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मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा अध्याय – 27 ( ख ) महाराणा बन गए थे एक अबूझ पहेली

महाराणा बन गए थे एक अबूझ पहेली

अकबर के लिए महाराणा उन दिनों एक ऐसी अबूझ पहेली बन चुके थे जिसका उत्तर वह जितना ही खोजना चाहता था, उतना ही वह उसमें उलझता जाता था। मेवाड़ की दलदल से अकबर भागना चाहता था, पर भागने के स्थान पर उसमें धंसता ही जा रहा था। वह महाराणा प्रताप नाम के भूत से जितनी शीघ्रता से मुक्ति चाहता था, उतना ही वह एक अदृश्य से बंधन में जकड़ता जा रहा था। अकबर इस पहेली का कोई ओर छोर नहीं देख पा रहा था।
ऐसी मानसिकता के चलते उसने महाराणा प्रताप का दमन करने के लिए जगन्नाथ कछवाहा को एक सैन्य दल के साथ एक बार फिर मेवाड़ की ओर प्रस्थान करने का आदेश दिया। जगन्नाथ कछवाहा ने महाराणा प्रताप को मांडलगढ़ में जाकर चुनौती दी। महाराणा प्रताप उस समय मांडलगढ़ के इस दुर्ग को मुगलों से छीनने की तैयारी कर रहे थे। महाराणा प्रताप ने जगन्नाथ कछवाहा के आने की सूचना मिलते ही मांडलगढ़ को छोड़ दिया।
तब जगन्नाथ कछवाहा ने महाराणा की राजधानी चावंड की ओर प्रस्थान किया। महाराणा प्रताप भी यह भली प्रकार जानते थे कि मांडलगढ़ में उनके न मिलने पर जगन्नाथ चांवड़ की ओर आएगा। मांडलगढ़ को छोड़ने का महाराणा प्रताप का एक विशेष उद्देश्य यह भी था कि वह चांवड़ से अपने परिवार को किसी सुरक्षित स्थान पर भेज देना चाहते थे। यही कारण रहा कि उन्होंने शीघ्रता से चावंड पहुंचकर अपने परिवार को वनों की ओर भेज दिया। मांडलगढ़ के लोग महाराणा प्रताप के प्रति बहुत ही श्रद्धा भाव रखते थे। वह अपने महाराणा के साथ मजबूत चट्टान की भांति उठ खड़े हुए और जगन्नाथ कछवाहा को यह स्पष्ट संकेत दे दिया कि उनके रहते वह महाराणा प्रताप का कुछ भी नहीं बिगाड़ पाएगा।
जनता ने महाराणा प्रताप के समर्थन में उतर कर अपने आप ही जगन्नाथ कछवाहा का सामना करना आरंभ कर दिया। जगन्नाथ कछवाहा को जनता से ऐसी अपेक्षा नहीं थी। विशेष रूप से तब जबकि महाराणा प्रताप उस समय जनता का सीधे रुप में नेतृत्व नहीं कर रहे थे। जनता ने जगन्नाथ कछवाहा को स्पष्ट संकेत दे दिया कि या तो वह भाग जाए अन्यथा उनकी चुनौती का सामना करें। जगन्नाथ कछवाहा को मांडलगढ़ की देशभक्त जनता ने हमला कर करके चावल जाने से रोकने का प्रयास किया। जनता के भारी प्रतिरोध के उपरांत जब 15 सितंबर 1585 को जगन्नाथ कछवाहा महाराणा प्रताप की राजधानी चावंड में प्रवेश करने में सफल हो गया । अब उसे यह पूर्ण विश्वास था कि महाराणा प्रताप उसे अपने महलों में छुपे हुए मिल जाएंगे। अपनी इसी अपेक्षा के साथ वह महाराणा प्रताप के महलों में प्रविष्ट हुआ । पर उस समय वह आश्चर्यचकित रह गया जब उसे वहां कुछ भी नहीं मिला। वास्तव में महाराणा प्रताप जगन्नाथ कछवाहा के अपनी राजधानी की ओर बढ़ने के संदेश को पाकर अपने महल को भी पूर्व में ही छोड़ चुके थे।
जगन्नाथ कछवाहा महाराणा प्रताप के सुरक्षित स्थान पर जा तो पहुंचा था पर अब उसको अपने प्राणों को बचाना भी कठिन हो गया था। हुआ यह था कि महाराणा प्रताप के लोगों ने छापामार युद्ध के द्वारा अब उसका सामना करना आरंभ कर दिया था। जगन्नाथ कछवाहा इस युद्ध में बुरी तरह फंस गया था। फलस्वरूप वह भयभीत होकर वहां से भाग निकला। अब उसकी समझ में यह बात आ गई थी कि महाराणा प्रताप को पकड़ने में उसके पूर्व के अकबर के सेनाधिकारी क्यों असफल हुए थे?

