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भारत में ब्रह्मण समुदाय पर बढ़ती जातीय हिंसा

✍️ डॉ. राधे श्याम द्विवेदी
एक तरफ एम पी कैडर के आई ए एस नियाज़ खान जैसे कुछ प्रबुद्ध अधिकारी ब्राह्मण के आई क्यू की प्रशंसा कर रहे है । ब्रह्मण की सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की सराहना कर रहे हैं,वही देश में बहुत बड़ा वर्ग ब्राह्मण के गुणों को नजरंदाज करते हुए नकारतमक प्रचार प्रसार कर रहा है। समाज में हमेशा अच्छी बातें ही प्रसारित होनी चाहिए।
भारत में जाति हिंसा के विभिन्न रूप:-
भारत में जाति संबंधी हिंसा विभिन्न रूपों में होती है । ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट के अनुसार , “भेदभाव पूर्ण और क्रूर, अमानवीय और भारत में 165 मिलियन से अधिक लोगों के अपमानजनक व्यवहार को जाति के आधार पर उचित ठहराया गया है। जाति प्रकृति पर आधारित है और वंशानुगत है। यह एक विशेषता निर्धारित है। किसी विशेष जाति में जन्म के बावजूद, व्यक्ति द्वारा विश्वास किए जाने के बावजूद। जाति, वंश और व्यवसाय द्वारा परिभाषित रैंक वाले समूहों में कठोर सामाजिक स्तरीकरण की एक पारंपरिक प्रणाली को दर्शाती है। भारत में जाति विभाजन आवास, विवाह, रोजगार और सामान्य सामाजिक क्षेत्रों में हावी है। बातचीत-विभाजन, जो सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक बहिष्कार और शारीरिक हिंसा के अभ्यास और खतरे के माध्यम से प्रबलित होते हैं।आरक्षण की त्रुटिपूर्ण व्यवस्था से योग्य होने के बावजूद ब्राह्मण युवा सरकारी नौकरियों में पिछड़ रहे हैं। उनके आगे बढ़ने के अवसर कम हो रहे हैं क्योंकि उनकी बात उठाने वाला कोई नहीं है।किसी एक के बूते नहीं बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को समाज के सम्मान और उत्थान के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ेगा तभी ब्राह्मण समाज का गौरव भविष्य में बरकरार रहेगा।
आजादी में भी सुचिता का अभाव :-
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ है लेकिन इसके तीन चार टुकड़े कर दिए गए। अंग्रेजों की चाल,मोती लाल नेहरू की वाक पटुता ,जवाहर लाल नेहरु की हेकड़ी , जिन्ना की जिद और मोहन दास गांधी के तिकड़म ने अपने वा अपनों के निजी स्वार्थ ने इसे आपस में बन्दर बांट करके एक ना रहने दिया। बड़ा भाग नेहरू ने लिया । एक भाग शेख अब्दुल्ला ने तथा दो भाग जिन्ना ने लेकर अपने अपने
मंसूबे पूरे किए। इन चारों में चुनी हुई दिखावटी सरकारें बनी पर चलती थी इन सब के सत्तासीनों के मन के मुताबिक जनमत दिखाया जाता। चुनाव भी होते पर सब काम आकाओं के मन मर्जी के मुताबिक चलता था। संविधान कानून और संधि समझौते में देश का व्यापक हित ना देखकर मालिकों के हित साधे गए। विदेशी संविधान का नकल कर अपने अपने देश में कानून बने ।उसे अपनी प्रतिबद्धता के अनुसार बदलते जाते रहे। चूंकि नई नई आजादी मिली थी इसलिए विरोध के स्वर भी दबा दिए जाते रहे। संविधान सभा द्वारा बनाया गया नकल वाले संविधान को एक खास व्यक्तिके नाम पट्टा कर दिया गया।
देश की चंडाल चौकड़ी इसे अपने अपने मन के मुताबिक
बदलती रही।धर्म के आधार पर देश को तोड़ने और अपने हिस्से में लेने वालो ने मुस्लिम बहुल तीन भाग मुस्लिमों को मुकम्मल दे दिया और हिन्दू बहुल भारत को खिचड़ी बना कर सबको लूटने के लिए छोड़ दिया।
ब्रह्मण धर्म और जाति पर सर्वाधिक प्रहार:-
सनातन धर्म और परम्परा पर प्रहार किया जाता रहा। वैदिक आर्य धर्म पर हर तरह से प्रहार होता रहा। वेद उपनिषद पुराण और धर्म की खिल्ली उड़ाई जाती रही।कांग्रेस कम्नयुस्त और विदेशी दबाव ने यहां के बहुसंख्यक के हितों से खिलवाड़ करते रहे। पक्षपात होता रहा। ब्रह्मण धर्म और जाति पर सर्वाधिक प्रहार होता रहा। उन्हें अगड़ा कह कर सारी सरकारी सुविधाओं से महरूम कर दिया गया। समय समय पर उन्हें जहर और जलालत के आंच में सेंका जाता रहा।
