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इतिहास के पन्नों से

मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा अध्याय – 16 ( ख) विक्रमादित्य (1531-1536 ई.)

विक्रमादित्य (1531-1536 ई.)

मेवाड़ के राणा रतनसिंह द्वितीय की मृत्यु निसंतान हुई थी। उसका सौतेला भाई विक्रमादित्य उसके उत्तराधिकारी के रूप में मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। विक्रमादित्य का उपनाम विक्रमाजीत भी था। विक्रमाजीत इतिहास प्रसिद्ध रानी कर्मवती का पुत्र था। बाबर के जीवित रहते हुए भी वह उसे महाराणा संग्राम सिंह का उत्तराधिकारी घोषित कराने के लिए उससे संपर्क कर चुकी थी, परंतु उस समय रानी कर्मवती अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाई थी। रानी ने उस समय मेवाड़ की परंपराओं का तनिक भी ध्यान नहीं रखा था। उसने अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए देश, धर्म व संस्कृति के भक्षक बाबर के समक्ष यह प्रस्ताव भी रख दिया था कि यदि वह उसके पुत्र विक्रमाजीत को राणा संग्राम सिंह का उत्तराधिकारी बनवा देता है तो वह उसे रणथंभौर का किला भी सौंप देगी। कहते हैं कि बाबर रानी के इस प्रस्ताव पर सहमत हो गया था। यह एक सुखद संयोग ही था कि बाबर के मेवाड़ पर आक्रमण करने से पूर्व बाबर की मृत्यु हो गई थी।

राजवंश की फूट

रानी अपने पुत्र विक्रमादित्य उपनाम विक्रमाजीत को राजा बनवाने में तो सफल हो गई परंतु उसके भीतर एक भी ऐसा गुण नहीं था जिसे राजोचित कहा जा सके। रानी देशहित में काम न करके पुत्र हित में काम कर रही थी। मेवाड़ के राजवंश में उस समय फूट पैदा हो चुकी थी और उस फूट का लाभ उठाने के लिए उस समय के मुस्लिम शासक चारों ओर से गिद्ध दृष्टि जमाए हुए थे।
गुजरात के शासक बहादुर शाह ने महाराणा राजवंश की इस पारस्परिक फूट का लाभ उठाने के लिए 1533 ई0 के मार्च महीने में आक्रमण कर दिया। रानी ने अपने पुत्र विक्रमादित्य की सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए फिर एक भूल कर दी और बहादुर शाह के साथ इस आधार पर संधि कर ली कि वह रणथम्भौर का दुर्ग और साथ ही साथ बड़ी धनराशि लेकर चला जाए। 24 मार्च 1533 को संपन्न हुई इस संधि को स्वीकार कर गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह लौट गया। इसके पश्चात गुजरात का यह शासक मेवाड़ पर अपना अधिकार करने के सपने संजोने लगा। वह मेवाड़ की दुर्बलता को समझ चुका था। उसे यह भी समझ आ गया था कि रानी पुत्रमोह में इस समय बहुत ही दुर्बलता का प्रदर्शन कर रही है। मेवाड़ के शासक की बाल्यावस्था का लाभ उठाकर वह भारतवर्ष के इस सबसे प्रसिद्ध दुर्ग को भी अपने अधिकार में लेने में सफल हो सकता है। यही कारण था कि उसने अगले ही वर्ष अर्थात 1534 ई0 में मेवाड़ पर पुनः आक्रमण कर दिया।

