विश्वगुरू के रूप में भारत-54 

(5) सर्वकल्याण था भारत का धर्म
अन्त्योदयवाद और सर्वोदयवाद भारत के आदर्श रहे हैं। ऐसी उत्कृष्ट सांस्कृतिक भावना की रक्षा करना भी भारत का धर्म था। विदेशी लुटेरे शासक डाकू समूह के रूप में उठे और विश्व के कोने-कोने में फैल गये। उनका कार्य उस समय लूटमार और हिंसा हो गया था। इन आतंकी समूहों के ऐसे कृत्यों से विश्व में अशान्ति और अराजकता व्याप्त हो गयी। जब यह अंधड़ भारत में घुसा तो अपने अतीत की गौरवपूर्ण अनुभूतियों में जीने वाले भारत ने इस अंधड़ का जमकर प्रतिकार किया। इस अंधड़ का उद्देश्य था भारत के अन्त्योदयवाद और सर्वोदयवाद का विनाश कर देना और यह भारत को स्वीकार्य नहीं था। विदेशी आततायी आक्रांताओं ने जब-जब संहारों के कीत्र्तिमान स्थापित किये तो भारत को अपने सात्विक धर्म की मूलभावना के विपरीत होते इस निंदनीय कृत्य को देखकर असीम पीड़ा हुई। पर यह भारत ही था जिसने अनेकों नरसंहारों को सहन किया और प्रतिशोध स्वरूप बड़े-बड़े युद्घों का आयोजन किया। यह माना जा सकता है कि इन युद्घों में भारत की अपरिमित हानि हुई और देश की अखण्डता भी प्रभावित हुई पर अंतिम विजय भारत की हुई और वह स्वाधीनता लेकर रहा। किसी भी युद्घ के पश्चात युद्घ का आंकलन करना अनिवार्य होता है। आंकलन में हमें देखना चाहिए कि युद्घ किस उद्देश्य को लेकर लड़ा गया? जिन लोगों ने अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी वह कहीं अधिक उत्तम होते हैं अपेक्षाकृत उन लोगों की जिन्होंने किसी की स्वतंत्रता का अपहरण करने के लिए लड़ाई लड़ी। इस दृष्टिकोण से भारत के वीर योद्घाओं को भी अधिक सम्मान मिलना चाहिए।
(6) संस्कृति के प्रतीकों की रक्षा करना हर भारतीय ने अपना कत्र्तव्य माना
जब भारत पर विदेशी आक्रांता बार-बार आक्रमण कर रहे थे तब वे भारत की संस्कृति को भी उजाडऩे का कार्य कर रहे थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्रतीक धार्मिक स्थलों यथा रामजन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि, सोमनाथ आदि को भी नष्ट करने का कार्यारम्भ किया। यह कृत्य भारतीयों को अपनी आत्मा पर किया गया कुठाराघात सा लगा। जिससे वे ऐसे आततायियों के विरूद्घ कहीं सामूहिक रूप से तो कहीं अकेले रहकर टूट पड़े। इस भावना ने भी भारतीयों को दीर्घकालीन स्वाधीनता आंदोलन चलाने के लिए प्रेरित किया। जब एक विदेशी आक्रांता ने हमारा करांची का विशाल मंदिर तोड़ा या लूटा तो उसे बचाने के लिए सारा देश उठ खड़ा हुआ। जब सोमनाथ के मंदिर को तोड़ा गया तो वहां भी बड़ी संख्या में लोगों ने अपना अपना बलिदान दिया और जब राममंदिर तोड़ा गया तो वहां भी लोगों ने लाखों की संख्या में अपना बलिदान दिया। ये बलिदान अपने लिए नहीं दिये गये थे और ना ही अकेले अपने धर्म व संस्कृति की रक्षार्थ ही दिये गये थे अपितु ये मानवता को दानवतावाद से बचाने के लिए भी दिये गये थे। हमारा मानना है कि इन युद्घों का इसी प्रकार पुर्नमूल्यांकन होना चाहिए। विश्व को यह संदेश देने के लिए ये बलिदान दिये गये कि किसी की भी धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाना गलत है, और अब तक भारत की संस्कृति से अनुशासित विश्व समुदाय को यह बात भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि इस प्रकार की दानवता का यदि प्रतिरोध नहीं किया गया तो यह मानवता के लिए बहुत ही घातक सिद्घ होगा।
(7) एकात्म मानववाद की स्थापना के लिए किया गया संघर्ष
भारतीय स्वातंत्र्य समर भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण अंग-एकात्ममानववाद की रक्षार्थ भी लड़ा गया। संपूर्ण विश्व को भारत ने एक ईकाई के रूप में देखा है और संपूर्ण वसुधा को एक परिवार माना है।
