Categories
पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा : मेरा आजीवन कारावास

☸️ मेरा आजीवन कारावास ₹500
☸️ काला पानी ₹300

दोनो पुस्तक पेपर बैक संस्करण में हैं। प्राप्ति के लिए- 7015591564 पर Whatsapp द्वारा सम्पर्क करें।

पुस्तक में क्या है?
☸️ मेरा आजीवन कारावास
सावरकर सैल्यूलर जेल की तीसरी मंजिल की छोटी-सी कोठरी में रखा गया था. कोठरी के कोने में पानी वाला घड़ा और लोहे का गिलास. कैद में सावरकर के हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियां जकड़ी रहती थीं. माना जाता है कि वीर सावरकर जब कैद में थे तो उनके बड़े भाई गणेश सावरकर को भी वहीं कैद में डाला गया था. वीर सावरकर को यह पता ही नहीं था कि इसी जेल में उनके भाई भी हैं. वीर सावरकर दस वर्षों तक इस काल कोठरी में एकाकी कैद की सजा भोगते रहे. सावरकर अप्रैल 1911 से मई 1921 तक पोर्ट ब्लेयर की जेल में रहे. जेल में स्वतंत्रता सेनानियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता था. क्रांतिकारियों को यहां नारियल छीलकर उसमें से तेल निकालना पड़ता था. साथ ही इन्हें यहां कोल्हू में बैल की तरह जुत कर सरसों व नारियल आदि का तेल निकालना होता था. इसके अलावा उन्हें जेल के साथ लगे व बाहर के जंगलों को साफ कर दलदली भूमि व पहाड़ी क्षेत्र को समतल भी करना होता था. रुकने पर उनको कड़ी सजा व बेंत व कोड़ों से पिटाई भी की जाती थी. उन्हें बस जीने के लिए खाना दिया जाता था.
वीर सावरकर ने जिक्र किया है कि किस तरह वहाँ इंसानों को जानवरों से भी बदतर समझा जाता था। अंग्रेज उन्हें कोल्हू के बैल की जगह जोत देते थे। पाँव से चलने वाले कोल्हू में एक बड़ा सा डंडा लगा कर उसके दोनों तरफ दो आदमियों को लगाया जाता था और उनसे दिन भर काम करवाया जाता था। जो काम बैलों का था, वो इंसानों से कराए जाते थे। जो टालमटोल करते, उन्हें तेल का कोटा दे दिया जाता था और ये जब तक पूरा नहीं होता था, उन्हें रात का भोजन भी नहीं दिया जाता था। उन्हें हाँकने के लिए वार्डरों तक की नियुक्ति की गई थी।
सावरकर जहाँ भी जाते थे, वहाँ उनके ‘अपने लोग’ मिल ही जाते थे। इसी तरह अंडमान में ही कुछ ऐसे वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी रह रहे थे, जो 1857 के युद्ध में अपने रोल के कारण यहाँ बंद थे। ये ऐसे लोग थे, जो बुढ़ापे तक सज़ा काटने के बाद वहीं बस गए थे। ऐसे देशभक्तों ने सावरकर से संपर्क किया था और उन लोगों की बातचीत होते रहती थी। उनके अनुभवों से सावरकर ने कई चीजें सीखीं। तभी उन्होंने अंडमान में कागज़-कलम न मिलने पर दीवारों पर कीलों, काँटों और अपने नाखूनों तक से साहित्य रचे। कई पंक्तियों को कंठस्थ किया और आमजनों तक पहुँचाया।
सावरकर अपनी पुस्तक ‘मेरा आजीवन कारावास‘ में लिखते हैं कि उन्हें भी कोल्हू के बैल का काम दिया गया था। उससे पहले उनसे छिलका कूटवाने का काम लिया जाता था। अचानक एक दिन अंग्रेजों ने कहा कि ये करते-करते उनके हाथ कठोर हो गए होंगे, इसीलिए अब उन्हें कोल्हू वाला काम दिया जा रहा है।
सिर चकराता था। लंगोटी पहन कर कोल्हू में काम लिया जाता था। वो भी दिन भर। शरीर इतना थका होता था कि उनकी रातें करवट बदलते-बदलते कटती थी। अन्य बंदीगण सावरकर से प्रेम करने लगे थे, इसीलिए वो आकर उनकी मदद कर देते थे। उनके कपड़े तक धो देते थे और बर्तन माँज देते थे। सावरकर के रोकने के बाद वो मिन्नतें करने लगते थे, जिसके बाद सावरकर ने उन्हें मना करना छोड़ दिया क्योंकि उन बंदियों को इसमें ही ख़ुशी होती थी। धीरे-धीरे यातनाएँ और भी असह्य होती चली गईं।
स्थिति ये आ गई कि सावरकर को आत्महत्या करने की इच्छा होती। इतनी भयंकर यातनाएँ दी जातीं और वहाँ से निकलने का कोई मार्ग था नहीं, भविष्य अंधकारमय लगता- जिससे वो सोचते रहते कि वो फिर देश के किसी काम आ पाएँगे भी या नहीं। एक बार कोल्हू पेरते-पेरते उन्हें चक्कर आ गया और फिर उन्हें आत्महत्या का ख्याल आया। सावरकर लिखते हैं कि उनके मन और बुद्धि में उस दौरान तीव्र संघर्ष चल रहा था और बुद्धि इसमें हारती हुई दिख रही थी।
सावरकर काफी देर तक उस खिड़की को देखते रहते, जहाँ से लटक कर पहले भी कैदियों ने आत्महत्या की थी। कई दिनों तक सोचने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि अगर मरना ही है तो एक ऐसा कार्य कर के मरें, जिससे लगे कि वो सैनिक हैं। सोच-विचार के बाद उन्होंने न सिर्फ अपने बल्कि कई अन्य कैदियों के मन से भी आत्महत्या का ख्याल निकालने में सफलता पाई। वहाँ उन्होंने कोल्हू पर ही संगठन का काम शुरू किया, बंदियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया, उन्हें देशप्रेम सिखाया। अंग्रेज उन्हें बाकी बंदियों से दूर रखना चाहते थे। उन्हें बाद में रस्सी बाँटने का काम दे दिया गया था।
स्वामी श्रद्धानन्द जी के मित्र व प्रशंसक पादरी सी.एफ. एन्ड्रूज ने भी अनेक लेख अण्डमान की सेल्युलर जेल में राजनैतिक बन्दियों की अमानवीय यातनाओं व जेल से मुक्ति के लिए लिखें।
24 दिसम्बर सन् 1919 को शाही दयालुता का फरमान जारी हुआ। परिणामस्वरूप सभी प्रान्तीय सरकारों ने राजनैतिक बंदियों की मुक्ति के लिए जेलों के दरवाजे खोल दिए। अण्डमान की पोर्ट ब्लेयर स्थिति सेल्युलर जेल जो कालापानी के नाम से विख्यात रही है, उस जेल से भी अनेकानेक राजनैतिक कैदी मुक्त कर दिए गए। वीर दामोदर सावरकर और उनके भाई को दस वर्ष की कैद पूरी कर लेने पर भी मुक्त नहीं किया गया जबकि पांच वर्ष की कैद बिता चुके कई राजनैतिक कैदी मुक्त कर दिए गए थे। वीर सावरकर की रूग्ण अवस्था अपने चरम पर थी। वह लगभग मृत्यु शय्या पर ही थे। सेल्युलर जेल के चिकित्सालय में फेफड़ों के क्षय रोग टी.बी. का उनका इलाज किया गया। दिन भर में दूध का एक घूंट ही उनकी खुराक रह गई थी।
केन्द्रीय लेजिस्लेटिव असेम्बली में श्री सरदार विट्ठल भाई पटेल ने 24 फरवरी, 1920 को सावरकर बन्धुओं का सन्दर्भ लेते हुए राजनैतिक अवज्ञाकारी बन्दियों की मुक्ति के लिए प्रस्ताव रखा। श्री जी.एस. खापर्डे ने सावरकर बन्धुओं का ही मामला उठाया। बाल गंगाधर तिलक ने मि. मान्टेग्यू को सावरकर की मुक्ति हेतु जोरदार पत्र लिखा।
वहाँ अंडमान में कई राजबंदी रहा करते थे। सावरकर उनसे जब पहली बार मिले, तभी उन्हें उनके दुखों का अंदाज़ा हो गया था। उन्होंने अंग्रेजों के भय को दरकिनार कर के उनसे सबका परिचय लिया। उसी समय उन्होंने उन सभी से कहा था कि देखना, एक दिन जब भारत आज़ाद होगा तो इसी जेल में हम सबके पुतले लगे होंगे।
सावरकर ने कहा-
“आज भले ही पूरे विश्व में हमारा अपमान हो रहा हो लेकिन देखना, एक दिन यही जगह एक तीर्थस्थल बन जाएगा और लोग कहेंगे कि देखों यहाँ हिन्दुस्तानी कैदी रहा करते थे। ऐसा ही होगा। ऐसा होना चाहिए।”