मेवाड़ पर किया दूसरी बार आक्रमण

कहा जाता है कि इस बार रानी कर्मवती ने चित्तौड़ की रक्षा के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजी थी। यद्यपि अब यह पूर्णतया सिद्ध हो चुका है कि हुमायूं ने अपने मजहबी भाई बहादुर शाह के विरुद्ध रानी को कोई सहायता नहीं दी थी। रानी ने अपने दोनों अल्प वयस्क पुत्रों अर्थात विक्रमाजीत और उदय सिंह को उनके ननिहाल बूंदी में भेज दिया था। इस समय रानी ने देवरिया अर्थात प्रतापगढ़ के रावत बाघ सिंह को महाराणा का प्रतिनिधि बनाकर नियुक्त किया। इसके उपरांत भी रानी जब चित्तौड़ गढ़ की रक्षा करने में अपने आपको असहाय अनुभव करने लगी तो 5 मार्च 1535 को अपनी 13000 महिलाओं के साथ जौहर कर लिया। रावत बाघसिंह व राणा सज्जा सिंह के नेतृत्व में केसरिया वस्त्र धारण कर बहादुरशाह की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस प्रकार यह चित्तौड़गढ़ दुर्ग का दूसरा साका हुआ। रानी कर्मावती के साथ उसकी पुत्रवधू जवाहर बाई ने भी जौहर किया था। जवाहर बाई राणा साँगा के पुत्र विक्रमादित्य की पत्नी थी। राणा विक्रमादित्य और उदय सिंह उस समय अपनी ननिहाल में थे।
उस समय गुजरात का मुस्लिम शासक बहादुर शाह मेवाड़ पर अधिकार करने में सफल हो गया।1536 ई. में जब हुमायूँ मेवाड़ की ओर आया तो बहादुरशाह हुमायूँ की विशाल सेना का समाचार सुनकर समुद्रमार्ग से भाग गया। कहा जाता है कि समुद्र में नाव उलटने से उसकी मृत्यु हो गई। दामोदर लाल गर्ग जी ने “राजधात्री पन्ना गूजरी” के पृष्ठ 40 पर लिखा है कि 1535 में चित्तौड़ पर आक्रमण करने वाले बहादुरशाह को पुर्तगालियों ने मार डाला था। हुमायूँ चित्तौड़ को लूटकर आगरा की ओर चला गया। तब उचित अवसर देखकर मेवाड़ के राणाओं ने विक्रमादित्य को पुनः 8 मार्च, 1536 ई. को मेवाड़ का राजा बना दिया।
कई इतिहासकारों की यह भी मान्यता है कि बहादुरशाह की सेना का सामना विक्रमाजीत ने स्वयं ने किया था। उसने युद्ध की तैयारी की थी और बूंदी राज्य के लैचा नामक मैदान में उसका सामना किया था। जब राणा को बहादुर शाह ने पराजित कर दिया तो गुजरात का वह मुस्लिम शासक चित्तौड़ की ओर आगे बढ़ा। जिसका सामना चित्तौड़ के लोगों ने बड़ी वीरता के साथ किया।
कर्नल टॉड कहते हैं कि – “बादशाह बहादुर का हमला अब तक के सभी मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों की अपेक्षा अधिक भयानक था। उसकी सेना में एक यूरोपियन गोलंदाज भी था। जिसका नाम लाबी खान था । उसी की सहायता से बादशाह चित्तौड़ का विध्वंस करने लगा।

