इस मंत्र के पश्चात ‘अघमर्षण मंत्र’ आते हैं। इनमें ईश्वर की सृष्टि रचना का चिंतन किया जाता है, अर्थात हम और भी गहराई में उतर जाते हैं। जिस आनंद की अभी तक झलकियां मिल रही थीं, हम उन्हें पकड़ते हैं और कुछ अबूझ पहेलियों के उत्तर खोजने लगते हैं।
पहला मंत्र है-
ओ३म् ऋतं च सत्यं चाभीद्घात्
तपसो अध्यजायत्।
ततो रात्र्य जायत तत: समुद्रो अर्णव:।।
”उसी अनंत ज्ञानमय तथा सब प्रकार से प्रकाशमान परमात्मा की अनंत सामथ्र्य से वेद और त्रिगुणात्मक प्रकृति उत्पन्न हुई। उसी की शक्ति से महाप्रलय तथा सर्वत्र आकाश में जल उत्पन्न हुआ।” अघमर्षण का यह पहला मंत्र है। जिसमें परमपिता परमेश्वर अनंत ज्ञानमय कहा गया है, सारे ज्ञान-विज्ञान का स्रोत वह परमात्मा ही है। इसलिए इस सृष्टि आदि की उत्पत्ति का सामथ्र्य और ज्ञान भी उसी के पास है। यह ज्ञान-विज्ञान अन्य किसी के पास होना संभव ही नहीं है। इस सृष्टि को और प्रकृति को ईश्वर ने त्रिगुणात्मिका बनाया, इसमें भी उसका विज्ञान छिपा है और साथ ही साथ हम सब प्राणियों के कल्याण का भाव छिपा है। उसने वेद हमें दिये-जिससे कि हमारा कल्याण हो सके। वेद के माध्यम से सृष्टि की उत्पत्ति का अपना सारा रहस्य और कारण स्पष्ट कर दिया। एक प्रकार से वेद भगवान देकर ईश्वर ने प्रत्येक मनुष्य को ही अपना प्रतिनिधि बनाकर धरती पर भेजा।
यह उस परमपिता परमात्मा का कितना बड़ा उपकार था कि उसने वेदज्ञान देने में किसी के साथ पक्षपात नहीं किया। जो लोग ईश्वर के अवतार रूप में आने की बात करते हैं- वे सचमुच अज्ञानी हैं। यह मंत्र कह रहा है कि जिसके भी हाथ में वेद आ गया और जिसने भी उस परमपिता परमात्मा के रहस्यों को और ज्ञान-विज्ञान को समझना आरंभ कर दिया, वही उसका प्रतिनिधि या अवतार हो गया। यद्यपि यह रहस्य बड़ा व्यापक है और उसका प्रतिनिधि बनना हर किसी के वश की बात नहीं है। पर फिर भी ईश्वर की कृपा तो देखिये कि उसने तो अपनी ओर से हम सबको ही वेदाधिकार देकर धरती पर भेजा है। यहां ‘अवतार’ की बात कहकर हमने किसी प्रकार के ‘अवतारवाद’ को युक्ति युक्त नहीं ठहराया है, पाठक सकारात्मक भाव से ही अर्थ ग्रहण करें।
इसके पश्चात अगला मंत्र है –
ओ३म् समुद्रादर्णवादधि
संवत्सरो अजायत्।
अहोरात्राणि विद्दध्
विश्वस्य मिषतो वशी।।
भावार्थ : सकल संसार को उत्पन्न करके अपने वश में रखने वाला परमपिता परमेश्वर है। उसने समस्त संसार की उत्पत्ति कर अपने सहज स्वभाव से जलकोष रचने के अनन्तर काल के विभाग, दिन-रात तथा वर्षादि उत्पन्न करने वाले रवि को रचा। कहने का अभिप्राय है कि यदि रवि अर्थात सूर्य नहीं होता तो संसार निरर्थक था। अत: संसार को सार्थक बनाने के लिए ही सूर्य की रचना की गयी। संसार चक्र की बिना सूर्य के कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए इस मंत्र में भी साधक अपने चिंतन की गहराई में उतरता है और तब उसे पता चलता है कि इस सृष्टि की सार्थकता कैसे है?