☸️ कालापानी
कालापानी में कक्ष कारागारों को सेल्युलर जेल कहा जाता था। वहाँ कड़ा पुलिस पहरा रहता था। सावरकर अपनी पुस्तक ‘काला पानी’ में इस नारकीय यातना का वर्णन करते हैं। 750 कोठरियाँ, जिनमें बंद होते ही कैदी के दिलोदिमाग पर घुप्प अँधेरा छा जाता था। अंडमान के सुन्दर द्वीप पर ये अंग्रेजों का नरक था। यद्यपि ‘काला पानी’ एक गद्य उपन्यास की तरह है, जिसे सावरकर ने अपनी जीवनी के रूप में नहीं लिखा है और इसके तमाम पात्र भी काल्पनिक हैं, लेकिन यातनाओं और जेल का जो विवरण है, वो समझने वाले समझ जाते हैं कि सत्य है।
इस पुस्तक के बारे में कहा जाता है कि इस पर फ़िल्म बनाने के लिए सावरकर के पास ऑफर आया था। उनके निजी सचिव बाल सावरकर लिखते हैं कि सुधीर फड़के इस पर फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन उनकी माँग थी कि रफीउद्दीन (जेलर) नामक किरदार को बदल दिया जाए और उसकी जगह किसी हिन्दू पात्र को दे दी जाए। सावरकर को ये स्वीकार्य नहीं था। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वो इस तरह एक दूसरे मजहब के किरदार का नाम हिन्दू का करने की अनुमति कभी नहीं दे सकते।
सावरकर ने कह दिया कि अगर उन लोगों को समुदाय विशेष को शिष्ट और साधु प्रवृत्ति का दिखाने की इतनी ही हूल मची है तो कोई एक नया किरदार गढ़ लें लेकिन वो इस तरह से पहले से बने हुए किरदार के नाम में परिवर्तन की अनुमति नहीं देंगे। आज भी बॉलीवुड का यही ट्रेंड है। समुदाय विशेष के किरदार को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया जाता है। उन्हें एक इमानदार दोस्त, त्यागी व्यक्ति और भोले-भाले इंसानों के रूप में चित्रित किया जाता है जबकि पंडितों को चुंगला, बातें इधर-उधर करने वाला और शोषणकर्ता के रूप में दिखाया जाता है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
betnano
betnano
betnano
holiganbet giriş
betpark giriş