हिंदुओं ने दिए अनेक बलिदान

चित्तौड़ में भयंकर मारकाट मच गई। राजपूतों ने बड़ी वीरता से युद्ध किया। परंतु लाबी खान की योजना के सामने उनको भारी हानि उठानी पड़ी। लाबी खान ने युद्ध स्थल के निकट एक सुरंग खोदी और उसमें आग लगा दी। जिससे एक विस्फोट हुआ और उस विस्फोट में बड़ी संख्या में हिंदू सेना मारी गई। चित्तौड़ दुर्ग भी कई स्थानों पर टूट गया। राजपूत सेना में भागमभाग मच गई। राणा की ओर से दुर्गाराव नामक योद्धा ने अपनी सेना का साहस बढ़ाया और वह जमकर युद्ध करने लगा। इसी समय सिसोदिया वंश की रानी जवाहर बाई ( जिसे हमने ऊपर रानी कर्मवती की पुत्रवधू कहा है ) ने युद्ध में प्रवेश किया और उसने भी अनेक शत्रुओं को अपने भाले से मार डाला। अंत में वह स्वयं वीरगति को प्राप्त हो गई।”
इस युद्ध में 32000 हिंदू सैनिकों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दिया था। रानी कर्णावती की सहेलियों की संख्या इससे अलग थी। जिन्हें मिलाकर कुल 45000 देशभक्त वीर वीरांगनाओं ने अपना बलिदान दिया था। गुजरात का बादशाह उस समय चित्तौड़ के पतन से प्रसन्न होकर उसमें अगले 15 दिन तक अपनी विजय का उत्सव मनाता रहा था।
1536 ई0 में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे विक्रमाजीत की बनवीर ने हत्या कर दी थी और मेवाड़ के राज सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया था। इसके अतिरिक्त मान्यता यह भी है कि मेवाड़ के सरदारों ने शासकीय गुणों से हीन होने के कारण विक्रमादित्य को राज सिंहासन से च्युत कर दिया। इन लोगों ने विक्रमाजीत के स्थान पर बनवीर को शासक बनाया।
बनवीर मेवाड़ के महान शासक महाराणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज सिंह सिसोदिया की एक दासी से जन्मा पुत्र था। पृथ्वीराज सिंह सिसोदिया का पुत्र होने के कारण वह अपने आप को दासी पुत्र कहलाना उचित नहीं मानता था। इस दासी पुत्र बनवीर सिंह ने सन 1536 से लेकर 1540 ईस्वी तक मेवाड़ के शासक के रुप में शासन किया था। चित्तौड़गढ़ के दुर्ग में स्थित माता तुलजा भवानी मंदिर और नवलखा महल का निर्माण बनवीर सिंह द्वारा करवाया गया था। बनवीर अपने आपको मेवाड़ के उत्तराधिकारी के रूप में प्रारंभ से ही देखता था। वह अपनी स्थिति पर दुखी रहता था और मेवाड़ के महाराणाओं के प्रति उसके हृदय में कटुता का भाव विद्यमान था। वह गुजरात के शासक मुजफ्फर के पास भी रहा था। सुल्तान ने उसे वागड़ का प्रदेश जागीर में दे दिया था। बनवीर अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए युक्तियां खोजता रहता था।

अत्याचारी बनवीर के कुकर्म

  एक दिन उचित अवसर देखकर उसने महाराणा विक्रमादित्य सिंह उपनाम विक्रमाजीत की हत्या कर दी।बनवीर बहुत ही दुष्ट प्रवृत्ति का था। उसके भीतर अत्याचार की भावना कूट-कूट कर भरी थी । उसके भीतर भी शासक का ऐसा कोई गुण नहीं था  जिस पर मेवाड़ को गर्व हो सकता था। उसने अपने आप को मेवाड़ का शासक तो घोषित कर दिया परंतु वह मेवाड़ की जनता में कभी लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका कारण केवल एक था कि उसके भीतर घमंड की भावना बहुत अधिक थी। कुछ समय उपरांत ही वह अपने सामंतों व अधिकारियों के साथ अत्याचार करने लगा। इसी प्रकार अपने प्रजाजनों पर भी उसकी कोप दृष्टि शीघ्र ही दिखाई देने लगी। मेवाड़ के लोग उसके विरोधी हो गए और उससे शीघ्र ही मुक्ति पाने की योजना बनाने लगे। बनवीर ने महाराणा विक्रमाजीत के छोटे भाई 15 वर्षीय उदय सिंह को भी मारने का प्रयास किया था, परंतु उसे वीर माता पन्नाधाय अपनी युक्ति से बचाने में सफल हो गई थी। यद्यपि मेवाड़ के प्रजा जन अभी यही समझ रहे थे कि उदय सिंह का भी अंत हो गया है। परंतु शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि उदयसिंह जीवित है। पन्नाधाय के बलिदान और उदय सिंह को गद्दी पर बिठाने की घटनाओं का हम आगे चलकर यथा स्थान वर्णन करेंगे। 
  जब मेवाड़ के सामंतों को राणा उदय सिंह के जीवित होने का समाचार मिला तो वह उन्हें सम्मानपूर्वक मेवाड़ ले आए। मेवाड़ में लाकर राणा उदय सिंह का और बनवीर का संघर्ष हुआ। सन 1540 में उदय सिंह कई सामंतों जिनमें अखेराज, सोनगरा जैसे मुख्य सामंत सम्मिलित थे, के साथ सेना लेकर चित्तौड़ की ओर बढ़ने लगे। बनवीर ने राणा उदय सिंह के नेतृत्व में मेवाड़ की ओर बढ़ती चली आ रही इस सेना का सामना करने के लिए कुंवरसी तंवर के नेतृत्व में एक सेना का गठन किया और उसे राणा उदय सिंह की सेना से लोहा लेने के लिए भेजा।महाराणा उदयसिंह द्वितीय और कुंवरसी तंवर के मध्य मावली के पास स्थित महोली नामक गांव में एक भयंकर युद्ध हुआ । इस युद्ध में बनवीर का सेनापति कुंवरसी तंवर मारा गया। उसके पश्चात भी कुछ समय तक बनवीर और राणा उदय सिंह की सेनाओं के बीच संघर्ष चला परंतु अंत में राणा उदयसिंह  ने बनवीर अंत करने में सफलता प्राप्त की। इसके पश्चात मेवाड़ के सामंतों ने उन्हें अपना राजा घोषित कर दिया। कई इतिहासकारों की यह भी मान्यता है कि बनवीर इस युद्ध में मारा नहीं गया था अपितु वह मेवाड़ छोड़कर कहीं दूर चला गया था।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