एक ईकाई को संयुक्त होकर और पारिवारिक भावना से एक दूसरे के साथ बांध दिया जाना ही एकात्ममानववाद है। जिसमें हर व्यक्ति एक दूसरे के भीतर एक ही आत्मतत्व को देखता है और मानता है कि जिस ज्योति से मैं स्वयं ज्योतित हूं वही ज्योति आप में भी है और वही हर प्राणी के भीतर है। सृष्टि के कण-कण में वही ज्योति प्राण बनकर संचार कर रही है। संसार की सारी गति और सारी प्रक्रिया उसी प्राणतत्व से गतिशील है तो उसे लेकर विखण्डन क्यों और उसके नाम पर मारकाट क्यों? यह प्रश्न था भारतीयों के भीतर जो उन्हें प्राचीन काल से राक्षसों से संघर्ष कर अपनी एकात्ममानववादी संस्कृति की रक्षा के लिए प्रेरित करता रहा था। जब संसार में राक्षस प्रवृत्ति बलवती हुई तो भारत ने उसका प्रतिशोध करने का निर्णय लिया। भारत का संस्कार था कि संसार के प्राणियों के लिए आश्रय, गृह, उद्यान, कुआं, बगीचा, धर्मशाला, प्याऊ आदि बनवाकर उनकी सेवा की जाए, परोपकार के माध्यम से अपनी एकात्ममानवतावादी संस्कृति की रक्षा की जाए। इस प्रकार यज्ञोमयी संस्कृति की रक्षा करना भारत की मौलिक चेतना में रचा बसा संस्कार था। जिसे उजड़ता देखना किसी भी भारतीय के वश की बात नहीं थी।
(8) राक्षसी संस्कृति को मिटाना भारत का लक्ष्य रहा है
प्राचीनकाल से ही भारत की संस्कृति ने राक्षसी संस्कृति को मिटाना अपना उद्देश्य घोषित किया है। भारत ने विश्व को संदेश दिया है कि सारे संग्रहों का अंत विनाश है। सारी उन्नतियों का अंत पतन है, संयोग का अंत वियोग है और जीवन का अंत मरण है। उत्थान और पतन को स्वयं ही प्रत्यक्ष करके देखकर यह निश्चय करें कि यहां सब कुछ अनित्य और दु:खस्वरूप है। इसलिए इस अनित्य और दु:खस्वरूप संसार की धनसंपदा पर लडऩा झगडऩा और यहां रहकर उपद्रव उत्पन्न करना पाप है और जो लोग इस अनित्य और दु:खस्वरूप संसार के धनादि को लेकर उपद्रव करते हैं वे संसार की मुख्यधारा में अवरोध उत्पन्न करने वाले होने से राक्षस प्रवृत्ति के आतंकवादी हैं। जिन्हें साम, दाम, दण्ड, भेद से किसी भी प्रकार से मिटाना उचित ही है। जिससे कि अहिंसक और शांत समाज की रक्षा हो सके। भारत अहिंसा की रक्षार्थ हिंसा का समर्थक देश रहा है और हिंसावृत्ति को मिटाकर अहिंसक समाज का निर्माण करना उसका राष्ट्रीय संस्कार रहा है। अपने इन मूल्यों की रक्षार्थ भी उसने अपना दीर्घकालीन स्वातंत्रय समर लड़ा था। यह राक्षसी प्रवृत्ति के लोग जब भारत में आये तो उन्होंने हमारी नारी शक्ति पर भी अमानवीय अत्याचार ढहाये। ये अत्याचार भारत के लोगों के लिए सर्वथा नया अनुभव था।
ऐसा उन्होंने अब से पूर्व महाभारत जैसे भयानक युद्घ में भी नहीं देखा था। जो लोग हमारे पूर्वजों को कायर कहते हैं उनहें सोचना चाहिए कि ये तथाकथित कायर लोग ही अपनी मातृशक्ति के सम्मान की खातिर युद्घ के मैदान में तलवारें लेकर विदेशियों से लड़ते रहे। नारी शक्ति के सम्मान के लिए इतना दीर्घकालीन स्वतंत्रता संग्राम संसार के किसी भी देश के इतिहास में नहीं चला जितना भारत के इतिहास में चला है।
इस प्रकार भारत का स्वाधीनता संग्राम पूर्णत: मानवीय गरिमा, नारी का सम्मान, राष्ट्रीय स्वाभिमान, अपने सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षार्थ लड़ा गया युद्घ था। जिसे हर भारतीय ने बड़ी वीरता से लडऩे का संकल्प लिया। इस स्वाधीनता संग्राम को देखकर विदेशियों को भी प्रेरणा मिली। जब यूरोपियन लोग विश्व में अपने-अपने उपनिवेश बनाकर उपनिवेशों के लोगों का रक्त चूस रहे थे और उन पर मनमाना अत्याचार कर रहे थे तब भारत के स्वाधीनता संग्राम ने उन उपनिवेशों के मूल निवासियों को विदेशियों के अत्याचारों के विरूद्घ आवाज उठाने की प्रेरणा दी।
भारतीयों के विषय में मि. एलफिंस्टन का कथन है-”अन्य दुराचारों के अभाव के साथ-साथ उनमें शराब पीने एवं निर्लज्जता का पूर्णत: अभाव है। इससे उनके आचरण की पवित्रता एवं उच्चता का प्रभाव दिखता है। इनमें चापलूसी का सर्वथा अभाव है। ….हमारे यहां के शहरों व कस्बों में जितने पतित लोग दिखायी देते हैं हिंदुओं के किसी भी वर्ग में इतने पतित लोग नहीं हैं।”
क्रमश:

Comment:

betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş
galabet giriş
galabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
galabet giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
Betgar güncel
Betgar giriş
Betgar giriş adresi
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
betnano
betnano giriş
norabahis giriş