ब्राह्मण पर हुई ज्यादती की कुछ प्रमुख घटनाएं :-
1948; महाराष्ट्र में ब्राह्मण विरोधी:-
महात्मा गांधी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे जो एक ब्राह्मण था, उस पर ब्राह्मणों द्वारा निशाना बनाया गया । कुनबी – मराठा समुदाय द्वारा बलात्कार, लिंचिंग और यौन उत्पीड़न की कई घटनाएं दर्ज की गईं।
1992 बारा नरसंहार, बिहार :-
12-13 फरवरी 1992 की मध्यरात्रि में, भारत के माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (अब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी)) ने बिहार, बिहार के गया जिले के पास बारा गाँव में भूमिहार जाति के 35 सदस्यों की बेरहमी से हत्या कर दी । MCC का सशस्त्र समूह बारा गाँव के 35 लोगों को पास की एक नहर के किनारे ले आया, उनके हाथ बाँध दिए और उनका गला काट दिया। 36 के रूप में कई लोगों पर अपराध का आरोप लगाया गया था, लेकिन केवल 13. के खिलाफ आरोप तय किए गए थे। दूसरों को गिरफ्तार करें, जिन्होंने अपने सम्मन को खारिज कर दिया था।
1994 छोटन शुक्ला हत्याकांड :-
छोटन शुक्ला भूमिहार समुदाय के एक गिरोह के सरगना थे। उन्हें ओबीसी बनिया जाति से होने वाले एक सरकारी मंत्री बृज बिहारी प्रसाद के साथ उनके विवाद के लिए जाना जाता था । एक चुनाव अभियान से लौटने के दौरान प्रसाद की ओर से काम कर रहे पुरुषों द्वारा कथित तौर पर उनकी हत्या कर दी गई थी। प्रतिशोध में, प्रसाद को भी गोली मार दी गई थी। आनंद मोहन सिंह, जो उच्च जाति के राजपूतों के नेता थे , और उनके करीबी साथी मुन्ना शुक्ला, जो भूमिहार नेता थे और छोटन शुक्ला के भाई थे, पर मुकदमा चलाया गया और उन्हें जेल में उम्रकैद की सजा दी गई।
1999 सेनारी नरसंहार :-
1999 में, यादव और दुसाध के प्रभुत्व वाले माओवादी चरमपंथी केंद्र ने जहानाबाद के पास सेनारी गाँव में 34 भूमिहारों का हत्या किया था।
2015 में संतों और बटुकों पर बर्बर लाठीचार्ज :-
साल 2015 में यूपी के तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव की सरकार के दौरान गंगा में मूर्ति विसर्जन को लेकर संतों ने सड़क पर बड़ा आंदोलन किया था. इस आंदोलन में पुलिस ने संतों और बटुकों पर बर्बर लाठीचार्ज किया था.
यूपी के वाराणसी में सात साल पुराने संतों के प्रतिकार यात्रा में हुए बवाल मामले में हाईकोर्ट से बड़ी खबर सामने आई है. जिस मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती समेत सतुआ बाबा आश्रम के पीठाधीश्वर संतोष दास और पातालपुरी मठ के प्रमुख बालक दास समेत कई संतों को निचली अदालत से जमानत लेनी पड़ी।
2017 में पांच ब्राह्मणों की नृशंस हत्या :-
2017 में रायबरेली के अप्टा गांव में रोहित शुक्ला सहित पांच ब्राह्मणों की नृशंस हत्या से ब्राह्मण समाज के लोगों में आक्रोश है। ब्राह्मण समाज के लोगों ने राज्यपाल को संबोधित ज्ञापन डीएम को दिया। इसमें पीड़ित परिवार के लोगों को सरकारी नौकरी देने की मांग की।
सवर्ण परिवारों से ज़बरन हफ्ता वसूली:-
12 07 2021 के समाचार के अनुसार ग्वालियर एमपी में, ब्राह्मण समुदाय के एक युवा छात्र को बंदूक की नोक पर लूट लिया गया और क्षेत्र में दलितों का दबदबा मानने के लिए मजबूर किया गया था। इस घटना के बाद थाने में तहरीर भी दी गई थी। आवेदक का परिवार, जो कि हिन्दू धर्म का एक ब्राह्मण परिवार है, विगत 23 वर्षों से ग्वालियर की पूजा विहार कॉलोनी, आपा गंज, लश्कर में रहता है। उनके आस पास दलित समाज के लोग रहते हैं जिनमे उमरैया परिवार बाहुबली है, जो आस पास के सवर्ण परिवारों से ज़बरन हफ्ता वसूली करता है। न देने पर SC/ST के झूठे मुकदमे में जेल भिजवाने की धमकी देता है।
