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कृषि जगत

रसायनों से जहरीली होती जमीन

हाल ही में महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में कीटनाशक की चपेट में आकर अठारह किसानों और खेत में काम कर रहे मजदूरों की मौत हो गई है। बीते बीस दिनों के दौरान कोई पांच सौ किसान और श्रमिक अस्पताल में भर्ती हुए हैं। असल में, इस इलाके में कपास की खेती होती है। इस बार कपास में गुलाबी की?े (पिंक बोलवर्म) आ गए हैं। मजबूरन किसानों ने प्रोफेनोफॉस जैसे जहरीले कीटनाशक का छिडक़ाव किया। छिडक़ाव के लिए उन्होंने चीन में बने ऐसे पंप का इस्तेमाल किया, जिसकी कीमत कम थी और गति ज्यादा। किसान नंगे बदन खेत में काम करते रहे, न दस्ताने, न नाक-मुंह ढंकने की व्यवस्था। 
तिस पर तेज गति से छि?काव वाला पंप। दवा का जहर किसानों के शरीर में समा गया। कई की आंखें खराब हुर्इं तो कई को त्वचा रोग हो गए। हमारे देश में हर साल कोई दस हजार करोड़ रुपए के कृषि-उत्पाद खेत या भंडार-गृहों में कीट-कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं। इस बर्बादी से बचने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल बड़ा है। जहां 1950 में इसकी खपत 2000 टन थी, आज कोई 90 हजार टन जहरीली दवाएं देश के पर्यावरण में घुल रही हैं। इसका लगभग एक तिहाई हिस्सा विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गत छिडक़ा जा रहा है। 1960-61 में केवल 6.4 लाख हेक्टेयर खेत में कीटनाशकों का छिडक़ाव होता था। 1988-89 में यह रकबा बड़ कर अस्सी लाख हो गया और आज इसके कोई डेड़ करोड़ हेक्टेयर होने की संभावना है। ये कीटनाशक पानी, मिट्टी, हवा, जन-स्वास्थ्य और जैव विविधता को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। कई कीटों की प्रतिरोधक क्षमता बड़ गई है और वे दवाओं को हजम कर रहे हैं। इसका असर खाद्य शृंखला पर पड़ रहा है और उनमें दवाओं और रसायनों की मात्रा खतरनाक स्तर पर आ गई है। दवाओं का महज दस से पंद्रह फीसद ही असरकारक होता है, बाकी जहर मिट्टी, भूगर्भ जल, नदी-नालों का हिस्सा बन जाता है।
कर्नाटक के मलनाड इलाके में 1969-70 के आसपास एक अजीब रोग फैला। लकवे से मिलते-जुलते इस रोग के शिकार गरीब मजदूर थे। शुरू में उनकी पिंडलियों और घुटने के जोड़ों में दर्द हुआ, फिर रोगी खड़े होने लायक भी नहीं रह गया। 1975 में हैदराबाद के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ न्यूट्रिशन ने चेताया- ‘एंडमिक एमिलियिन आर्थराइटिस ऑफ मलनाड’ नामक इस बीमारी का कारण ऐसे धान के खेतों में पैदा हुई मछली, केकड़े खाना है, जहां कीटनाशकों का इस्तेमाल हुआ हो। इसके बावजूद वहां धान के खेतों में पैराथिया और एल्ड्रिन का बेतहाशा इस्तेमाल जारी है, जबकि बीमारी एक हजार से अधिक गांवों में फैल चुकी है। औसत भारतीय के दैनिक भोजन में लगभग 0.27 मिलीग्राम डीडीटी पाई जाती है।
पंजाब में कपास की फसल पर सफेद मक्खियों के लाइलाज हमले का मुख्य कारण रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना है। इन दिनों अच्छी प्रजाति के ‘रूपाली’ और ‘रश्मि’ किस्म के टमाटरों का सर्वाधिक प्रचलन है। इन प्रजातियों को सर्वाधिक नुकसान हेल्योशिस आर्मिजरा नामक कीड़े से होता है। टमाटर में सूराख करने वाले इस कीड़े के कारण आधी फसल बेकार हो जाती है। इन्हें मारने के लिए बाजार में रोगर हाल्ट, सुपर किलर, रेपलीन और चैलेंजर नामक दवाएं मिलती हैं। इन दवाओं पर दर्ज है कि इनका इस्तेमाल एक फसल पर चार-पांच बार से अधिक न किया जाए। मगर किसान इसका इस्तेमाल पच्चीस से तीस बार कर देता है। शायद टमाटर पर कीड़े तो नहीं लगते हैं, लेकिन उसको खाने वाले इंसान के कई गंभीर बीमारियों की चपेट में आने की पुष्टि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भी कर चुकी है।
