ऋषि दयानन्द के जीवन के प्रमुख महान कार्य

ऋषि दयानन्द के जीवन एवं कार्यों का देश व विश्व में समुचित व यथार्थ मूल्यांकन नहीं हुआ है। इसका प्रमुख कारण लोगों की सत्य जानने के प्रति उपेक्षा, स्व-स्व मत-मतान्तरों के प्रति अनुचित आदर भाव और भौतिक सुखों की प्राप्ति आदि प्रमुख कारण प्रतीत होते हैं। यदि देश व विश्व के लोगों में सत्य के जानने की तीव्र लालसा व इच्छा शक्ति होती और स्व-स्व मतों का आग्रह न होता, वह सत्य के ग्रहण और सत्य के त्याग की भावना से युक्त होते तो आज संसार में ऋषि दयानन्द को संसार में अब तक हुए महापुरुषों में सबसे श्रेष्ठ व ज्येष्ठ स्थान दिया जाता। हमारा सौभाग्य है कि एक पौराणिक और अल्पशिक्षित व अशिक्षित परिवार में जन्म लेकर भी हम आर्यसमाज से जुड़ सके और ऋषि दयानन्द के जीवन व साहित्य के द्वारा हम इस संसार और मनुष्य जीवन को उसके यथार्थ सत्य स्वरूप में जान सके। आज हमने इन विषयों की एक आर्यमित्र से भी चर्चा की और दोनों में ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज विषयक जो चर्चायें हुई उसमें यही निष्कर्ष सामने आया कि हम आर्यसमाज के अनुयायी अन्य मत-मतान्तरों एवं नास्तिकों की तुलना में कहीं ज्यादा भाग्यशाली हैं कि जिन्हें ईश्वर, जीव व प्रकृति सहित संसार और ईश्वर प्राप्ति के साधनों एवं साथ ही यज्ञ, योग, परोपकार, शाकाहारी जीवन, प्राणियों पर दया व उनकी रक्षा आदि का तथ्योक्त ज्ञान है। हमने यह भी अनुभव किया कि हमारी जो वर्तमान स्थिति है, वह ऐसी कदापि न होती यदि हम ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज से न जुड़ते। 
ऋषि दयानन्द का यह महत्व किस कारण से है? इस पर विचार करें तो इसका कारण ऋषि दयानन्द को इस सृष्टि के सभी विषयों का सत्य ज्ञान, देश व समाज के हित में उनका प्रचार व उनकी विश्व के कल्याण की भावना थी। महाभारत काल के बाद और ऋषि दयानन्द से पूर्व अनेक महापुरुष हुए, वह विद्वान भी पर्याप्त थे और उन्होंने प्रचार भी किया परन्तु वह ईश्वर, जीवात्मा तथा संसार विषयक उस ज्ञान को प्राप्त नहीं हो सके जो ऋषि दयानन्द ने प्राप्त किया था व उसका देश देशान्तर में प्रचार किया। ऋषि दयानन्द को यह ज्ञान अपने योग व ब्रह्मचर्य के बल सहित गुरु विरजानन्द सरस्वती की शिक्षा व वेदों के अध्ययन, अनुसंधान व सत्य अर्थों से प्राप्त हुआ जो महाभारत काल के कुछ काल बाद हुए ऋषि जैमिनी के अतिरिक्त किसी अन्य विद्वान को प्राप्त नहीं हुआ था। ऋषि जैमिनी जी ने भी मीमांसा दर्शन का प्रणयन तो किया परन्तु उन्हें वेदों के प्रचार प्रसार का वह कार्य नहीं किया, तब सम्भवत: इसकी आवश्यकता नहीं थी, जो ऋषि दयानन्द ने किया जिसके कारण आज हमारे पास वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण व महाभारत आदि अनेक ग्रन्थों के हिन्दी में सत्यार्थ भी उपलब्ध है। ऋषि दयानन्द जिस काल में उत्पन्न हुए वह घोर अविद्या का काल होने के साथ उन दिनों हमारा देश अंग्रेजों के पराधीन था। इससे पूर्व भी देश मुस्लिम शासकों का परतन्त्र रहा जिनके काल में भारत को अपना सर्वस्व नष्ट करना पड़ा। धन्य हैं हमारे वह पूर्वज जिन्होंने बाबर और औरंगजेब आदि क्रूर शासकों के काल में भी अपने धर्म और संस्कृति को सुरक्षित रखा। ऋषि दयानन्द ने शिवरात्रि के व्रत, अपनी बहिन व चाचा की मृत्यु के कारण उत्पन्न वैराग्य से प्रभावित होकर अपने माता-पिता व घर छोडक़र ईश्वर व सत्य विद्याओं का अनुसंधान व खोज की। उन्होंने लगभग 16 वर्ष इस कार्य में लगाये। उन्होंने ईश्वर व जीवात्मा के सच्चे स्वरूप को जानकर गुरु विरजानन्द, मथुरा के परामर्श वा आज्ञा सहित अपनी निज इच्छा से भी संसार से अविद्या का नाश कर वेदों के रूप में सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर