रामानंदाचार्य के शिष्य अनंतानन्द जी महराज एक दिव्य सन्त

images - 2023-03-02T102549.469

✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी

संत शिरोमणि रामानंदाचार्य के शिष्यों की वास्तविक संख्या कितनी थी, इसके सम्बन्ध में कोई निश्चित मत स्थापति नहीं किया जा सकता। सहज अनुमान किया जा सकता है कि इस युग प्रवर्तक विभूति के शिष्यों की संख्या अत्यधिक रही होगी। भारत भ्रमण के समय में स्थान-स्थान पर लोग उनके व्यक्तित्व एवं उपदेशों से प्रभावित होकर उन्हें अपना गुरु मानने लगे होंगे। फिर भी उनके 12 प्रमुख शिष्यों का उल्लेख कई स्रोतों से मिलता है। इन शिष्यों के बारे में एक दोहा भी कहा जाता है-
अनतानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावती, नरहरि।
पीपा, भावानन्द, रैदासु, धना, सेन, सुरसरि की धरहरि।
(अर्थात्- अनंतानंद, कबीर, सुखानंद, सुरसुरानंद, पद्मावति, नरहरि, पीपा, भावानंद, रैदास, धन्ना, सेन तथा सुरसुरानंद की धर्मपत्नी आदि प्रमुख शिष्य थे)
संवत्‌ 1532 अर्थात सन्‌ 1476 में आद्य जगद्‍गुरु रामानंदाचार्य जी ने अपनी देह छोड़ दी। उनके देह त्याग के बाद से वैष्ण्व पंथियों में जगद्‍गुरु रामानंदाचार्य पद पर ‘रामानंदाचार्य’ की पदवी को आसीन किया जाने लगा।
रामानंदाचार्य के शिष्यों में से कबीर, पीपा तथा रैदास कवि थे। इन्हें मध्य युगीन भक्ति काल में संत कवि की प्रतिष्ठा प्राप्त है। कवि होने के कारण इन संतों की महिमा काल व लोक की सीमाओं को पार करके दूर दूर तक प्रकाशित हुई। नाभादास कृत भक्तमाल में रामानंदाचार्य के शिष्य का संक्षिप्त वर्णन मिलता है।
अनंतानंद जी महराज:-
रामानंद संप्रदाय के ग्रंथों में इनका नाम अत्यंत आदर से लिया जाता है। इन्हें भी अपने गुरु के ही समान जगद्गृरु कहकर संबोधित किया गया है। अनंतानंद जी, को ब्रह्मा जी का अवतार कहा जाता है। नाभादास ने भक्तमाल में लिखा है-
अनंतानंद पद परिस कै लोकपाल से ते भए।
अर्थात् अनंतानंद के शिष्य अपने गुरु के चरणों का स्पर्श करके लोकपालों के समान शक्तिशाली हो गये। अनंतानंद के बचपन का नाम छन्नूलाल था। आप अयोध्या के पास राम रेखा नदी के तट पर महेशपुर गांव में पैदा हुए थे। शिक्षा दीक्षा काशी में हुई और वहीं बस गए थे। अनंतानंद के पिता जी पंडित विश्वनाथमणि त्रिपाठी सनाढ्य ब्रह्मण थे। अयोध्या और रामायण के प्रति निष्ठा के कर उन्हे अवधू पंडित कहा जाता है। वे सरस्वती के भक्त थे,जिनके आशीर्वाद से उन्हें संवत 1363 विक्रमी के कार्तिक पूर्णिमा को अनंतानंद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। जन्म उपरांत पहले माता जी और बाद में पिता जी की मृत्यु हो गई थी। अब पिता अवधू पंडित के ग्वाल यजमानों के बच्चों के साथ वे वन में गाय चराया करते थे। गाय चराते दिव्य वंशी की धुन सुनकर आप संवरू नामक बालक से उनकी घनिष्ठता बढ़ गई। एक दिन सांवला सलोना बालक वंशी वादन कर रहा था। आपकी उससे मित्रता हो गई। उससे मिलना आपका नित्य कर्म हो गया। उससे ना मिलने पर आप में बेचैनी महसूस होने लगी । एक दिन वह बालक भगवान श्री कृष्ण जी के रूप में उन्हें आंख बन्द कराकर गोवर्धन पर्वत के विविध लीलाओं का दर्शन कराया था। उन्हें ब्रह्म का ज्ञान मिला और उनकी भाव समाधि लग गई। बाद में श्याम किशोर नामक ब्राह्मण भक्त ने उनका पुत्रवत लालन पालन किया। वे उन्हें काशी ले गए और वहीं बस गए। वहां अनुकूल स्थिति में वे पढ़कर प्रतिष्ठित विद्वान बन गए।
एक बार काशी विश्वनाथ मंदिर में वे जागरण कर रहे थे जहां स्वामी रामानन्द जी महाराज की दिव्य ध्वनि उन्हें सुनाई दी और उस आकर्षण में आकर वे रामानंद जी से शिष्य बन दीक्षा ली और फिर अपने घर लौट कर नही आए। गुरु जी ने उनका अनंतानंद नाम रख दिया। गुरु और आश्रम की सेवा कर वे महान संत बन गए । अनंतानंद ने ‘‘श्री हरि भक्ति सिंधु – वेला’’ नामक ग्रंथ की रचना की।
भक्त माल के अनुसार अनंतानंद के शिष्य का नाम योगानंद, गयेश जी,कर्म चन्द जी, अल्लह जी, पयहारी
जी, राम दास जी, श्री रंग जी और नरहरि दास आदि थे।
सभी भक्ति की वर्षा करने वाले थे। श्री अनंतानंद और उनके शिष्य गणों ने श्री राम चंद्र और श्री कृष्ण के निर्मल यशोगान करके पवित्र कीर्ति रूपी धन का संग्रह किया है।
अनंतानंद जी भक्ति रूपी समुद्र की मर्यादा थे। पद्मजा जी श्री जानकी ने आपके शिर पर अपना वरद हस्त रख कर आशीर्वाद दिया।
श्री रामानंदाचार्य के साकेतवासी होने पर अनंतानंद को ही वैष्णवाचार्य के पीठ पर अभिषिक्त किया गया था किंतु गुरु विरह को सहन नहीं कर पाने के कारण एक वर्ष बाद ही वे अपने वरिष्ठ शिष्य कृष्णदासजी को आचार्य पीठ पर अभिषिक्त करके स्वयं स्वच्छंद परिभ्रमण के लिये निकल पड़े। मान्यता है कि उन्होंने 113 वर्ष की आयु में साकेत गमन किया। अनंतानंद के शिष्य अपने गुरु के चरणों का स्पर्श करके लोकपालों के समान शक्तिशाली हो गये। (भक्तमल पद्य संख्या 37)

(लेखक सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में साहित्य, इतिहास, पुरातत्व और अध्यात्म विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं।)

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vdcasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betebet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betebet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
pusulabet giriş
parmabet giriş
parmabet giriş
betnano giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betparibu giriş
betlike giriş
parmabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
parmabet giriş
betlike giriş
vaycasino giriş
betparibu giriş
klasbahis giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
mariobet giriş
mariobet giriş
grandpashabet giriş
betlike giriş
parmabet giriş
grandpashabet giriş
betparibu giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
parmabet giriş