इन दिनों बाजार में मिल रही चमचमाती भिंडी और बैंगन देखने में तो बेहद आकर्षक हैं, लेकिन खाने में उतने ही कातिल! बैंगन को चमकदार बनाने के लिए उसे फोलिडज नामक रसायन में डुबोया जाता है। बैंगन में घोल को चूसने की अधिक क्षमता होती है, जिससे फोलिडज की बड़ी मात्रा बैंगन जज्ब कर लेते हैं। इसी प्रकार भिंडी को छेद करने वाले कीड़ों से बचाने के लिए एक जहरीली दवा का छिडक़ाव किया जाता है। ऐसे कीटनाशकों से युक्त सब्जियों का लगातार सेवन करने से सांस की नली बंद होने की प्रबल संभावना होती है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के फार्माकोलॉजी विभाग के एक अध्ययन से पता चला है कि कॉक्रोच को मारने वाली दवाओं का कुप्रभाव सबसे ज्यादा चौदह साल से कम उम्र के बच्चों पर पड़ता है। ग्रीन पीस इंडिया की एक रिपोर्ट बताती है कि कीटनाशक बच्चों के दिमाग को घुन की तरह खोखला कर रहे हैं। संस्था ने बच्चों के मानसिक विकास पर कीटनाशकों के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए देश के छह अलग-अलग राज्यों के जिलों में शोध किया। ये जिले थे- बठिंडा (पंजाब), भरूच (गुजरात), रायचूर(कर्नाटक), यवतमाल (महाराष्ट्र), थेनी (तमिलनाडु) और वारंगल (आंध्रप्रदेश)। रिपोर्ट के मुताबिक कीटनाशकों के अंधाधुंध, अवैज्ञानिक और असुरक्षित इस्तेमाल के कारण भोजन और जल में रासायनिक जहर की मात्रा बड़ रही है। इसका सेवन करने वाले बच्चों का मानसिक विकास अपेक्षाकृत धीमा है।
सभी कीट, कीड़े या कीटाणु नुकसानदायक नहीं होते हैं। लेकिन बगैर सोचे-समझे प्रयोग की जा रही दवाओं के कारण पर्यावरण मित्र कीट-कीड़ों की कई प्रजातियां जड़-मूल से नष्ट हो गई हैं। विषैले और जनजीवन के लिए खतरा बने हजारों कीटनाशकों पर विकसित देशों ने अपने यहां तो पाबंदी लगा दी है, लेकिन अपने व्यावसायिक हित साधने के लिए इन्हें भारत में उड़ेलना जारी रखा है।केंद्र सरकार ने जून 1993 में बारह कीटनाशकों पर पूर्ण प्रतिबंध और तेरह के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियोंं की औपचारिकता निभाई थी। इनमें ‘सल्फास’ के नाम से कुख्यात एल्युमीनियम फास्फाइड भी है।
आज शायद ही ऐसा कोई दिन जाता होगा, जब अखबारों में सल्फास खा कर खुदकुशी करने की खबर न छपी हो। डीडीटी और बीएचसी जैसे बहुप्रचलित कीटनाशक भी प्रतिबंधित हैं। ऐसी अन्य दवाएं हैं- डाय ब्रोमो क्लोरो, पेंटा क्लोरो नाइट्रो बेंजीन, पेंटा क्लोरो फेनाल, हेप्टा क्लोरो एल्ड्रिन, पैरा क्वाट डाई मिथाइल सल्फेट, नोइट्रोफेन और टेट्राडाइफेन। लेकिन ये सभी दवाएं अलग-अलग नामों से बिक रही हैं। सरकार ने इन दवाओं की बिक्री पर प्रतिबंध (भले ही कागजों पर) लगाया है, लेकिन उत्पादन पर नहीं। सरकारी महकमों के लिए खरीद के नाम पर इनके कारखानों के लाइसेंस धड़ल्ले से जारी किए जाते हैं, जबकि इनमें बना माल बेरोकटोक पीछे के दरवाजे से बाजार में भेज दिया जाता है।
विडंबना यह है कि देश में हरित क्रांति का झंडा लहराने वालों ने हमारे खेतों और उत्पादों को विषैले रसायनों का गुलाम बना दिया है। लगता है कि पैदावार बड़ गई है, लेकिन जल्दी ही इसके कारण जमीन के बंजर होने और जनस्वास्थ्य की हानि का पता चल जाता है। इससे खेती की लागत बड़ रही है, साथ ही मानव संसाधन का नुकसान और स्वास्थ्य पर खर्चों में बड़ोतरी हो रही है। हमारा देश कई युगों से खेती करता आ रहा है। हमारे पास कम लागत में अच्छी फसल उगाने का पारंपरिक ज्ञान है। लेकिन यह ज्ञान जरूरत तो पूरी कर सकता है, लिप्सा को नहीं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार गुणवत्ता, उपभोक्ता और प्रशोधन जैसे नारों पर खेती चाहता है, जबकि हमारी परंपरा धरती को माता और खेती की पूजा करने की रही है। हमारे पारंपरिक बीज, गोबर की खाद, नीम, गौमूत्र जैसे प्राकृतिक तत्त्वों के कीटनााशक शायद पहले से कम फसल दें, लेकिन यह तय है कि इनसे जहर नहीं उपजेगा।
इन दिनों देश में कई जगहों पर बगैर रासायनिक दवा और खाद के फसल उगाने का प्रचलन बड़ा है, लेकिन यह फैशन से ज्यादा नहीं है और ऐसे उत्पादों के दाम इतने ज्यादा हैं कि आम आदमी इसे खरीदने से बेहतर जहरीले उत्पाद खरीदना श्रेयस्कर समझता है।Poisonous land from chemicals

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