अकबर ने पराजय स्वीकार की

जब जगन्नाथ कछवाहा असफल होकर अकबर के पास पहुंचा तो अकबर ने निर्णायक रूप से महाराणा प्रताप के सामने पराजय स्वीकार कर ली। बार-बार की असफलता से अकबर बहुत दु:खी होता था। उसने महाराणा प्रताप को गिरफ्तार कराने के अनेक यत्न किए, पर हर बार उसे असफलता ही मिलती रही। अब मन मसोसकर बैठ जाने के अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं था। यही कारण रहा कि इसके बाद अकबर ने कभी मेवाड़ पर कोई हमला नहीं किया। महाराणा प्रताप अगले 12 – 13 वर्ष तक मेवाड़ पर निश्चिंत होकर शासन करते रहे। युद्ध काल से निकलकर महाराणा प्रताप अपने देशभक्त लोगों के बल पर अब शांति काल में प्रवेश कर चुके थे।
अकबर द्वारा भविष्य में मेवाड़ पर आक्रमण न करने के इस निर्णय को इतिहास में प्रमुखता से समझने की आवश्यकता है।
इस प्रकार के ऐतिहासिक निर्णय से जहां अकबर की पराजय सिद्ध हो जाती है वहीं महाराणा प्रताप एक अजेय योद्धा के रूप में स्थापित हो जाते हैं। हमें वस्तुस्थिति को समझ कर तथ्यात्मक आधार पर सत्य का महिमामंडन करना चाहिए।

अजेय योद्धा देश का, महा राणा प्रताप।
हृदय बड़ा उदार था, दिल से थे निष्पाप।।

इतिहास में महाराणा प्रताप संपूर्ण स्थान सुनिश्चित करते समय हमें उनकी राजधानी चावंड को भी विशेष स्थान देना चाहिए। निश्चित रूप से उनकी आपातकालीन राजधानी चावंड इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्मारक है। हमें इसे राष्ट्रीय स्मारक के रूप में सम्मान देना चाहिए। यह स्थान इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यहीं पर जनवरी 1597 ईस्वी में महाराणा प्रताप का देहावसान हुआ था।

महाराणा प्रताप की मृत्यु के विषय में

महाराणा प्रताप की मृत्यु के बारे में हमें कविराज श्यामल द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वीर विनोद’ से जानकारी मिलती है। जिससे पता चलता है कि महाराणा प्रताप की मृत्यु 15 जनवरी 1597 को हुई थी। चावंड ( उदयपुर ) से एक से दो मील की दूरी पर एक बांडोली नामक गांव पड़ता है। इसी बांडोली गांव की मिट्टी में भारत की स्वाधीनता का अमर नायक और भारत के शौर्य एवं प्रताप का प्रतीक महाराणा प्रताप सोया हुआ है। यहां एक नदी के किनारे महाराणा प्रताप का अंतिम संस्कार किया गया था। जहां पर महाराणा प्रताप का अंतिम संस्कार किया गया था, उस स्थान पर आज भी एक स्मारक बना हुआ है। जिसे महाराणा प्रताप की छतरी के नाम से जाना जाता है।
“उदयपुर राज्य का इतिहास” सुप्रसिद्ध इतिहासकार श्री गौरीशंकर हीराचंद ओझा के द्वारा लिखा गया है। इस पुस्तक के अध्ययन से हमें पता चलता है कि जिस समय महाराणा प्रताप की मृत्यु हुई थी उस समय वह चावंड में थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु हुई उस दिन वह बहुत दु:खी थे। महाराणा प्रताप अपने जीते जी चित्तौड़ को ले नहीं पाए थे इसका उन्हें असीम दुख था। वह नहीं चाहते थे कि बिना चित्तौड़ लिए ही उन्हें संसार से जाना पड़ जाए । वह एक शूरवीर की भांति जीवन जीते रहे थे पर आज जब वह अपने लिए हुए संकल्प को पूर्ण न करते हुए संसार से प्रस्थान करने की तैयारी कर रहे थे तो यह बात उन्हें सहन नहीं हो रही थी।
जब महाराणा प्रताप अपने अंतिम क्षणों में मृत्यु से जूझ रहे थे तो असीम वेदना उनके चेहरे पर प्रकट हो रही थी। उनके चारों ओर उनके वे सामंत बैठे हुए थे जिन्होंने साए की तरह उनका हर क्षण साथ दिया था। उन लोगों को यह बात समझ नहीं आ रही थी कि उनके महाराणा सहज रूप से संसार से विदा क्यों नहीं हो पा रहे हैं? किसी भी सामंत का यह साहस नहीं हो पा रहा था कि वह महाराणा प्रताप से उनकी पीड़ा का कारण पूछ ले। तब सलूंबर के सामंत ने साहस दिखाया। उसने महाराणा प्रताप से यह पूछ लिया कि आप इस समय इतने दु:खी क्यों हैं? अंततः ऐसा कौन सा कारण है जिसके चलते आप सहज रूप से प्राण नहीं त्याग पा रहे हैं ?