प्रदत्त ज्ञान का जन-जन में प्रचार का अभियान व आन्दोलन आरम्भ किया। सत्य के प्रचार के लिए उन्होंने मिथ्या विश्वासों मूर्तिपूजा, अवतारवाद, जन्मा जातिव्यवस्था, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं का खण्डन किया व विरोधियों से शास्त्रार्थ किये। इसका परिणाम यह हुआ कि देश व विश्व में वैचारिक क्रान्ति का जन्म हुआ और सभी मत-मतान्तरों को अपनी अपनी कमियों व खामियों का ज्ञान भी हुआ अन्यथा वह शास्त्रार्थ की चुनौती स्वीकार कर ऋषि दयानन्द की चुनौतियों का उत्तर देते। उत्तर नहीं दिया व न दे सके, यह इस बात को बताने के लिए पर्याप्त है कि उनके पास ऋषि दयानन्द द्वारा मत-मतान्तरों से पूछे गये प्रश्नों व आक्षेपों के उत्तर थे ही नहीं। आश्चर्य है कि आज भी वह सभी व उसके बाद भी उत्पन्न मत-मतान्तर पहले से भी अधिक अन्धविश्वासों के साथ समाज में प्रतिष्ठित हैं व फल-फूल रहे हैं।
ऋषि दयानन्द का पहला प्रमुख कार्य तो उनका गुरु विरजानन्द जी से आर्ष शिक्षा को प्राप्त करना था जिससे वह वेदों के यथार्थ स्वरूप सहित वेद मन्त्रों के यथार्थ अर्थ जान सके। यदि यह न हुआ होता तो फिर ऋषि दयानन्द, दयानन्द व स्वामी दयानन्द ही रहते जैसे कि आज अनेकानेक साधु संन्यासी व विद्वान हैं। कोई उनको जानता भी न। गुरु विरजानन्द जी की शिक्षा ने उन्हें संसार के सभी विद्वानों से अलग किया जिसका कारण उनकी प्रत्येक मान्यता का आधार वेद सहित सत्य व तर्क पर आधारित होने के साथ उनका सृष्टि क्रम के अनुकूल होना भी है। ऋषि दयानन्द के जीवन का दूसरा प्रमुख कार्य हमें उनके द्वारा सत्य के रहस्यों का उद्घाटन करने वाला विश्व प्रसिद्ध, विश्व साहित्य में अनुपमेय, न भूतो न भविष्यति प्रकार के ग्रन्थ ‘सत्यार्थप्रकाश’ का प्रणयन है। सत्यार्थप्रकाश ने हमें सत्य व असत्य की पहचान बताई। मत-मतान्तरों में क्या असत्य है औरे क्या सत्य, यह भी सत्यार्थप्रकाश के अध्ययन से ही ज्ञात हो सकता है व हुआ है।
सत्यार्थप्रकाश से ईश्वर, जीवात्मा व सृष्टि के मूल स्वरूप के ज्ञान सहित मूल प्रकृति की विकृति इस संसार का यथार्थ ज्ञान भी होता है। समाज व्यवस्था कैसी हो, इसकी चर्चा करते हुए ऋषि दयानन्द मनुष्य के परिवेश व जन्म की महत्ता को महत्व न देते हुए मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव, उसके चरित्र व कार्यों तथा उसकी सुशीलता आदि गुणों को महत्व देते हैं और सबके लिए वेदों पर आधारित पक्षपात से रहित समान शिक्षा व अध्ययन को महत्व व प्राथमिकता देते हैं।
स्वामी जी संस्कृत और आर्यभाषा हिन्दी को अंग्रेजी से अधिक महत्व देते हैं जो कि उचित ही है। गोरक्षा का महत्व बताते हैं। उससे होने वाले आर्थिक व स्वास्थ्य विषयक लाभों की चर्चा करते हैं और गोहत्या व गोमांसाहार को पाप व अमानवीय बताकर उसका निषेध करते हैं। स्वामी जी विचारों की स्वतन्त्रता के पक्षधर थे परन्तु आजकल की तरह देश विरोधी बातें करने को वैचारिक स्वतन्त्रता न मानकर इसे दण्डनीय अपराध मानते थे, ऐसा उनके साहित्य को पढक़र विदित होता है। सत्यार्थप्रकाश को पढक़र हिन्दू व आर्य वैदिक धर्म की श्रेष्ठता से परिचित हो जाते हैं और वह ईसाई व मुसलमानों के धर्मान्तरण व इस प्रकार की गतिविधियों में फंसने से बच जाते हैं। इसके विपरीत आर्यसमाज के विद्वान वेदों व वैदिक धर्म की सच्चाई व श्रेष्ठता का प्रचार कर दूसरे मतों के निष्पक्ष लोगों को वैदिक धर्म के सिद्धान्तों को स्वीकार करने में भी सफल हो जाते हैं। यही कारण है कि आज किसी मत के विद्वान में वैदिक मान्यताओं पर आक्षेप करने का न साहस है और न योग्यता। वह जो करते हैं वह सब परदे के पीछे छुप कर करते हैं। सत्यार्थप्रकाश के स्वाध्याय व अध्ययन से मनुष्य सच्चा मनुष्य जीवन जीने का लाभ प्राप्त करता है और ईश्वर, जीवात्मा