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Dr D K Garg

भाग एक में आपने पढ़ा की धर्म क्या है और इसका वर्गीकरण क्या है। अब वर्गीकरण का भाग तीन प्रस्तुत है।

सामाजिक धर्म :–मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । समाज में रह कर, सबसे सहयोग करके ही उसकी सभी प्रकार की आवश्यकताओंकी पूर्ति हो पाती है ।जिस समाज में वह रहता है उसके प्रति उसके कई कर्तव्य भी होते हैं, उन्हे ही सामाजिक धर्म कहते हैं ।
प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी शक्ति और योग्यता के अनुसार समाज की सेवा करें, समाज की उन्नति के लिए प्रयत्न करें, ऐसा कोई काम न करें जिससे समाज को हानि पहुंचती हो।सबको अपना भाई और मित्र समझे , समाज सुधार का कार्य करें, समाज में जो भी बुरे रीति- रिवाज़ उनको हटाने का सदा प्रयत्न करें,अपना तन- मन समाज की सेवा में लगा दे।
वेद कहता है मनुर्भव (मनुष्य बनो)
वेद कहता है कि तू मनुष्य बन। जब कोई जैसा बन जाता है तो वैसा ही दूसरे को बना सकता है। जलता हुआ दीपक ही बुझे हुए दीपक को जला सकता है। बुझा हुआ दीपक भला बुझे हुए दीपक को क्या जलाएगा? मनुष्य का कर्त्तव्य है कि स्वयं मनुष्य बने और दूसरों को मनुष्यत्व की प्रेरणा दे। स्वयं अच्छा बने और दूसरों को अच्छा बनाए। यदि मनुष्य स्वयं तो अच्छा बनता है, परन्तु दूसरों को अच्छा नहीं बनाता तो उसकी साधना अधूरी हो जाती है। यदि स्वयं तो अच्छा है, परन्तु अपनी सन्तान को अच्छा नहीं बनाता तो वह अपने लक्ष्य में आधा सफल होता है।

सीमानो नाऽतिक्रमणम् यत्त धर्मम्
अपनी सीमा, मर्यादा अर्थात कर्तव्य व अधिकारों का अतिक्रमण न करना ही धर्म का महत्वपूर्ण अंग व लक्षण है।

श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधिं प्राहुः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्।।
(मनुस्मृति अध्याय-१ श्लोक-१३१)
अतः प्रत्येक धारण किया जाने वाला सदाचरण एवं सर्वकल्याणकारी व श्रेष्ठ विधान(नियम/कानून) अथवा सामाजिक व्यवस्था(अनुशासन) को भी धर्म ही कहा जाता है।

राष्ट्रीय धर्म — जो व्यक्ति जिस देश में उत्पन्न होता है उसके प्रति उसके बहुत से कर्तव्य होते हैं उन कर्तव्यों का पालन करने को ही राष्ट्र धर्म कहते हैं । अपने देश की सब प्रकार से उन्नति हो इसके लिए सदा प्रयत्नशील रहना चाहिए ।प्रत्येक व्यक्ति को देश की एकता और अखंडता के लिए प्रयत्न करना चाहिए ।
देश की उन्नति के लिए एक भाषा और एक धर्म का होना अति आवश्यक है। जिस देश में एक भाषा और एक धर्म होता है वह देश शीघ्रता से उन्नति के शिखर को प्राप्त कर लेता है । मतलब है कि मातृभूमि की सेवा करना उसको स्वावलम्बी और स्वतंत्र बनाये रखने का प्रयत्न करना – यह हम सबका राष्ट्रीय धर्म है । प्रत्येक मनुष्य को चाहिए अपने माता पिता के समान भारतमाता की सेवा करनी चाहिए ।
कहा गया कि ” जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी “। अर्थात जननी (माता) और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ और महान है ।

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