राचीन भारत में इसे बहुत बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। उत्तर भारत में हिंदू नव वर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस वर्ष 22 मार्च 2023 को वर्ष प्रतिपदा तिथि पड़ रही है। महाराष्ट्र में नव वर्ष को गुड़ी पड़वा के नाम से जाना जाता है। सिंधी समुदाय नव वर्ष को चेटी चांद के नाम से मनाते हैं। पंजाब में नव वर्ष को बैसाखी के नाम से मनाया जाता है। जबकि सिख नानकशाही कैलेंडर के अनुसार 14 मार्च होला मोहल्ला को नया साल माना जाता है। गोवा में हिंदू समुदाय नव वर्ष को कोंकणी के नाम से मनाते हैं। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना राज्य में नव वर्ष को युगदि या उगादी के नाम से मनाते हैं। कश्मीर में कश्मीरी पंडित नव वर्ष को नवरेह या नौरोज या नवयूरोज अर्थात् नया शुभ प्रभात के नाम से मनाते हैं। बंगाल में नव वर्ष को नबा बरसा के नाम से, असम में बिहू के नाम से, केरल में विशु के नाम से, तमिलनाडु में पुतुहांडु के नाम से नव वर्ष मनाया जाता है। मारवाड़ी में नव वर्ष दिवाली के दिन मनाते हैं। गुजरात में दिवाली के दूसरे दिन नव वर्ष होता है। बंगाली नया साल पोहेला बैसाखी 14 या 15 अप्रैल को मनाते हैं। भारत में चूंकि कई समुदाय निवास करते हैं अतः नव वर्ष के नाम भी अलग अलग पाए जाते हैं एवं नव वर्ष को मनाने की परम्परा भी भिन्न भिन्न है।

भारत में सनातन हिंदू परम्परा में नव वर्ष का एतिहासिक महत्व है। भारतीय इतिहास में दरअसल नव वर्ष मनाने के कई महत्वपूर्ण शुभ कारण मिलते हैं। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इसी दिन के सूर्योदय से श्रद्धेय ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी शुभ दिन को प्रभु श्री राम का राज्याभिषेक हुआ था। युधिष्ठिर का राज्यभिषेक भी इसी शुभ दिन हुआ था। सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन शकों को पराजित कर एक नए युग का सूत्रपात किया था एवं 2080 वर्ष पूर्व अपना राज्य स्थापित किया था एवं आपके के नाम पर ही विक्रमी शक संवत् (संवत्सर) का पहला दिन भी इसी दिन प्रारंभ होता है। आज भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान विक्रमी संवत के साथ ही जुड़ी हुई है और भारत के सांस्कृतिक पर्व-उत्सव तथा राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक आदि महापुरुषों की जयंतियां भी इसी भारतीय काल गणना के हिसाब से ही मनाई जाती हैं। राजा विक्रमादित्य की भांति शालिवाहन ने हूणों को परास्त कर दक्षिण भारत में श्रेष्ठतम राज्य स्थापित करने हेतु भी यही दिन चुना था। सिंध प्रांत के समाज रक्षक वरूणावतार संत झूलेलाल भी इसी दिन प्रकट हुये थे अतः यह दिन सिंधी समाज बड़े ही उत्साह के साथ मनाता है। पूरे देशभर में सांस्कृतिक समारोहों का आयोजन किया जाता है एवं झांकियां आदि निकाली जाती हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक, प्रखर देशभक्त डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी का जन्मदिवस, आर्य समाज का स्थापना दिवस भी इसी दिन पड़ते हैं। साथ ही, शक्ति और भक्ति के नौ दिन अर्थात् नवरात्रि का पहला दिन भी इसी दिन से प्रारम्भ होता है। इतनी विशेषताओं को समेटे हुए भारत में हिंदू नव वर्ष वास्तव में कुछ नया करने की प्रेरणा देता है। यह वर्ष का सबसे श्रेष्ठ दिवस भी माना जाता है।

