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संवैधानिक अधिकारों से वंचित बाल श्रमिक

भाग्यश्री बोयवाड

महाराष्ट्र

“हम भारत के लोग” से शुरू होने वाला हमारा संविधान किसी एक व्यक्ति, समुदाय, जाति या संस्था का नहीं, बल्कि पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता है. यह न केवल बराबरी की बात करता है बल्कि इसे क्रियान्वित करने की भी हिदायत देता है. यह कमज़ोर से भी कमज़ोर लोगों को अपने हक़ की आवाज़ बुलंद करने की ताकत भी देता है. लेकिन ऐसा लगता है कि कुछ लोग किसी की मजबूरियों का फायदा उठा कर उनकी आवाज़ और हक़ को दबा रहे हैं. हालांकि वे इतनी जोर से चीखना चाहते हैं कि उनकी आवाज बहरे सिस्टम को सुनाई दे, लेकिन बेबसी ने उनके होठों को सील कर दिया और उनकी आवाज सिसकियों में दब गई है. यह आवाज़ देश के हज़ारों बाल श्रमिकों की है जो किन्हीं कारणों से स्कूल और कॉलेज छोड़कर मिलों और फैक्ट्रियों में काम करने पर मजबूर हैं और यह मिल मालिक उनकी इन्हीं मजबूरियों का फायदा उठाते हुए उन्हें उनके अधिकारों से वंचित रखते हैं. हद तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था उनकी तकलीफों को नजरअंदाज करने में माहिर हो गई है. चाहे वह सीमा हो, कोमल हो या रंजनी अथवा पूजा. जो आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए काम तो करती हैं लेकिन इस सिस्टम ने उन्हें उनके मौलिक अधिकारों से ही वंचित रखा है.

नैतिक विश्लेषण हमेशा दिखाता है कि समाज नंगा है. इसलिए मैं इसे अनदेखा कर केवल संवैधानिक नैतिकता की ओर ध्यान खींच रही हूं और कुछ कानूनी पहलुओं को दिखाने की कोशिश कर रही हूं. जिसे पढ़ने के बाद ऐसा लगेगा कि सारा सिस्टम इन मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए ही बना है लेकिन जमीनी स्तर पर इनकी कोई भूमिका नहीं है. इसी सिलसिले में सबसे पहले बात करते हैं रंजनी की. नागपुर के एक गारमेंट शॉप में काम करने वाली रंजनी ने बातचीत के दौरान बताया कि कार्यस्थलों पर वॉशरूम की अनुपलब्धता है. उसने बताया कि उसे वॉशरूम का उपयोग करने के लिए पास के होटल या अस्पताल आदि में जाना पड़ता है जो बिल्कुल भी सुविधाजनक नहीं है. यहां तक कि वॉशरूम जाना और आना भी उसके लिए बहुत सुरक्षित नहीं है. जैसा कि वह अपने अनुभव से बताती हैं, कभी-कभी संबंधित होटल कर्मचारी आदि भद्दे कमेंट करते हैं. शौचालय का उपयोग करके लौटते समय, रेहड़ी-पटरी वाले भी कभी-कभी उसके साथ छेड़छाड़ करते हैं. रंजनी के अनुसार उन्हें शौचालय जाने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ती है जिसके लिए उन्हें 5 मिनट से ज्यादा की अनुमति नहीं दी जाती है. मासिक धर्म के दौरान उसे और वहां कार्यरत अन्य महिला कर्मचारियों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. वहीं उसके लिए काम के घंटे तय नहीं हैं यानी उन्हें काम पर समय से पहुंचना तो है, लेकिन लौटने का समय तय नहीं है. वापसी का समय काम की मात्रा पर निर्भर करता है, जो कभी-कभी देर रात हो सकता है.