(हमारी यह लेख माला आप आर्य संदेश यूट्यूब चैनल और “जियो” पर शाम 8:00 बजे और सुबह 9:00 बजे प्रति दिन रविवार को छोड़कर सुन सकते हैं।)

मेवाड़ के महाराणा और उनकी गौरव गाथा
अध्याय – 16 ( ख)

विक्रमादित्य (1531-1536 ई.)

मेवाड़ के राणा रतनसिंह द्वितीय की मृत्यु निसंतान हुई थी। उसका सौतेला भाई विक्रमादित्य उसके उत्तराधिकारी के रूप में मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। विक्रमादित्य का उपनाम विक्रमाजीत भी था। विक्रमाजीत इतिहास प्रसिद्ध रानी कर्मवती का पुत्र था। बाबर के जीवित रहते हुए भी वह उसे महाराणा संग्राम सिंह का उत्तराधिकारी घोषित कराने के लिए उससे संपर्क कर चुकी थी, परंतु उस समय रानी कर्मवती अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाई थी। रानी ने उस समय मेवाड़ की परंपराओं का तनिक भी ध्यान नहीं रखा था। उसने अपने उद्देश्य में सफल होने के लिए देश, धर्म व संस्कृति के भक्षक बाबर के समक्ष यह प्रस्ताव भी रख दिया था कि यदि वह उसके पुत्र विक्रमाजीत को राणा संग्राम सिंह का उत्तराधिकारी बनवा देता है तो वह उसे रणथंभौर का किला भी सौंप देगी। कहते हैं कि बाबर रानी के इस प्रस्ताव पर सहमत हो गया था। यह एक सुखद संयोग ही था कि बाबर के मेवाड़ पर आक्रमण करने से पूर्व बाबर की मृत्यु हो गई थी।