अगला मंत्र है-
ओ३म् सूर्याचन्द्रमसौ
धातायथापूर्वमकल्पयत्।
दिवं च पृथिवी
चान्तरिक्षमथो स्व:।।
साधक कह रहा है कि उस परमपिता परमेश्वर ने यह सृष्टि उसी प्रकार उत्पन्न की जिस प्रकार पूर्व कल्पों में सूर्यचंद्रादि उत्पन्न किये थे और उस समय की सृष्टि की रचना की थी। कल्प से कल्प पीछे हटते जाइये, सृष्टि रचना का क्रम एक जैसा ही मिलेगा अर्थात ईश्वरीय ज्ञान सदा अपरिवर्तनीय रहता है। सनातन रहता है। मंत्र का ऋषि सृष्टि रचना की सूचना दे रहा है और साधक उस पर चिंतन कर रहा है। इस मंत्र के विषय में पं. रघुनंदन शर्मा जी ‘वैदिक संपत्ति’ में लिखते हैं-”एक आर्य बालक आचार्यकुल में जाकर यज्ञोपवीत के दिन से ही सन्ध्योपासना के समय ‘सूर्या चन्द्रमसौधाता यथा पूर्वंकल्पयत्’ का पाठ नित्य पढ़ता है और गुरूमुख से नित्य इसका अर्थ सुनता है कि इस सूर्य चन्द्रादि सृष्टि को परमात्मा ने उसी प्रकार बनाया है-जिस प्रकार इसके पूर्व भी वह अनेकों बार बना चुका था। इस नित्य के श्रवणाध्ययन से धीरे-धीरे विद्यार्थी को सृष्टि के कारणों का और उसके उत्पत्ति क्रमों का ज्ञान होने लगता है।”
इस प्रकार विश्वगुरू भारत की वैदिक संध्या भी साधक को बहुत कुछ स्पष्ट कर देती है और उसके ज्ञान को बहुत ऊंचाई से लेकर आगे बढ़ती है। जिनका सहज संवाद इतना ज्ञान भरा हो कि वे इस सृष्टि की उत्पत्ति का रहस्य जानते हों, उन्हें तो विश्व समाद्रत करेगा ही।
अब आते हैं मनसा परिक्रमा मंत्रों पर।
ओ३म् प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो
रक्षिता दित्या इषव:। तेभ्यो नमो अधिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु:। यो अस्मान द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्म:।
वैदिक सन्ध्या में मनसा परिक्रमा के मंत्रों का भी विशेष महत्व है। इन मंत्रों में साधक ईश्वर की गोद में बैठा-बैठा सभी दिशाओं में परिक्रमा करने का पुरूषार्थ करता है। उसे सर्वत्र अपने प्यारे प्रभु की ज्योति दिखायी देती है और आनंदमयी मां की गोद में बैठा-बैठा वह उसके विभिन्न रूपों का दर्शन करते हुए आनंद लेता है। वह परमपिता परमात्मा के साथ अपना तारतम्य स्थापित कर लेता है और अपने आपको उसके साथ और परमपिता परमात्मा को अपने साथ अनुभव कर रहा होता है। सारे संसार से उस समय सम्पर्क टूट जाता है, और साधक वर्णनातीत सुख की अनुभूति करता है।
हमारे यहां पौराणिक मंदिरों और तीर्थ स्थानों पर देवी-देवताओं की परिक्रमा लगाने का प्रचलन है। वह प्रचलन वास्तव में इसी ‘मनसा परिक्रमा’ का ही बिगड़ा हुआ रूप है। मनसा परिक्रमा शारीरिक रूप से की गयी परिक्रमा की अपेक्षा कठिन है, इसलिए मनुष्य ने बड़ी सहजता से अपने आपको कठिनता से सरलता की ओर भटका लिया है।
इस मंत्र का भावार्थ है-
वह ज्ञानस्वरूप परमेश्वर पूर्व दिशा अथवा सामने की ओर का स्वामी है। वेद का ऋषि पूर्व की दिशा में ज्ञानस्वरूप परमेश्वर की इस रूप में उपासना कर रहा है कि जैसे पूर्व दिशा सूर्योदय के माध्यम से हम सबको प्रकाश प्रदान करती है वैसे ही परमपिता परमेश्वर भी हमें ज्ञान का प्रकाश प्रदान करते हैं। अत: ईश्वर पूर्व की दिशा में इसी रूप में विराजमान है। वह ज्ञान स्वरूप परमेश्वर सभी बंधनों से मुक्त है। वेद ईश्वर को कामनाओं से परे मानता है और यह सच भी है जो स्वयं ही ज्ञानस्वरूप है-वह कामनाओं के बंधन से मुक्त ही रहेगा। उसे संसार की कोई भी कामना घेर नहीं सकती। कामनाएं मरणधर्मा शरीर को घेरती हैं, इसलिए कामनाएं इस शरीर का विषय हो सकती हैं। वह ईश्वर जन्म-मरण और शरीर धारण के विकारों से परे है, इसलिए वह कामनाओं से भी मुक्त है। वह ईश्वर अमृत है, और रसों से तृप्त है उसे किसी प्रकार के रस की आवश्यकता नहीं है। वही परमात्मा हम सबका रक्षक है। सूर्य की किरणें उसकी रक्षा के साधन हैं। इन सब स्वामियों को बार-बार नमस्कार हो।

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