यह बाल श्रम अधिनियम का खुलेआम उल्लंघन है. बाल श्रम अधिनियम की धारा 13(2) के अनुसार सरकार को बाल श्रमिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा, विशेष रूप से शौचालयों और मूत्रालयों के उपयोग, पीने के साफ़ पानी और स्वच्छता आदि को सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाने हैं. इसके अलावा, महाराष्ट्र दुकान और प्रतिष्ठान (रोजगार और सेवा की शर्तों का विनियमन) अधिनियम, 2017 यानी एमएसई के तहत, प्रत्येक कार्यस्थल पर स्वच्छता सहित कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उपाय किये जाने हैं. इसकी धारा 22 नियोक्ता को पुरुषों और महिलाओं के लिए पर्याप्त शौचालय और मूत्रालय प्रदान करने के लिए बाध्य करता है जो कर्मचारियों के लिए आसानी से सुलभ हो. यह कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का घोर उल्लंघन है. संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2015 में स्वच्छता के अधिकार को एक सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषित किया है. इस प्रकार, यह सुविधा प्रदान नहीं करना बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन है. समय की पाबंदी और सार्वजनिक शौचालयों में उपलब्ध सुविधाएं कर्मचारियों विशेषकर महिला कर्मचारियों को तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में ले लेती हैं. मासिक धर्म के दौरान उचित और अच्छे शौचालय न होने के कारण यह मासिक धर्म के लिए बहुत हानिकारक है. वहीं बाल श्रम अधिनियम की धारा 7 के अनुसार कार्यस्थल पर नियोजित निर्धारित घंटों से अधिक काम नहीं ले सकता है. इसके अलावा, भोजन अवकाश सहित कुल काम के छह घंटे से अधिक नहीं होने चाहिए.

इसके अतिरिक्त धारा 7 भी नाबालिगों को शाम 7 बजे से सुबह 8 बजे के बीच काम करने से रोकता है. किशोरों को भी ओवरटाइम काम करने के लिए नियोजित नहीं किया जाना चाहिए. यह बिल्कुल प्रतिबंधित है. इसके अलावा, एमएसई अधिनियम की धारा 15 में यह प्रावधान है कि यदि कोई कर्मचारी ओवरटाइम काम करता है, तो उसे उसके सामान्य वेतन की दोगुनी दर से भुगतान किया जाएगा. अधिनियम (2) की धारा 13 में यह भी प्रावधान है कि कोई भी महिला कर्मचारी रात 9:30 बजे के बाद काम नहीं करेगी यदि किसी कारण आवश्यक है तो उसे उसके आवास तक सुरक्षा और परिवहन प्रदान करनी होगी. अपनी कामकाजी परिस्थितियों के बारे में बताते हुए रंजनी ने कहा कि काम के निश्चित घंटों का पालन नहीं किया जाता है. उसे कभी-कभी ओवरटाइम के लिए बिना किसी अतिरिक्त वेतन के रात में लंबे समय तक काम करना पड़ता है. वह अपनी कामकाजी परिस्थितियों का वर्णन करते हुए कहती हैं कि उन्हें हमेशा लंच ब्रेक नहीं मिलता, जो नियमित होनी चाहिए. जबकि बाल श्रम अधिनियम की धारा 7 (2) में यह आवश्यक है कि किशोरों के लिए काम की अवधि हर दिन इस तरह से निर्धारित की जानी चाहिए कि यह एक बार में तीन घंटे से अधिक नहीं होनी चाहिए और इसके बाद कम से कम एक घंटे की आराम अवधि होनी चाहिए.