राजवंश की फूट

रानी अपने पुत्र विक्रमादित्य उपनाम विक्रमाजीत को राजा बनवाने में तो सफल हो गई परंतु उसके भीतर एक भी ऐसा गुण नहीं था जिसे राजोचित कहा जा सके। रानी देशहित में काम न करके पुत्र हित में काम कर रही थी। मेवाड़ के राजवंश में उस समय फूट पैदा हो चुकी थी और उस फूट का लाभ उठाने के लिए उस समय के मुस्लिम शासक चारों ओर से गिद्ध दृष्टि जमाए हुए थे।
गुजरात के शासक बहादुर शाह ने महाराणा राजवंश की इस पारस्परिक फूट का लाभ उठाने के लिए 1533 ई0 के मार्च महीने में आक्रमण कर दिया। रानी ने अपने पुत्र विक्रमादित्य की सुरक्षा को सुनिश्चित करते हुए फिर एक भूल कर दी और बहादुर शाह के साथ इस आधार पर संधि कर ली कि वह रणथम्भौर का दुर्ग और साथ ही साथ बड़ी धनराशि लेकर चला जाए। 24 मार्च 1533 को संपन्न हुई इस संधि को स्वीकार कर गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह लौट गया। इसके पश्चात गुजरात का यह शासक मेवाड़ पर अपना अधिकार करने के सपने संजोने लगा। वह मेवाड़ की दुर्बलता को समझ चुका था। उसे यह भी समझ आ गया था कि रानी पुत्रमोह में इस समय बहुत ही दुर्बलता का प्रदर्शन कर रही है। मेवाड़ के शासक की बाल्यावस्था का लाभ उठाकर वह भारतवर्ष के इस सबसे प्रसिद्ध दुर्ग को भी अपने अधिकार में लेने में सफल हो सकता है। यही कारण था कि उसने अगले ही वर्ष अर्थात 1534 ई0 में मेवाड़ पर पुनः आक्रमण कर दिया।

मेवाड़ पर किया दूसरी बार आक्रमण

कहा जाता है कि इस बार रानी कर्मवती ने चित्तौड़ की रक्षा के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजी थी। यद्यपि अब यह पूर्णतया सिद्ध हो चुका है कि हुमायूं ने अपने मजहबी भाई बहादुर शाह के विरुद्ध रानी को कोई सहायता नहीं दी थी। रानी ने अपने दोनों अल्प वयस्क पुत्रों अर्थात विक्रमाजीत और उदय सिंह को उनके ननिहाल बूंदी में भेज दिया था। इस समय रानी ने देवरिया अर्थात प्रतापगढ़ के रावत बाघ सिंह को महाराणा का प्रतिनिधि बनाकर नियुक्त किया। इसके उपरांत भी रानी जब चित्तौड़ गढ़ की रक्षा करने में अपने आपको असहाय अनुभव करने लगी तो 5 मार्च 1535 को अपनी 13000 महिलाओं के साथ जौहर कर लिया। रावत बाघसिंह व राणा सज्जा सिंह के नेतृत्व में केसरिया वस्त्र धारण कर बहादुरशाह की सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस प्रकार यह चित्तौड़गढ़ दुर्ग का दूसरा साका हुआ। रानी कर्मावती के साथ उसकी पुत्रवधू जवाहर बाई ने भी जौहर किया था। जवाहर बाई राणा साँगा के पुत्र विक्रमादित्य की पत्नी थी। राणा विक्रमादित्य और उदय सिंह उस समय अपनी ननिहाल में थे।
उस समय गुजरात का मुस्लिम शासक बहादुर शाह मेवाड़ पर अधिकार करने में सफल हो गया।1536 ई. में जब हुमायूँ मेवाड़ की ओर आया तो बहादुरशाह हुमायूँ की विशाल सेना का समाचार सुनकर समुद्रमार्ग से भाग गया। कहा जाता है कि समुद्र में नाव उलटने से उसकी मृत्यु हो गई। दामोदर लाल गर्ग जी ने “राजधात्री पन्ना गूजरी” के पृष्ठ 40 पर लिखा है कि 1535 में चित्तौड़ पर आक्रमण करने वाले बहादुरशाह को पुर्तगालियों ने मार डाला था। हुमायूँ चित्तौड़ को लूटकर आगरा की ओर चला गया। तब उचित अवसर देखकर मेवाड़ के राणाओं ने विक्रमादित्य को पुनः 8 मार्च, 1536 ई. को मेवाड़ का राजा बना दिया।
कई इतिहासकारों की यह भी मान्यता है कि बहादुरशाह की सेना का सामना विक्रमाजीत ने स्वयं ने किया था। उसने युद्ध की तैयारी की थी और बूंदी राज्य के लैचा नामक मैदान में उसका सामना किया था। जब राणा को बहादुर शाह ने पराजित कर दिया तो गुजरात का वह मुस्लिम शासक चित्तौड़ की ओर आगे बढ़ा। जिसका सामना चित्तौड़ के लोगों ने बड़ी वीरता के साथ किया।
कर्नल टॉड कहते हैं कि – “बादशाह बहादुर का हमला अब तक के सभी मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणों की अपेक्षा अधिक भयानक था। उसकी सेना में एक यूरोपियन गोलंदाज भी था। जिसका नाम लाबी खान था । उसी की सहायता से बादशाह चित्तौड़ का विध्वंस करने लगा।