अमर सिंह के बारे में महाराणा के अंतिम शब्द

सलूंबर के सामंत के इस प्रश्न को सुनकर महाराणा प्रताप ने अपने मन की वह बात कही थी जो इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों से लिखे जाने योग्य है। महाराणा प्रताप ने अपने सभी सामंतों की ओर अपना मुख करते हुए स्पष्ट किया कि मेरा पुत्र अमरसिंह एक ऐश्वर्य संपन्न जीवन जीने वाला व्यक्ति है। मैं उससे यह अपेक्षा नहीं कर सकता कि मेरी मृत्यु के उपरांत वह मेवाड राज्य के गौरव और चित्तौड़ की प्राप्ति के लिए वैसा ही संघर्ष जारी रख सकेगा जैसा मैंने आजीवन रखा है। वह निश्चय ही महलों के सुख सुविधा संपन्न जीवन को जीने लगेगा। जिससे चित्तौड़ प्राप्ति का मेरा सपना सपना ही रह जायेगा। यदि आप लोग मुझे यह विश्वास दिलाएं कि मेरे संसार से जाने के पश्चात मेरे इस संकल्प की पूर्ति आप लोग करेंगे तो मैं सहजता से प्राण त्याग कर सकता हूं।
महाराणा के इन शब्दों को सुनकर सभी सामंतों को वास्तविकता का बोध हुआ। तब उन्होंने अपने महाराणा को सामूहिक रूप से यह विश्वास दिलाया कि यदि आप संसार से चले जाते हैं तो भी हम आपके सम्मान को गिरने नहीं देंगे। उन्होंने बप्पा रावल के राज्यसिंहासन की सौगंध खाकर कहा कि आप निश्चिंत होकर प्रस्थान करें, हम कुंवर अमर सिंह को एक शासक के रूप में आराम से बैठने नहीं देंगे और जब तक चित्तौड़ को प्राप्त नहीं कर लेंगे तब तक संघर्ष करते रहेंगे। अपने सामंतों से इस प्रकार के गर्वीले शब्दों को सुनकर महाराणा प्रताप ने अपने प्राण त्याग दिए।
“महाराणा यश प्रकाश” के लेखक भूरसिंह शेखावत हैं। इसके पृष्ठ संख्या 139 पर उन्होंने लिखा है कि “ईश्वर की माया भी अपार है, वो वीर(महाराणा प्रताप) जो मुसलमानों से युद्ध करते हुए कभी घायल नहीं हुए, वह वीर जिसने अपनी तलवार से बहुत सारे योद्धाओं को मृत्यु शैय्या पर सुला दिया आज कमान खींचने की वजह से घायल होकर इस संसार से हमेशा के लिए विदा हो गया।”

ले ली संसार से विदा

महाराणा प्रताप उस दिन शेर का शिकार करने जा रहे थे और उन्होंने जब अपने कमान को खींचा तो कमान या प्रत्यंचा को खींचने पर महाराणा प्रताप के पेट वाले भाग पर बहुत भयंकर चोट लगी। उस चोट के लगने पर महाराणा प्रताप गंभीर रूप से घायल हो गए थे। महाराणा प्रताप की यह गंभीर चोट उनके लिए प्राणलेवा सिद्ध हुई। क्योंकि कुछ दिनों के पश्चात वह घाव बहुत बड़ा हो गया था और महाराणा प्रताप के लिए उसका कष्ट दिन प्रतिदिन घातक होता चला गया। इसके कारण वह लंबे समय तक बीमार रहे। अंत में 19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप ने इस असार संसार से विदा ली।
महाराणा प्रताप अपने राष्ट्र रुपी पिता के अनुव्रती पुत्र थे। उन्होंने उसी व्रत का आजीवन निर्वाह किया जिसे कुल परंपरा से उनके पूर्वज निभाते आ रहे थे। अबसे पूर्व में कई ऐसे देशभक्त शासक उनके वंश में हो चुके थे जिनके लिए राष्ट्र प्रथम था। बप्पा रावल की वंश परंपरा में महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप तक जितने भर भी शासक हुए उनके भीतर राष्ट्र प्रथम का यह भाव संस्कार के रूप में विराजमान था। यह कोई संयोग नहीं था कि महाराणा प्रताप संसार से जाने के क्षणों में भी राष्ट्र के लिए तड़प रहे थे अपितु यह संस्कारावशात हुई एक महत्वपूर्ण घटना थी, जिसके अर्थ, औचित्य और महत्व को हमें समझना चाहिए।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

(हमारी यह लेख माला आप आर्य संदेश यूट्यूब चैनल और “जियो” पर शाम 8:00 बजे और सुबह 9:00 बजे प्रति दिन रविवार को छोड़कर सुन सकते हैं।
अब तक रूप में मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा नामक हमारी है पुस्तक अभी हाल ही में डायमंड पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हो चुकी है । जिसका मूल्य ₹350 है। खरीदने के इच्छुक सज्जन 8920613273 पर संपर्क कर सकते हैं।)

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