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शिव आख्यान

डॉ डी के गर्ग
भाग- 2
ये लेख 10 भाग में है , पूरे विषय को सामने लाने का प्रयास किया है। आप अपनी प्रतिक्रिया दे और अपने विचार से भी अवगत कराये ।

वेदों में शिव-पूजा

वेदों के शिव–निराकार ईश्वर का नाम भी शिव है। शिव का अर्थ हैं – जो कल्याणकारी हो। क्योंकि ईश्वर कल्याणकारी है, इसलिए उसका एक नाम शिव भी है।
(शिवु कल्याणे) इस धातु से ‘शिव’शब्द सिद्ध होता है।
‘बहुलमेतन्निदर्शनम्’ इससे शिवु धातु माना जाता है, जो कल्याणस्वरूप और कल्याण का करनेहारा है, इसलिए उस परमेश्वर का नाम ‘शिव’ है। वेदों में ईश्वर के गुणों के अनुसार लगभग सौ नामों से परमेश्वर को संबोधित किया हैं, जिनमे से शिव भी एक नाम है।

जैसे परमेश्वर के अनन्त गुण, कर्म, स्वभाव हैं, वैसे उस के अनन्त नाम भी हैं। उनमें से प्रत्येक गुण, कर्म और स्वभाव का एक-एक नाम है। वेदो में वर्णित शिव सिर्फ पर्वत पर नहीं होता, बल्कि समस्त सौर मंडल में कण-कण में विद्यमान है जिसकी कल्पना करना पूरी तरह असंभव है।
हम प्रतिदिन अपनी सन्ध्या उपासना के अन्तर्गत ये वेद मंत्र बोलते है
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च (यजु० १६/४१)
इसके द्वारा परम पिता का स्मरण करते हैं।
अर्थ:-जो मनुष्य सुख को प्राप्त कराने हारे परमेश्वर और सुखप्राप्ति के हेतु विद्वान् का भी सत्कार कल्याण करने और सब प्राणियों को सुख पहुंचाने वाले का भी सत्कार मंगलकारी और अत्यन्त मंगलस्वरूप पुरुष का भी सत्कार करते हैं, वे कल्याण को प्राप्त होते हैं।
इस मन्त्र में शंभव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, शिवतर शब्द आये हैं जो एक ही परमात्मा के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुए हैं।
वेदों में ईश्वर को त्रर्यम्बकं भी कहा है जो तीनों लोकों का स्वामी है इसे गुणों और कर्मों के अनुसार बताया है-
त्रर्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उपनिषदों में भी शिव की महिमा निम्न प्रकार से है-
स ब्रह्मा स विष्णुः स रुद्रस्सः शिवस्सोऽक्षरस्सः परमः स्वराट्।
स इन्द्रस्सः कालाग्निस्स चन्द्रमाः।। -कैवल्यो० १/८*
वह जगत का निर्माता, पालनकर्ता, दण्ड देने वाला, कल्याण करने वाला, विनाश को न प्राप्त होने वाला, सर्वोपरि, शासक, ऐश्वर्यवान, काल का भी काल, शान्ति और प्रकाश देने वाला है।
प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतम् चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।।७।। -माण्डूक्य०
जो इस संसार की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय का कर्ता एक ही है, जो सब प्राणियों के हृदयाकाश में विराजमान है, जो सर्वव्यापक है, वही सुखस्वरूप भगवान् शिव सर्वगत अर्थात सर्वत्र प्राप्त है।
इसे और स्पष्ट करते हुए कहा है-
सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य सृष्टारमनेकरुपम्।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा शिवं शान्तिमत्यन्तमेति।। -श्वेता० ४/१४
परमात्मा अत्यन्त सूक्ष्म है, हृदय के मध्य में विराजमान है, अखिल विश्व की रचना अनेक रूपों में करता है। वह अकेला अनन्त विश्व में सब ओर व्याप्त है। उसी कल्याणकारी परमेश्वर को जानने पर स्थाई रूप से मानव परम शान्ति को प्राप्त होता है।

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