हिंदुओं ने दिए अनेक बलिदान

चित्तौड़ में भयंकर मारकाट मच गई। राजपूतों ने बड़ी वीरता से युद्ध किया। परंतु लाबी खान की योजना के सामने उनको भारी हानि उठानी पड़ी। लाबी खान ने युद्ध स्थल के निकट एक सुरंग खोदी और उसमें आग लगा दी। जिससे एक विस्फोट हुआ और उस विस्फोट में बड़ी संख्या में हिंदू सेना मारी गई। चित्तौड़ दुर्ग भी कई स्थानों पर टूट गया। राजपूत सेना में भागमभाग मच गई। राणा की ओर से दुर्गाराव नामक योद्धा ने अपनी सेना का साहस बढ़ाया और वह जमकर युद्ध करने लगा। इसी समय सिसोदिया वंश की रानी जवाहर बाई ( जिसे हमने ऊपर रानी कर्मवती की पुत्रवधू कहा है ) ने युद्ध में प्रवेश किया और उसने भी अनेक शत्रुओं को अपने भाले से मार डाला। अंत में वह स्वयं वीरगति को प्राप्त हो गई।”
इस युद्ध में 32000 हिंदू सैनिकों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए अपना बलिदान दिया था। रानी कर्णावती की सहेलियों की संख्या इससे अलग थी। जिन्हें मिलाकर कुल 45000 देशभक्त वीर वीरांगनाओं ने अपना बलिदान दिया था। गुजरात का बादशाह उस समय चित्तौड़ के पतन से प्रसन्न होकर उसमें अगले 15 दिन तक अपनी विजय का उत्सव मनाता रहा था।
1536 ई0 में मेवाड़ की गद्दी पर बैठे विक्रमाजीत की बनवीर ने हत्या कर दी थी और मेवाड़ के राज सिंहासन पर अपना अधिकार कर लिया था। इसके अतिरिक्त मान्यता यह भी है कि मेवाड़ के सरदारों ने शासकीय गुणों से हीन होने के कारण विक्रमादित्य को राज सिंहासन से च्युत कर दिया। इन लोगों ने विक्रमाजीत के स्थान पर बनवीर को शासक बनाया।
बनवीर मेवाड़ के महान शासक महाराणा सांगा के बड़े भाई पृथ्वीराज सिंह सिसोदिया की एक दासी से जन्मा पुत्र था। पृथ्वीराज सिंह सिसोदिया का पुत्र होने के कारण वह अपने आप को दासी पुत्र कहलाना उचित नहीं मानता था। इस दासी पुत्र बनवीर सिंह ने सन 1536 से लेकर 1540 ईस्वी तक मेवाड़ के शासक के रुप में शासन किया था। चित्तौड़गढ़ के दुर्ग में स्थित माता तुलजा भवानी मंदिर और नवलखा महल का निर्माण बनवीर सिंह द्वारा करवाया गया था। बनवीर अपने आपको मेवाड़ के उत्तराधिकारी के रूप में प्रारंभ से ही देखता था। वह अपनी स्थिति पर दुखी रहता था और मेवाड़ के महाराणाओं के प्रति उसके हृदय में कटुता का भाव विद्यमान था। वह गुजरात के शासक मुजफ्फर के पास भी रहा था। सुल्तान ने उसे वागड़ का प्रदेश जागीर में दे दिया था। बनवीर अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए युक्तियां खोजता रहता था।