सहित संसार को जानकर ईश्वर प्राप्ति के लक्ष्य व उसके साधनों को भी जानकर ईश्वर को सन्ध्या, यज्ञ, वेद व सत्यार्थप्रकाश आदि का स्वाध्याय करके प्राप्त कर लेता है। वह मांसाहार, नशा, अंडे, मछली, तले व फास्ट फूड आदि तामसिक पदार्थों के सेवन से बचता है और औरों की तुलना में स्वस्थ व अल्प व्यय में सुख व शान्ति का जीवन व्यतीत करता है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनका उल्लेख किया जा सकता है। पाठक स्वयं सत्यार्थप्रकाश का पाठ कर इन बातों की सत्यता की परीक्षा कर सकते हैं।
ऋषि दयानन्द के जीवन का तीसरा महत्वपूर्ण कार्य आर्यसमाज की स्थापना है। ऋषि दयानन्द ने 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई के गिरिगांव मोहल्ले के काकड़वाडी में प्रथम आर्यसमाज की स्थापना की थी। आर्य समाज के उद्देश्य, नियम व सिद्धान्त संसार में अद्वितीय व सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि आर्यसमाज स्थापित न हुआ होता तो वैदिक धर्मियों का संगठन न बनता।
आर्यसमाज की स्थापना से आज तक विद्वानों ने संगठित होकर जो कार्य किये हैं, वह भी न होते और हमें आर्यसमाज से जुडऩे के कारण जो अकथनीय लाभ हुए हैं, वह हमें व हमारे दूसरे बन्धुओं को भी न होते। आर्यसमाज की स्थापना हो जाने पर ऋषि दयानन्द जी के अनुयायियों ने स्वामी जी को साधन उपलब्ध कराये। वह देश भर मे प्रचारार्थ घूमें और इसके साथ ही समय समय पर पंचमहायज्ञविधि, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका सहित वेदभाष्य, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, गोकरूणाविधि, व्यवहारभानु, आत्माकथा आदि का लोखन व परोपकारिणी सभा की स्थापना आदि कार्य किये, यह कार्य भी आर्यसमाज की स्थापना के परिणाम से हुए। ऋषि दयानन्द की मृत्यु के बाद विद्वानों ने आर्यसमाज के अन्तर्गत संगठित होकर वेदभाष्य व अनेकानेक ग्रन्थ लेखन सहित वेद प्रचार का जो महनीय कार्य किया वह भी न होता। अत: आर्यसमाज की स्थापना ऋषि दयानन्द का एक महत्वपूर्ण कार्य है जो इस सृष्टि के अन्तिम समय अर्थात् प्रलय तक अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए असत्य का खण्डन और सत्य का मण्डन व प्रचार करता रहेगा। इसी में संसार, प्रत्येक मनुष्य व प्राणीमात्र का हित व कल्याण जुड़ा हुआ है।
देश की आजादी का सम्पूर्ण व अधिकांश श्रेय भी ऋषि दयानन्द व आर्यसमाज के सत्य के प्रचार को ही जाता है। परतन्त्रता के काल में आर्यसमाज ने ही देश में डीएवी स्कूल व कालेजों सहित गुरुकुल खोलकर शिक्षा जगत में क्रान्ति की थी। आर्यसमाज ने ही देश को स्वामी श्रद्धानन्द, श्यामजी कृष्ण वर्मा, महात्मा हंसराज, लाला लाजपतराय, रामप्रसाद बिस्मिल, भाई परमानन्द, महादेव गोविन्द रानाडे, शहीद भगतसिंह सहित अनेक देशभक्त, धर्म व संस्कृति के शीर्ष विद्वान व योद्धा दिये। आर्यसमाज की स्थापना का ही सुपरिणाम है कि आज देश स्वतन्त्र है।
ऋषि दयानन्द की बातों को पूरा पूरा न मानने के कारण ही आज देश में अनेक गम्भीर समस्यायें हैं। यदि ऋषि दयानन्द जी की सभी बातों को देशवासियों ने मान लिया होता तो आज देश की मुख्य समस्यायें न होती। वेदों के ज्ञान से शून्य पठित लोग जब देश संबंधी राजनैतिक दृष्टि से निर्णय करते हैं तो उसमें अनेक खामियां होती है और वह गलत भी हो जाते हैं। आवश्यकता वेदों के ज्ञान के प्रचार व वैदिक जीवन व्यतीत करने की है जिससे हम अच्छे नागरिक बनकर देश को सशक्त व मजबूत कर सकें और देश के सभी आन्तरिक व बाह्य शत्रुओं पर विजय पा सकें। इसके लिए देशवासियों में दृण इच्छा शक्ति का होना आवश्यक है जो सत्य व न्याय पर आधारित हो। इसी के साथ इस लेख को विराम देते हैं। इति ओ3म् शम।

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