भारतीय नव वर्ष के दिन चारों ओर नई उमंग की धारा प्रवाहित होती हुई दिखाई देती है। प्रकृति अपने पुराने आवरण को उतार कर नए परिवेश में आने को आतुर दिखाई देती है एवं ऐसा कहा जाता है कि भारत माता अपने पुत्रों को धन धान्य से परिपूर्ण करती हुई दिखाई देती है क्योंकि इसी समय किसानों द्वारा अपनी फसलों की कटाई की जाती है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि भारतीय नव वर्ष के प्रथम दिवस पूजा पाठ करने से असीमित फल की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि शुभ कार्य के लिए शुभ समय की आवश्यकता होती है और यह शुभ समय नव वर्ष के दिन के रूप में मिलता है।

भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है, क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव श्रृंगार किया जाता है। भारतीय कालगणना के अनुसार वसंत ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीन काल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है। वसंत ऋतु में आने वाले वासंतिक नवरात्र का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्य तिथि से होता है। विक्रमादित्य ने भारत की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत इस तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है।

हिंदू नववर्ष के दिन हिंदू घरों में नवरात्रि के प्रारम्भ के अवसर पर कलश स्थापना की जाती है घरों में पताका ध्वज आदि लगाये जाते हैं तथा पूरा नववर्ष सफलतापूर्वक बीते इसके लिए अपने इष्ट, गुरु, माता-पिता सहित सभी बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। हिंदू नववर्ष की शुरुआत में ही नौ दिन का व्रत रखकर मां दुर्गा की पूजा प्रारंभ कर नवमीं के दिन हवन कर मां भगवती से सुख-शांति तथा कल्याण की प्रार्थना की जाती है। जिसमें सभी लोग सात्विक भोजन व्रत उपवास, फलाहार कर नए भगवा झंडे तोरण द्वार पर बांधकर हर्षोल्लास से मनाते हैं। मां दुर्गा के नवरूपों की आराधना के रूप में महिलाओं के सम्मान की बात भी सिखायी जाती है। इस तरह भारतीय संस्कृति और जीवन का विक्रमी संवत्सर से गहरा संबंध है लोग इन्हीं दिनों तामसी भोजन, मांस-मदिरा का त्याग भी कर देते हैं।

चैत्र माह का हर दिन का अपना अलग ही विशेष महत्व है। शुक्लपक्ष में अधिकांश देवी देवताओं के पूजने व उन्हें याद करने का दिन निर्धारित है। शुक्ल पक्ष की तृतीया को उमा शिव की पूजा की जाती है, वहीं चतुर्थी तिथि को गणेश जी की। पंचमी तिथि को लक्ष्मी जी की तथा नागपूजा की जाती है। शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को स्वामी कार्तिकेय की पूजा की जाती है। सप्तमी को सूर्यपूजन का विधान है। अष्टमी के दिन मां दुर्गा का पूजन और ब्रह्मपुत्र नदी में स्नान करने का अपना अलग ही महत्व है इस दिन असम में ब्रह्मपुत्र नदी के घाटों पर स्नानार्थियों की भारी भीड़ उमड़ती है। नवमी के दिन भद्रकाली की पूजा की जाती है।

इसी प्रकार महाराष्ट्र में नव वर्ष को गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है। गुड़ी यानी विजय पताका। भोग पर योग की विजय, वैभव पर विभूति की विजय और विकार पर विचार की विजय। आज समय की यह मांग है कि मंगलता और पवित्रता को वातावरण में सतत प्रसारित करने वाली इस गुड़ी को फहराने वाले को आत्मनिरीक्षण करके यह देखना चाहिए कि मेरा मन शांत, स्थिर और सात्विक बना या नहीं। साथ ही, ठोस गणितीय और वैज्ञानिक काल गणना पद्धति पर आधारित हिन्दू नववर्ष हमारी पुरातन संस्कृति का सार है तथा जिसका प्रयोग धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र तक ही सीमित न करते हुए आज आवश्यकता इस बात की है कि इसे हम अपने दैनिक जीवन में भी अपनाएं और धूम धाम से शास्त्रीय विधान के साथ अपना नववर्ष मनाएं।

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