अत्याचारी बनवीर के कुकर्म

  एक दिन उचित अवसर देखकर उसने महाराणा विक्रमादित्य सिंह उपनाम विक्रमाजीत की हत्या कर दी।बनवीर बहुत ही दुष्ट प्रवृत्ति का था। उसके भीतर अत्याचार की भावना कूट-कूट कर भरी थी । उसके भीतर भी शासक का ऐसा कोई गुण नहीं था  जिस पर मेवाड़ को गर्व हो सकता था। उसने अपने आप को मेवाड़ का शासक तो घोषित कर दिया परंतु वह मेवाड़ की जनता में कभी लोकप्रिय नहीं हो सका। इसका कारण केवल एक था कि उसके भीतर घमंड की भावना बहुत अधिक थी। कुछ समय उपरांत ही वह अपने सामंतों व अधिकारियों के साथ अत्याचार करने लगा। इसी प्रकार अपने प्रजाजनों पर भी उसकी कोप दृष्टि शीघ्र ही दिखाई देने लगी। मेवाड़ के लोग उसके विरोधी हो गए और उससे शीघ्र ही मुक्ति पाने की योजना बनाने लगे। बनवीर ने महाराणा विक्रमाजीत के छोटे भाई 15 वर्षीय उदय सिंह को भी मारने का प्रयास किया था, परंतु उसे वीर माता पन्नाधाय अपनी युक्ति से बचाने में सफल हो गई थी। यद्यपि मेवाड़ के प्रजा जन अभी यही समझ रहे थे कि उदय सिंह का भी अंत हो गया है। परंतु शीघ्र ही उन्हें पता चल गया कि उदयसिंह जीवित है। पन्नाधाय के बलिदान और उदय सिंह को गद्दी पर बिठाने की घटनाओं का हम आगे चलकर यथा स्थान वर्णन करेंगे। 
  जब मेवाड़ के सामंतों को राणा उदय सिंह के जीवित होने का समाचार मिला तो वह उन्हें सम्मानपूर्वक मेवाड़ ले आए। मेवाड़ में लाकर राणा उदय सिंह का और बनवीर का संघर्ष हुआ। सन 1540 में उदय सिंह कई सामंतों जिनमें अखेराज, सोनगरा जैसे मुख्य सामंत सम्मिलित थे, के साथ सेना लेकर चित्तौड़ की ओर बढ़ने लगे। बनवीर ने राणा उदय सिंह के नेतृत्व में मेवाड़ की ओर बढ़ती चली आ रही इस सेना का सामना करने के लिए कुंवरसी तंवर के नेतृत्व में एक सेना का गठन किया और उसे राणा उदय सिंह की सेना से लोहा लेने के लिए भेजा।महाराणा उदयसिंह द्वितीय और कुंवरसी तंवर के मध्य मावली के पास स्थित महोली नामक गांव में एक भयंकर युद्ध हुआ । इस युद्ध में बनवीर का सेनापति कुंवरसी तंवर मारा गया। उसके पश्चात भी कुछ समय तक बनवीर और राणा उदय सिंह की सेनाओं के बीच संघर्ष चला परंतु अंत में राणा उदयसिंह  ने बनवीर अंत करने में सफलता प्राप्त की। इसके पश्चात मेवाड़ के सामंतों ने उन्हें अपना राजा घोषित कर दिया। कई इतिहासकारों की यह भी मान्यता है कि बनवीर इस युद्ध में मारा नहीं गया था अपितु वह मेवाड़ छोड़कर कहीं दूर चला गया था।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

(हमारी यह लेख माला आप आर्य संदेश यूट्यूब चैनल और “जियो” पर शाम 8:00 बजे और सुबह 9:00 बजे प्रति दिन रविवार को छोड़कर सुन सकते हैं।)

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