सीमा की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है. अपने काम करने की स्थिति के बारे में बात करते हुए सीमा ने छुट्टियों के बारे में बात की. उसने बताया कि उनकी साप्ताहिक छुट्टियों की संख्या 4 से घटाकर 2 कर दी गई है. जबकि बाल श्रम अधिनियम की धारा 8 में यह अनिवार्य है कि प्रत्येक कर्मचारी को प्रत्येक सप्ताह में न्यूनतम एक पूर्ण दिन का साप्ताहिक अवकाश मिलना चाहिए. MSE की धारा 16 में यह भी प्रावधान है कि प्रत्येक कर्मचारी को साप्ताहिक छुट्टी मिलनी चाहिए अथवा इसके बदले में प्रतिपूरक अवकाश दिया जाना चाहिए. सीमा ने हमें बताया कि उन्हें ये छुट्टियां नहीं मिलती हैं. इस प्रकार, कानून के अनिवार्य प्रावधानों का यहां सरासर उल्लंघन किया जाता है. नियुक्ति और अधिकार के मामले में कार्यस्थल में महिलाओं के खिलाफ लैंगिक भेदभाव का अस्तित्व बहुत स्पष्ट था. यह वेतन में असमानता भी पैदा करता है. एमएसई अधिनियम की धारा 13 भर्ती, प्रशिक्षण, स्थानांतरण या पदोन्नति या मजदूरी के मामले में महिला श्रमिकों के खिलाफ भेदभाव पर रोक लगाती है. हमारा संविधान समानता की बात करता है. इस प्रकार महिलाओं के खिलाफ अप्रत्यक्ष भेदभाव उपरोक्त प्रावधानों का उल्लंघन है और स्वाभाविक रूप से अनैतिक भी है. यह स्थान जातिगत भेदभाव को भी दर्शाता है.

नागपुर के एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाली कोमल ने बताया कि उसे कम से कम 8 घंटे और अधिकतम 12 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है. जबकि बाल श्रम अधिनियम की धारा 7 के अनुसार, किसी भी युवा को तय समय से अधिक काम करने पर मजबूर नहीं किया जा सकता है. वहीं धारा 7 नाबालिगों को शाम 7 बजे से सुबह 8 बजे के बीच काम करवाने से भी रोकता है. यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है. इसके अलावा, एमएसई अधिनियम की धारा 15 में प्रावधान है कि यदि कोई कर्मचारी ओवरटाइम काम करता है, तो उसे उसके सामान्य वेतन की दोगुनी दर से भुगतान किया जाएगा. कोमल के मुताबिक काम के घंटे कानून के मुताबिक नहीं हैं. कुछ ऐसा ही पूजा ने भी कहा है. उसने बताया कि काम के दौरान कर्मचारियों को मोबाइल फोन की अनुमति नहीं होती है. ऐसे में वह किसी इमरजेंसी में अपने घर तक फोन नहीं कर पाती है. हालांकि यह कर्मचारियों की स्वायत्तता का उल्लंघन और अनावश्यक प्रतीत होता है. इन सबके अलावा सामान्य गैर-अनुपालन के कुछ अन्य उदाहरण हैं जैसे बाल श्रम अधिनियम की धारा 9 के तहत निरीक्षक को नोटिस देने की आवश्यकता है. जिसमें नियोक्ता के बारे में विवरण और किशोर/किशोरी कर्मचारियों की नियुक्ति की जानकारी होनी चाहिए. बाल श्रम अधिनियम में 2016 के संशोधन का एक प्रमुख उद्देश्य बाल श्रम में लगे बच्चों के पुनर्वास को सुनिश्चित करना है.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि ज़्यादातर खतरनाक कामों में बाल मज़दूरों को ही झोंका जाता है. ऐसे में बाल श्रम अधिनियम के प्रावधानों का पालन न करना स्वाभाविक रूप से एक दंडनीय अपराध है. इन नियमों के उल्लंघन पर केवल नियोक्ताओं पर जुर्माना लगाना पर्याप्त नहीं है बल्कि किसी ठोस परिणाम की ज़रूरत है. बाल श्रमिकों के रूप में दलित समुदाय की बहुत लड़कियां भी शामिल हैं. हालांकि समाज उन्हें कमजोर और निसहाय के रूप में देखता है. लेकिन यही लड़कियां खुद एक पूरे सिस्टम से लड़ रही हैं, जो हर पल उन्हें और उनके परिवारों को आर्थिक रूप से तोड़ने की कोशिश करता है. सवाल यह है कि वे कमजोर कैसे हैं? जबकि हर दिन वह एक असुरक्षित माहौल में रहकर भी अपने परिवार की आर्थिक मदद कर रही हैं. दरअसल जागरूकता की कमी का फायदा उठाते हुए समाज का एक वर्ग है जो अपनी आर्थिक स्थिति को मज़बूत बनाने के लिए बाल श्रमिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित रखना चाहता है. लेखिका डब्लूएनसीबी की फेलो हैं. (चरखा फीचर)

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