ब्राह्मण समाज की बेटी का राजस्थान में अपहरण;-
19 10 2022 के समाचार में राजस्थान के सवाई माधोपुर में एक मुस्लिम युवक द्वारा हिंदू लड़की के अपहरण का मामला सामने आया है। घटना के विरोध में सांसद किरोड़ी लाल मीणा पीड़िता के परिजनों के साथ थाने के बाहर धरने पर बैठ गए। मीणा सहित परिजनों की मांग है कि अपहृत लड़की को जल्द से जल्द मुस्लिम युवक के चंगुल से जारी किया जाए।परवेज ने बंदूक की नोंक पर किया ब्राह्मण समाज की बेटी का अपहरण’: पीड़ित परिवार के साथ धरने पर बीजेपी सांसद ने कहा – गहलोत राज में बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं हैं (18 अक्टूबर, 2022) को मुस्लिम समाज परवेज ने बंदूक की नोक पर ब्राह्मण समाज का अपहरण कर लिया। परिजनों ने जब विरोध किया तो युवक ने लड़की की मां को झटका देकर गिरा दिया। साथ ही जान मारने की धमकी देकर लड़की की कनपटी पर बंदूक दी और उसे बाइक पर बिठाकर ले गए।
अधिवक्ता परिवार पर मुस्लिम समाज द्वारा हमला :-
04 02 2024 के समाचार के अनुसार बागपत में अधिवक्ता के परिवार पर मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा हमला करने और आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने से नाराज ब्राह्मण समाज के लोगों ने तहसील में प्रदर्शन किया है। इसके अलावा गुस्साए ब्रह्मण समाज के लोगों ने थाना पुलिस पर मिलीभगत से कार्रवाई न करने का आरोप लगाया है। फिलहाल ब्राह्मण समाज के लोग धरने पर बैठ गए हैं।
कानपुर देहात में ‘मौत का बुलडोजर’ :-
कानपुर देहात में ’13 फरवरी 2023 को मौत का बुलडोजर’ चला. यहां अतिक्रमण हटाने के दौरान मां और बेटी की जलकर मौत हो गई. एसडीएम (मैथा) ज्ञानेश्वर प्रसाद मैथा तहसील क्षेत्र के मडौली गांव में सोमवार 13 फरवरी की सुबह बढ़ते अतिक्रमण हटाने के लिए गए थे.
प्रमिला दीक्षित (45) और उनकी बेटी नेहा (20) ने कथित तौर पर पुलिस, जिला प्रशासन और राजस्व अधिकारियों की उपस्थिति में यह कदम उठाया, जो जिले के रूरा क्षेत्र के मडौली गांव में “ग्राम समाज” की भूमि से अतिक्रमण हटाने गए थे. एक पुलिस अधिकारी ने इसकी जानकारी दी.
भारतीय संविधान न्यायपालिका राजनेता और प्रबुद्ध वर्ग अपना नजरिया बदलें :-
भारतीय संविधान न्यायपालिका राजनेता और प्रबुद्ध वर्ग ने इस कौम को शोषण कर्ता बताया है । उन पर आरोप लगाए जाते हैं कि इस कौम ने करोड़ो वर्षों से लोगों का खून चूसा है । अब ये जाति संवैधानिक अछूत है । ये भले कितने भी गरीब हो , पीने के लिए पानी तक न हो , लेकिन ये ब्रह्मांड के सबसे अमीर और खून चूसने वाले प्राणी माने जा रहे हैं। ये राजनैतिक अछूत हो गए हैं और ब्रह्मांड के कण कण का इन्होंने शोषण किया है ।
आज अगर ब्रह्मण से इतर किसी दूसरी जाति की बात होती तो अब तक पूरा देश उबल पड़ता और दलित दलित करके सूर्य को ठंडा कर चुका होता । ब्रह्मण को धिक्कार है जो लोकशाही भारतवर्ष में जन्में जहाँ इनकी औकात सबसे बदतर है । धिक्कार है इस देश के व्यवस्थकारों को जो धीरे धीरे सारी व्यवस्था को खोखला करते हुए 21वीं सदी तक पहुंच गए हैं। अब कलियुग में आना दलित बन कर आना ज्यादा मुफीद है। जो पाप ब्रह्मण के पूर्वजों ने भी नहीं किया उसका खामियाजा उनकी औलादों को भुगतना ही पड़ रहा है। क्योंकि पूरा कलियुग अब ब्रह्म जनों का नही है गैर ब्रह्म जनों का है ।
अब तो ब्रह्म जन जल्दी जल्दी इसी जन्म में भज गोविंदं करके अपना उद्धार कर लो तो बेहतर होगा ताकि इस निकृष्ट दुनियाँ में उन्हें फिर न आना पड़े । लेकिन जाने- अनजाने ही समाज को जातीय संघर्ष में धकेलने का नतीजा सभी के लिए विघटनकारी होगा और भारत कभी भी विश्व गुरु नहीं बन पाएगा।

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